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Bastar: नक्सल नहीं, अब धर्मांतरण है बस्तर का सबसे बड़ा मुद्दा

Bastar: सोमवार 8 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाले बस्तर में थे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने नक्सल समस्या पर कुछ नहीं बोला। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जनसभा करने पहुंचे मोदी ने कांग्रेस और इंडिया एलायंस पर तो हमला बोला लेकिन बस्तर जिस समस्या से दो चार होता रहा है, उस पर मौन रहे।

असल में नक्सली अभी भी बस्तर में प्रभावी तो हैं लेकिन अब यहां ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों का धर्मांतरण ज्यादा बड़ा मुद्दा बन गया है। इसलिए 19 अप्रैल को प्रथम चरण में जब बस्तर में वोटिंग होगी तब धर्मांतरण का मुद्दा हावी रहेगा।

Bastar Lok Sabha constituency

इसका मतलब यह नहीं कि बस्तर में नक्सली कोई मुद्दा ही नहीं रहे। बस्तर में नक्सली हथियारों से कमजोर भले पड़ गये हों लेकिन वैचारिक रूप से वो आज भी चुनावों को प्रभावित करते हैं। इसीलिए कम्युनिस्ट पार्टी के कैंडिडेट का वोट प्रतिशत चुनाव दर चुनाव बढ़ता जा रहा है।

रेड कोरिडोर का हिस्सा बस्तर सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है और 1952 से 1996 तक यह सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। 1998 से 2014 तक यहां भाजपा के सांसद चुने गये। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के दीपक बैज ने भाजपा के बैदूराम कश्यप को 38,982 वोटों से हराकर भाजपा का तिलिस्म तोड़ दिया था। लेकिन इस बार कांग्रेस ने अपने सिटिंग एमपी दीपक बैज का टिकट काटकर सुकमा जिले की कोंटा सीट से विधायक कवासी लखमा को टिकट दिया है।

वहीं भाजपा ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े महेश कश्यप को चुनावी मैदान में उतार दिया है। बस्तर लोकसभा सीट से सीपीआई ने फूलसिंह कचलाम को टिकट दिया है। बसपा से आयतुराम मंडावी चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं किंतु मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशियों के बीच ही है।

बस्तर लोकसभा सीट के अंतर्गत आठ विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें से जगदलपुर एकमात्र अनारक्षित सीट है जबकि शेष सातों विधानसभाएं अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव परिणामों के अनुसार बस्तर लोकसभा की आठ में से 5 विधानसभाओं कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, चित्रकोट तथा जगदलपुर में भाजपा जबकि शेष 3 विधानसभा सीटों बीजापुर, कोंटा और बस्तर में कांग्रेस प्रत्याशी को जीत मिली थी।

इस हिसाब से देखा जाए तो बस्तर में भाजपा का पलड़ा भारी दिखता है किंतु क्या विधानसभा चुनाव की जीत लोकसभा में भी कायम रह पाएगी? दो दशक से भाजपा के कश्यप परिवार की सीट रही बस्तर लोकसभा में इस बार भाजपा प्रत्याशी 'कश्यप' अवश्य है किंतु चार बार सांसद रहे बलिराम कश्यप और दो बार सांसद रहे दिनेश कश्यप परिवार से इनका कोई संबंध नहीं है। यहां कश्यप परिवार के 'साथ' पर भी भाजपा संगठन की नजर है।

जल, जंगल, जमीन के सदाबहार मुद्दे

यह सच है कि 1969 में अस्तित्व में आए नक्सल मूवमेंट की नाभि बस्तर रहा है जिसके गर्भ में आज भी नक्सली फल-फूल रहे हैं किंतु अब इनका प्रभाव और दायरा सिमट गया है, क्योंकि सरकार ने बड़े पैमाने पर बस्तर में विकास कार्य प्रारंभ किए हैं। एक समय बस्तर के हजारों 'सरकार विहीन' गांवों तक जैसे-तैसे कच्ची-पक्की सड़कें बनती जा रही हैं। जिन गांवों में आपसी विवादों का निपटारा नक्सली करते थे, अब सरकारी नुमाइंदे करते हैं। फ़ोर्स भी बस्तर के हर गांव तक पहुंच बनाने में सफल हो रही है।

दरअसल, 'छत्तीसगढ़ का कश्मीर' कहे जाने वाले बस्तर में भौगोलिक विषमता सरकार के कदम रोक देती है। स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी बस्तर में रेल सपना ही है। राष्ट्रीय-राजकीय राजमार्गों को छोड़ दें तो गांवों तक पहुंच पाना कमर तोड़ देता है। सन 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से अधिकांश समय राज्य में भाजपा का शासन रहा है जिसमें बड़े पैमाने पर नक्सल हिंसा से जुड़े नेता या तो पकड़े गए हैं अथवा सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए हैं। यही कारण है कि भाजपा शासन को नक्सली अपने दुश्मन के रूप में देखते हैं।

हाल ही में एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार नक्सलियों ने बस्तर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जिताने की अपील करते हुए पोस्टर्स गांवों में लगवाये थे। नक्सलियों की यह अपील चुनाव में बड़ा मुद्दा बन गई है।

इसके अलावा चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशी वनवासी समाज की मान्यताओं, परंपराओं एवं जल, जंगल, जमीन को लेकर उनकी भावनाओं को लेकर बड़े दावे कर रहे हैं। हालांकि अब तक बस्तर से चुने गए 12 में से 7 सांसदों ने नक्सल समस्या एवं वनवासी संस्कृति को लेकर ही चुनाव लड़ा और जीते। इस बार भी परिदृश्य बदला नहीं है गोयाकि नक्सलवाद और वनवासी संस्कृति इस क्षेत्र में सदाबहार मुद्दा है।

धर्मांतरण इस बार बड़ा मुद्दा

दिसंबर, 2022 से लेकर जनवरी, 2023 के एक महीने में बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले में ईसाई धर्मांतरण को लेकर हिंसा की दर्जनों बड़ी घटनाएं हुईं। चेरांग, भाटपाल, गोहड़ा, गौर्रा, एड़का, बोरपाल, खड़का गांव, चिपरेल, तेरदूल, करमरी, बोरवंड, मोदेंगा जैसे दर्जनों गांवों में हिंदू और धर्मांतरित ईसाईयों के बीच खूनी संघर्ष हुए। चूंकि उस समय राज्य में कांग्रेसनीत भूपेश बघेल की सरकार थी अतः हिंदू पक्ष के 75 से अधिक लोगों पर दर्जन भर से अधिक केस दर्ज किए गए जबकि धर्मांतरित ईसाई आरोपियों को छोड़ किया गया।

इरको गांव के सिंगलूराम दुग्गा व मंगाऊराम कावडे, खड़का गांव के बुधराम बड्डे, एड़का गांव के राजाराम कांवरे व राजूराम दुग्गा आज भी न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं। इन सभी पर 12 से अधिक केस दर्ज हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी इस मुद्दे ने बड़ा असर डाला था जिसके कारण नारायणपुर की सीट कांग्रेस के हाथों से निकल गई थी।

कांग्रेस के पूर्व विधायक चंदन कश्यप भी धर्मांतरित ईसाई पक्ष के साथ खड़े हो गए थे। यहां तक कि नारायणपुर में कांग्रेस सरकार ने कब्रिस्तान के लिए धर्मांतरित ईसाई समूह को जमीन भी दे दी थी। सीपीआई का कैडर भी नारायणपुर में हिंदू विरोधी गतिविधियों में रत रहता है।

हिंदू पक्ष का कहना है कि यहां केरल तथा पूर्वोत्तर के ईसाई पादरी आकर वनवासी हिंदू ग्रामीणों को इलाज के नाम पर बरगलाते हैं और उन्हें ईसाईयत में धर्मांतरित करते हैं। नक्सल समर्थकों का भी उन्हें इसमें साथ मिलता है। फिर जो वनवासी हिंदू ईसाई बन जाते हैं वे अपना सरनेम नहीं बदलते, मंदिर से बैर रखते हैं और हिंदू परंपरा नहीं मानते किंतु वनवासी होने के लाभ भी लेते रहते हैं।

इसलिए इस बार 'डीलिस्टिंग' बड़ा मुद्दा है और इस मांग को लेकर हिंदू पक्ष एकजुट हुआ है। नारायणपुर से निकलकर यह मुद्दा अब बस्तर की चुनावी रंगत को और गहरा कर रहा है। इसके अलावा बस्तर में रोजगार, पलायन, विकास, कृषि जैसे मुद्दे भी हैं किंतु उनका जोर मात्र शहरी सीमा तक चल रहा है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं मुद्दे हैं जो दशकों से बस्तर में छाए हुए हैं जिनके समाधान का आज तक ईमानदार प्रयास नहीं हुआ है।

बस्तर के मतदाता इस बार भी मतदान द्वारा अपनी किस्मत बदलने की मंशा पाले बैठे हैं किंतु राजनीतिक दलों की राजनीति को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि उनकी मंशा कितनी और कैसे पूरी होगी? फिलहाल तो देश के लिए अबूझ पहेली सा बस्तर अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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