Atal Bihari Vajpayee: सर्वसमावेशी नेता थे अटलजी
Atal Bihari Vajpayee: अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन की बहुत सारी उपलब्धियां थी। लेकिन उनके अपने लिए सबसे बड़ी उपलब्धि सबसे बड़ी यह थी कि उन्होंने देश में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया था। 13 दिन और 13 महीने की सरकार गंवाने के बाद जब वो तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उनके सामने लक्ष्य स्पष्ट था। एक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में वो सफल भी रहे।
आज जब भाजपा के नेता नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करके तीसरा कार्यकाल हासिल करना चाहते हैं तब इस बात का उतना महत्त्व न समझ में आये। लेकिन 90 के दशक में जब अस्थिर सरकारों का बोलबाला था तब कांग्रेसी नेता ठसक के साथ कहा करते थे कि कांग्रेस के अलावा कोई और पार्टी सरकार चलाना नहीं जानती। इसलिए कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करके इस मिथक को तोड़ दिया था।

हालांकि इसके बावजूद उन्होंने कांग्रेस या विपक्षी नेताओं के लिए कभी व्यक्तिगत शत्रुता नहीं रखी। बड़प्पन उनकी शख्सियत का उजला पहलू था। वे जवाहरलल नेहरू की तारीफ़ कर सकते थे। इंदिरा गांधी को बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बता सकते थे और विपक्ष के बहुत सारे नेताओं से दोस्ताना संबंध रखने की कला में उनका मुकाबला नहीं था।
वाजपेयी की इसी शख़्सियत का असर था कि वाजपेयी के कुछ ऐसे दोस्त बने जो जीवन भर उनके साथ रहे। लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसी आत्मीय जोड़ी भारतीय ही नहीं, विश्व राजनीति में भी मिलना संभव नहीं है। संघ से दूरी रखने वाले जसवंत सिंह उनके ताउम्र करीबी दोस्त बने रहे और संघ के विरोध के बाद भी जसंवत सिंह को एक से बढ़कर एक मंत्रालय दिए।
1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद परमाणु परीक्षण से पूरा देश और दुनिया हैरान थी। उन्होंने एटमी परीक्षण का फ़ैसला कर अचानक देश में राष्ट्रवाद का एक नया ज्वार पैदा किया। लगभग पूरे देश ने इसे राष्ट्र के शौर्य की तरह देखा। कम लोगों को मालूम है कि 1996 में अपने प्रधानमंत्री के पहले ही कार्यकाल में वाजपेयी जी ने परमाणु परीक्षण करने का मन बना लिया था पर 13 दिन में सरकार गिरने के कारण संभव नहीं हो सका।
वाजपेयी जी ने अपने बड़प्पन और उदारता से जॉर्ज फर्नाडीस, ममता बनर्जी और जयललिता जैसे असंभव समझे जाने वाले सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार चलाई तो सिर्फ इसलिए कि उनके व्यक्तित्व के आगे उनके विरोधी ख़ुद को नतमस्तक पाते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मोहक अंदाज राजनीति में अपने धुर विरोधियों के लिए भी करूणा से ओतप्रोत था। उनकी भाषण कला से सदन में क्या सरकार और क्या विपक्ष, सब मंत्रमुग्ध हो जाते थे। 1977 में आपातकाल हटाए जाने पर दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की उस रैली को कौन भूल सकता है जिसमें अटल जी ने अपने अनोखे अंदाज में आंखे मूंदकर कहा था 'खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने?'
शांति दूत के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान से बातचीत के हिमायती रहे। सारी परंपराओं को धता बताते हुए अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ से मिलने वे बस से लाहौर तक गए। लेकिन जब लाहौर बस यात्रा से मिली कूटनीतिक बढ़त को कारगिल में चुनौती मिली तो पाकिस्तान को कारगिल में सबक भी सिखाया। अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति उनसे मिली चिरस्थायी सौगातों में से एक थी। बुनियादी रूप से अटल बिहारी वाजपेयी एक रणनीतिकार थे जो चीन,पाकिस्तान और अन्य राष्ट्रों के साथ संबंधों को सुधारने और उनके साथ व्यापार बढ़ाने को लेकर गंभीर थे।
अटल जी एक महान समावेशी नेता थे। नेहरू के आलोचक होने के साथ ही अटल जी नेहरू के प्रशंसक भी थे। नेहरू भी युवा अटल को पसंद करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी स्वभाव से ही लोकतांत्रिक थे। संघ की छाया में काम करने के बाद भी अटल जी ने संघ से अलग अपना व्यक्तित्व बनाए रखा। अटल जी का यह लोकतांत्रिक स्वरूप समय समय पर अनेक रूपों में प्रकट होता रहा।
अटल जी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में विरोधी दलों या नेताओं के प्रति कभी कोई प्रतिशोधात्मक कदम नहीं उठाया। सत्ता ने कभी उन्हें मदांध नहीं किया। 50 साल विपक्ष में रहने के बावजूद अटलजी के भाषणों या लेखों में कभी कटुता नहीं दिखी। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि कोई नेता छह दशक से ज्यादा राजनीति में रहे और उसके पूरे राजनीतिक जीवन में ऐसा एक भी उदाहरण आप न बता पाए, जो कटुता, मर्यादाहीनता और समाज में वैमनस्य का पर्याय माना जा सके।
अटल जी की राजनीति का व्याकरण उन नेताओं से भिन्न था जिनकी विचारधारा का वे समर्थन करते थे। संघ से कई मामलों में वैचारिक मतभेद होने के बाद भी अटल जी अपने को स्वयंसेवक कहने में गर्व करते थे। उन्हें भगवाधारी संघ परिवार का सौम्य चेहरा माना जाता था। दरअसल वाजपेयी मूलतः संघ से प्रशिक्षित थे और इसे उन्होंने विभिन्न अवसरों पर स्वीकार भी किया। उनकी विचार-यात्रा में भी संघ का प्रभाव उनके राष्ट्रवादी तेवरों में मेल खाता था। उनकी बहुत सारी कविताएं राष्ट्रवाद के इसी संस्करण से निकली हैं, जिनमें पाकिस्तान को चेतावनी देने से लेकर देश के लिए जान देने का जज्बा तक मिलता है। अटल जी ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री कितने दिन रहेंगे कह नहीं सकते लेकिन स्वयंसेवक वह जिंदगी भर रहेंगे। संघ निष्ठा वह विभिन्न मौकों पर विभिन्न रूपों में प्रकट करते थे।
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय' उनकी बहुचर्चित और बेहद लोकप्रिय कविता रही। संघ के स्वयंसेवक होने के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी के कई फैसलोे ने संघ को नाराज किया। स्वदेशी को अपना आर्थिक दर्शन मानने वाले संघ की चेतावनी के बाद भी अटल सरकार उदारीकरण के रास्ते पर बढ़ी थी। अटल जी की सरकार में पहली बार विनिवेश का अलग मंत्रालय बना था और मज़दूर संगठनों के विरोध के बावजूद सरकारी कंपनियां बेची गई। इसी दौर में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन योजना के स्थान पर नई पेंशन योजना लागू करने का भी फ़ैसला हुआ।
अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में देश ने संसद और अक्षरधाम पर हमला देखा। कंधार के समय आतंकियों की मांग के आगे सरकार का शर्मनाक समर्पण भी देखा। इन सबके लिए अटल सरकार की अलोचना होती रही। लेकिन इन सबके बाद भी अटल बने रहे तो इसलिए कि उनका विकल्प न संघ के पास था न भाजपा के पास। विपक्ष में रहते हुए सत्ता पक्ष के उजले को उजला कहने की उदारता कितने नेताओं में होती है? यदि भारतीय संसद ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद और भारत सरकार ने 'भारत रत्न' की उपाधि दी है तो अटल जी के व्यक्तित्व के कारण इन उपाधियों का सम्मान ही बढ़ा।
2004 में शाइनिंग इंडिया के नारे के बाद भी चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने धीरे धीरे राजनीति से अपने आप को अलग कर लिया। गिरते स्वास्थ्य की वजह से वो एकांतवास में चले गये और लगभग बारह साल एकांतवास में रहते हुए 16 अगस्त 2018 को इस संसार से विदा हो गये। लेकिन अपने पीछे राजनीति में जो उदाहरण प्रस्तुत कर गये वह उनको भारतीय राजनीति में सदैव अटल बनाकर रखेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)











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