Bihar Politics: क्या मध्यावधि चुनाव की ओर बढ़ रहा है बिहार?
Bihar Politics: बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) कमज़ोर स्थिति से उबरने के लिए विधानसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव में जाने की सोच रहा है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी नई सोच से बिहार में इंडिया गठबंधन के गार्जियन लालू प्रसाद और उनके पुत्र उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को पिछली मुलाकात में अवगत करा दिया है।

असल में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय सियासत के ऐसे सूरमा हैं जो हमेशा विकल्पों से लबरेज रहते हैं। लोकसभा चुनाव के समय उनके पास वापस एनडीए में लौटने का विकल्प तेजी से तैयार हो रहा है, वहीं इंडिया गठबंधन में उनको खास अहमियत देने की तैयारी भी चल रही है। लालू परिवार के साथ सरकार चलाते हुए एक ओर वह परिवारवादी राजनीति पर हमला भी कर रहे हैं तो दूसरी ओर भारत न्याय यात्रा के सिलसिले में बिहार के पूर्णिया पहुंच रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी के स्वागत में मुख्यमंत्री की मौजूदगी सुनिश्चित की जा रही है।
मतलब वो राजनीति में इंडिया और एनडीए दोनों के लिए महत्वपूर्ण बने रहने की कलाबाजी कर रहे हैं, फिर भी उनका मन लोकसभा के साथ ही डेढ़ साल पहले ही बिहार विधानसभा को भंग करके मध्यावधि चुनाव कराने को मचल रहा है।
मौजूदा विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के महज 45 सदस्य हैं। संख्या बल में यह तीसरे नंबर की पार्टी है। खास राजनीतिक परिस्थितिवश सदन में सबसे ज्यादा 79 विधायकों वाली राष्ट्रीय जनता दल नीतीश सरकार का सहयोगी है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई भारतीय जनता पार्टी के पास राजद से एक कम यानी 78 विधायक हैं।
सरकार में सहयोगी पार्टनर जेडीयू और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष की आपसी बातचीत में कार्यकाल पूरा होने से डेढ़ साल पहले विधानसभा भंग करने का यह सुझाव महत्वपूर्ण है। दोनों दलों के बीच लोकसभा सीटों की संख्या को लेकर सहमति बन चुकी है। साथ चुनाव होने से सीट बंटवारे को लेकर बराबरी वाला समझौता विधानसभा सीटों पर भी लागू होगा और इसका तत्काल प्रत्यक्ष लाभ सत्तारूढ़ जेडीयू को मिलेगा।
बिहार से लोकसभा की 40 सीटें हैं। उनमें जेडीयू के 16 सांसद हैं। बराबरी के संख्या सिद्धांत के आधार पर जदयू लोकसभा की इतनी ही यानी 16 सीटें राष्ट्रीय जनता दल को देने के हक में है। बाकी आठ सीटें कांग्रेस व अन्य सहयोगी दलों के बीच बंटवारे के लिए छोड़ने का प्रस्ताव है। अगर यही प्रस्ताव विधानसभा सीटों पर लागू हों तो 243 सदस्यीय विधानसभा में 110 सीटों के लगभग जदयू और राजद आपस में बांट लें। शेष 23 सीटें इंडिया गठबंधन की कांग्रेस व अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जाएं। इंडिया गठबंधन में एक मूक समझौता के तहत जदयू और राजद दोनों एकदूसरे को मजबूती देने और कांग्रेस को हाशिए पर रखने में मदद कर रहे हैं।
लोकसभा और विधानसभा का पिछला चुनाव जदयू ने एनडीए में रहते लड़ा था। इसलिए गठबंधन में सीटों का बंटवारा नए सिरे से होना है। 2019 लोकसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ते हुए राजद को लोकसभा में शून्य के आंकड़े पर पहुंचा दिया था।
इस दमदार ताकत की वजह से एकबार फिर लोकसभा चुनाव में जदयू को भाजपा से निमंत्रण मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। जबकि दिसंबर 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू को एनडीए में अप्रत्याशित अंदरूनी प्रतिघात का सामना करना पड़ा था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी निम्नतम स्तर पर पहुंच गई। यह दीगर है कि वादे के तहत भाजपा ने नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाए रखना कबूल किया। लेकिन असहज स्थिति से उबरते हुए नौ अगस्त 2022 को नीतीश वापस पलटकर राजद के साथ हो लिए।
फिर नीतीश कुमार के जदयू के एनडीए में शामिल होने की आशंका जताई जा रही है, तब प्रदेश को विधानसभा भंग करने की बात सामने आई है। और यह बात नीतीश कुमार ने कायदे से राजद प्रमुख लालू प्रसाद के सामने रख दी है। बुजुर्ग लालू यादव को नीतीश कुमार की मदद से मौजूदा विधानसभा में ही पुत्र तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री होते देखने की चाहत थी। ऐसे में इसकी संभावना कम है कि राजद विधानसभा भंग करने के सुझाव को आसानी से मान जाए। विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर राजद के वरिष्ठ नेता अवध नारायण चौधरी हैं। लिहाजा यह काम प्रमुख सहयोगी दल राजद की सहमति के बिना नहीं हो सकता है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार "एक राष्ट्र, एक चुनाव" पर गंभीर विमर्श में लगी है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति इस पर काम कर रही है। तर्क है कि किसी न किसी हिस्से में निरंतर जारी चुनावों से सरकार के खजाने पर बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में नीतीश कुमार का विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ ही चुनाव कराने का सुझाव अपने पुराने साथी भाजपा के भावी एजेंडे की मदद कर रहा है।
इस साल केंद्रीय निर्वाचन आयोग के कैलेंडर में अप्रैल मई में होने वाले लोकसभा के बड़े चुनाव के साथ ही आठ राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव कराना है। इनमें अप्रैल में कार्यकाल पूरा कर रहे आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम विधानसभा शामिल है। इन चारों राज्यों का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही कराने से आयोग के बजट को कुछ राहत मिल सकती है। जबकि सितंबर में जम्मू व कश्मीर,अक्टूबर में हरियाणा व महाराष्ट्र और नवंबर में झारखंड विधानसभा का चुनाव लंबित है।
ऐसे में दिसंबर 2025 में कार्यकाल पूरा कर रही बिहार विधानसभा को डेढ़ साल पहले मध्यावधि चुनाव में झोंकने के अपने नफा और नुकसान हैं। इससे सरकार की सहयोगी राजद का असहज स्थिति में फंसना स्वाभाविक है। जबकि जदयू के लिए यह राजनीतिक फैसला जीवनदायिनी साबित हो सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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