Secular Socialists: समाजवादी राजनीति का सेक्युलर हैंगओवर समाप्त क्यों नहीं होता?

Secular Socialists: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की नेता वृन्दा करात ने कहा है कि उनकी पार्टी की ओर से कोई भी रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं होगा। कुछ दिन पहले उन्हीं की पार्टी के महासचिव कॉमरेड सीताराम येचुरी को मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आने का न्यौता दिया गया था। इस मौके पर जो उन्होंने कहा वह यह कि "हम धार्मिक भावनाओं की कद्र करते हैं लेकिन इस तरह से धर्म को राजनीति से जोड़कर आप इस्तेमाल करेंगे तो हम उसको सही नहीं मानते। देश का संवैधानिक प्रावधान है कि भारत सरकार किसी धार्मिक रंग की नहीं होनी चाहिए, यह उसका उल्लंघन है।"

अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थित मंदिर को लेकर कम्युनिस्टों का विरोध और विद्रोह एक अलग ही चैप्टर है जिसने भारतीय राजनीति को बहुत गहरे में प्रभावित किया है। लेकिन यह एक सोशलिस्ट हैंगओवर है जिससे देश की राजनीति आज भी मुक्त नहीं हो पा रही है कि हिन्दू धर्म की बात आते ही अपने आपको सेक्युलर साबित करने में जुट जाना है। जबकि बात अगर ईसाई, मुस्लिम की हो अल्पसंख्यकवाद के नाम पर तत्काल उसके साथ खड़ा हो जाना है। तब संविधान का सेक्युलर चरित्र इन समाजवादी और कम्युनिस्ट नेताओं की राह में कोई रोड़ा नहीं बनता।

Secular Socialists: Why doesnt the secular hangover of socialist politics end?

इस मानसिकता से अकेले कम्युनिस्ट ही ग्रसित हैं ऐसा नहीं है। कम्युनिस्टों से अलग अपने आपको सोशलिस्ट कहनेवाले नेता और दल भी इसी हैंगओवर के शिकार हैं। दस साल पहले तक अपने आपको 'घोर हिन्दू विरोधी' साबित करने में जुटे ये नेता मोदी के उभार के बाद अपने आपको हिन्दू विरोधी तो नहीं दिखाना चाहते लेकिन समर्थक भी नहीं दिखना चाहते। इसलिए नीतीश कुमार हों या अखिलेश यादव। इन्होंने एक अलग लाइन खींच दी है कि "हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं।" लेकिन खुद का धार्मिक चरित्र क्या है, इस पर बात नहीं करना चाहते।

अपनी रूढ मानसिकता के साथ काम वो हिन्दू विरोध का ही करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए दाहिने बायें से रास्ता निकालते हैं। जैसे बिहार के शिक्षा मंत्री ने हमला तो हिन्दू धर्म पर ही किया लेकिन बहाना रामचरित मानस की कुछ चौपाइयों को बनाया। इसी तरह समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य हमला तो हिन्दू धर्म पर ही करते हैं लेकिन उसके लिए दाहिने बायें से रास्ता निकालते हैं। मसलन, कभी कहेंगे कि रामचरित मानस की चौपाइयों में खोट है तो कभी कहेंगे ब्राह्मणवाद एक शोषणकारी व्यवस्था है जो हिन्दू धर्म में अनिवार्य बुराई है।

इन नेताओं के बयान पर जब उनकी पार्टी के मुखिया से पत्रकार सफाई मांगते हैं तो उनका वही रटा रटाया जवाब होता है कि हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं लेकिन अगर कोई हिन्दू धर्म की कमियों पर सवाल उठा रहा है तो उसमें गलत क्या है? फिर चाहे नीतीश कुमार हों, तेजस्वी यादव हों या फिर अखिलेश यादव। अपने आप को समाजवादी कहलाने वाले ये सभी नेता इसी लाइन पर बयान देते हैं और परोक्ष रूप से हिन्दू विरोध को उचित ठहराते हैं। हालांकि स्वामी प्रसाद मौर्य को छोड़कर इनमें से किसी ने भी अपने आपको अब तक अहिन्दू घोषित नहीं किया है लेकिन हिन्दू धर्म पर राजनीतिक हमला उनकी उस सोच को संतुष्ट करता है जिसे आज सोशलिस्ट राजनीति का सेकुलर हैंगओवर कहा जा सकता है।

स्वतंत्रता के पहले 1925 में दो प्रमुख राजनीतिक विचारधाराओं का भारत में पौधारोपण हुआ था। एक थी संघ की विचारधारा और दूसरी कम्युनिस्ट विचारधारा। स्वतंत्रता के बाद संघ की राजनीतिक विचारधारा तो उतनी तेजी से नहीं फली फूली लेकिन कम्युनिस्टों ने जिस सेक्युलर राजनीति का नैरेटिव गढा था वह कांग्रेस पर पूरी तरह हावी होता गया। प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू की फेबियन सोशलिज्म वाली मानसिकता इसके बहुत खिलाफ नहीं थी। इसलिए स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक रूप से कम्युनिस्टों की सेक्युलर राजनीति' वाला नैरेटिव बहुत तेजी से राजनीतिक विमर्श की मुख्यधारा बन गया।

कांग्रेस में भी जो धर्मनिष्ठ नेता थे उन्हें नेहरू द्वारा किनारे लगा दिया गया। 1976 के आपातकाल में तो कांग्रेस और कम्युनिस्ट तराजू के एक ही पलड़े पर बैठ गये और संविधान की मूल प्रस्तावना में ही छेड़छाड़ करके 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' जोड़ दिया। समाजवाद और साम्यवाद के बीच जो वैचारिक अंतर था उसे भारत में पाट दिया गया। कम से कम धर्म विहीन और बहुसंख्यकवाद के खिलाफ की राजनीति पर दोनों एकमत थे। आपातकाल के खिलाफ जो जेपी आंदोलन हुआ उसमें भले ही कम्युनिस्ट शामिल नहीं थे लेकिन धर्मविहीन राजनीति का विचार उस आंदोलन की भी अगुवाई कर रहा था।

इंदिरा गांथी सरकार में 1966 में दिल्ली के गौरक्षा आंदोलन पर गोलीबारी हो या फिर मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा अयोध्या में रामभक्तों पर गोलीबारी। दोनों के पीछे यही बहुसंख्यक विरोधी सेकुलर मानसिकता ही काम कर रही थी। इन दोनों ऐतिहासिक घटनाओं ने अलग अलग समय में देश को झकझोर दिया और कम्युनिस्टों के नैरेटिव पर नाचते सोशलिस्टों से देश के लोगों का मोहभंग होना शुरु हो गया। फिर वह कांग्रेस हो या फिर अन्य छोटे समाजवादी दल। बीजेपी का गठन और उसको मिला समर्थन इसी छद्म और कपट से भरी सेकुलर राजनीति का ही जवाब था जो सेकुलरिज्म के नाम पर पूरी तरह से एक समुदाय विशेष को विशेष नागरिक का दर्जा देने लगा था।

भारत का राजनीतिक चरित्र कुछ ऐसा हो गया था मानों बहुसंख्यकों को सबक सिखाने या उन्हें दबाकर रखने के लिए सबसे उग्र अल्पसंख्यक को पाल पोसकर तैयार किया जा रहा हो। इसके पीछे इन राजनीतिज्ञों का क्या हित था यह तो पता नहीं लेकिन यह चाहे जो रहा हो लेकिन सेकुलरिज्म बिल्कुल नहीं था। नब्बे के दशक में जब यह अपने चरम पर था उसी समय देश के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा दे दिया। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने से शुरु हुआ सफर नरेन्द्र मोदी तक पहुंचा तो समर्थन प्रचंड बहुमत में बदल गया। आगे इसमें उतार आता भी नहीं दिख रहा है लेकिन सेकुलर राजनीति के हैंगओवर के शिकार नेता अभी भी समाजवाद के स्वर्णकाल में जी रहे हैं, जब अपने आपको हिन्दू कहना भी राजनीतिक पाप समझा जाता था।

समय बदला तो राजनीतिक परिदृश्य भी बदला। जिन बहुसंख्यकों का सिर्फ इसलिए राजनीतिक दमन किया गया कि वो अपनी धार्मिक पहचान न रखें उन्होंने प्रतिक्रिया दी और अपनी धार्मिक पहचाव को महत्व भी। भारत में धर्म का अर्थ क्रिश्चियनिटी और इस्लाम की तरह किताबों में लिखी गयी मजहबी मान्यताओं को मानकर जीवन जीना नहीं है। भारत के लोगों के लिए धर्म समाज की आत्मा है जो व्यक्ति को सुखी और शांत जीवन जीने की कला सिखाता है। भारत के लिए धर्मराज्य का अर्थ किसी एक मत या मजहब का शासन नहीं होता जिसमें दूसरे मत या मजहब के लोगों को प्रताड़ित किया जाए। भारत के लोगों के मन में स्वभाव से अल्पसंख्यकों को संरक्षण का भाव रहता है, इसके लिए उन्हें किसी आयातित राजनीतिक विचार की जरूरत नहीं है।

यह बात अतीत हो चुके कम्युनिस्टों और अतीत होते बचे खुचे सोशलिस्टों को भी समझना होगा। एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में कम्युनिस्ट चीन अगर बहुसंख्यक हान समुदाय की उपेक्षा नहीं करता तो यहां कांग्रेसी, कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट बहुसंख्यक हिन्दुओं को 'राजनीतिक पापी' घोषित करने की मानसिकता रखकर कितने दिन प्रासंगिक रह पायेंगे?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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