Haryana: मोदी ने हरियाणा में एक तीर से साध लिए कई निशाने

Haryana: ग्यारह मार्च को नरेंद्र मोदी जब हरियाणा के गुरुग्राम में दिल्ली को हरियाणा से जोड़ने वाले नए हाईवे का उद्घाटन कर रहे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से साथ बिताए वे दिन याद किए थे, जब वे बाईक पर घूमा करते थे|

उसके सत्रह अठारह घंटे बाद खबर आ गई कि मनोहर लाल खट्टर को इस्तीफा देने का हुक्म सुना दिया गया है, उसके एक घंटे बाद ही खबर आई कि मनोहर लाल खट्टर ने इस्तीफा दे दिया है और नायब सैनी ने शाम होते होते शपथ ग्रहण भी कर ली| संयोग से नरेंद्र मोदी, मनोहर लाल खट्टर, नायब सैनी और शपथ दिलाने वाले राज्यपाल बंडारू दतात्रेय सभी आरएसएस पृष्भूमि से आते हैं|

haryana politics

आरएसएस में इसी रणनीति से काम होता है, किसी को कानों कान खबर नहीं होती| अजय चौटाला की जिस जेजेपी के समर्थन से सरकार चल रही थी, उस पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला को कानों कान खबर भी नहीं हुई कि उनके पांच विधायक टूट कर भाजपा के साथ जा चुके हैं| अगर उन्हें ऑपरेशन मोदी की खबर लगती, तो वह राज्यपाल के पास जा कर समर्थन वापसी की चिठ्ठी दे देते तो सत्ता का हस्तांतरण इतना आसान नहीं होता|

अजय चौटाला और दुष्यंत चौटाला अगर हिसार और भिवानी सीटों की मांग रखते हुए सभी दस लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की धमकी न देते, तो भारतीय पार्टी उन्हें इस तरह दूध से मक्खी की तरह निकाल फैंकने का काम नहीं करती| एक महीने के भीतर बिहार और हरियाणा में जोरदार ऑपरेशन हुआ| बिहार में नीतीश कुमार ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को अपनी सरकार से निकाल बाहर किया, और हरियाणा में भाजपा ने उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला को निकाल बाहर किया| इन दोनों ही घटनाओं से भाजपा को फायदा हुआ है|

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चुनावों से पहले इस तरह की रि-एलाइनमेंट हमेशा होती है| लेकिन चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदल कर या थोक में सांसदों विधायकों के टिकट काटने का साहस भाजपा के अलावा कोई दल नहीं कर सकता| इससे पहले गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने पूरा मंत्रीमंडल ही बदल डाला था। 2017 में दिल्ली एमसीडी चुनाव में भाजपा ने सारे पार्षदों के टिकट काट दिए थे| उत्तराखंड चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदल दिया था| तीनों जगह भाजपा अपनी रणनीति में कामयाब रही, लेकिन हिमाचल प्रदेश में चुनाव से पहले फेरबदल नहीं किया तो पांच साल की एंटी इनकम्बेंसी भाजपा को ले डूबी|

कहा जा रहा है कि मोदी की रणनीति से भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को बदल कर एंटी इनकम्बेंसी को रोकने और लोकसभा चुनावों में हिस्सा मांगने की जिद्द कर रहे जेजेपी को बाहर निकालने का काम एक ही तीर से कर डाला| सवाल पैदा हो रहा है कि जब भाजपा राज्यों में अपने पैर फैलाने के लिए छोटे छोटे दलों से गठबंधन कर रही है, तो जिस जेजेपी से गठबंधन था, उससे तोड़ने की क्या जरूरत थी| तो इसका जवाब यह है कि जब भाजपा ने 2019 में सभी दस की दस सीटें अपने दम पर जीती हैं, तो भाजपा लोकसभा चुनावों में अपनी जीती हुई सीटें किसी को क्यों दे|

दूसरा हरियाणा में भाजपा जाट विरोधी मतदाताओं को एकजुट करके सत्ता में आई है। 2019 में गैर जाट मतदाताओं ने भाजपा के भी लगभग सभी जाट विधायकों को चुनाव में हरा दिया था| तो अब भाजपा से अलग हुए जाट नेता को भाजपा का गैर जाट मतदाता क्यों पसंद करेगा| भाजपा को अगर जातीय संतुलन के लिए जाट को उप मुख्यमंत्री बनाना ही है, तो वह जाट राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों के किसी जाट नेता को उप मुख्यमंत्री बनाने के बजाए अपने किसी जाट नेता या निर्दलीय जाट नेता को उपमुख्यमंत्री बनाएगी|

भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई हरियाणा सरकार में जातीय संतुलन को पहले से ज्यादा मजबूत और धारदार बनाने की कोशिश की है| पिछले नौ साल से राज्य की जनता मनोहर लाल खट्टर को एक पंजाबी मुख्यमंत्री के तौर पर देख रही थी, जबकि कई गैर जाट जातियों ने भाजपा को सत्ता में पहुंचाया था| इसलिए उन जातियों को साधे रखना भी वक्त की जरूरत हो गई थी, क्योंकि कांग्रेस हरियाणा में जाट, गुजर, दलित, मुस्लिम का समीकरण बनाने की कोशिश कर रही थी|

भाजपा ने एक सैनी को मुख्यमंत्री बना कर ओबीसी वोट बैंक पर पहले ही बाजी मार ली| इसके अलावा सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए भाजपा ने एक जाट, एक दलित, एक ब्राह्मण और एक सैनी को अपने मंत्रीमंडल में शामिल कर लिया, यह परिवर्तन अपने 2014 से जुड़े वोट बैंक को संभालने सहेजने की रणनीति के तहत किया गया है| यह भी संभावना है कि भाजपा हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव करवाने का दांव भी खेल सकती है|

2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सर छोटू राम के बेटे चौधरी वीरेन्द्र सिंह ने अपने बेटे बृजेंद्र सिंह को टिकट दिलाने के लिए 2019 में टिकट पर दावा छोड़ा था। भाजपा ने बृजेंद्र सिंह को हिसार से टिकट दिया और वह जेजेपी के दुष्यंत चौधरी को हरा कर चुनाव जीते, लेकिन छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो भाजपा ने दुष्यंत चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाकर उसके दस विधायकों का समर्थन हासिल किया|

चौधरी वीरेन्द्र सिंह और उनके बेटे बृजेंद्र सिंह खुलेआम कह रहे थे कि अगर भाजपा ने जेजेपी से गठबंधन नहीं तोड़ा तो वह भाजपा छोड़ देंगे| उन्होंने जाट राजनीति में जड़ें जमाने के लिए कांग्रेस में जाने का मन बना लिया था, इसलिए उन्होंने भाजपा की रणनीति का इन्तजार तक नहीं किया| भाजपा क्योंकि खुद भी हरियाणा में गैर जाट राजनीति करना चाहती है, इसलिए उसने भी चौधरी वीरेन्द्र सिंह को रोका नहीं|

हरियाणा में इस परिवर्तन से भाजपा को चुनावों में दूसरा फायदा यह होगा कि उसने एक और जाट पार्टी को कांग्रेस की जाट राजनीति के सामने खड़ा कर दिया है| प्रदेश में जाट राजनीति करने वाली कांग्रेस, जेजेपी और आईएनएलडी आमने सामने होंगी तो जाट वोट विभाजित होगा, जिसका सीधा फायदा भाजपा को होगा| हरियाणा में इस समय चौधरी देवी लाल का परिवार ही तीन हिस्सो में बंटा हुआ है| चौधरी देवी लाल के छोटे बेटे रंजीत सिंह ने भाजपा की नई सरकार में मंत्री पद की शपथ ली है| दूसरे बेटे ओम प्रकाश चौटाला का एक बेटा अजय चौटाला जेजेपी चला रहा है, तो दूसरा बेटा अभय चौटाला आईएनएलडी चला रहा है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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