CM Face: जब चुनाव चिन्ह पर वोट पड़ता है तो चेहरों की चर्चा क्यों?

CM Face: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव अब अंतिम दौर में हैं। मिजोरम, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मतदान संपन्न हो चुका है। 30 नवंबर को तेलंगाना में मतदान के बाद 3 दिसंबर को चुनाव परिणाम घोषित किये जाएंगे। लेकिन अगर लोकसभा का सेमीफाइनल कहे जानेवाले इन विधानसभा चुनावों को देखें तो एक बार फिर चुनाव में चेहरे की चर्चा हुई। यानी किस राज्य में कौन सी पार्टी किस चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ेगी?

भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है और यहां दल अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ते हैं। मतदाताओं के बीच वही चुनाव चिन्ह पहचान होते हैं और उसी से पार्टियों की जीत हार सुनिश्चित होती है। जो दल जीतता है वह अपने जीते हुए विधायकों या सांसदों द्वारा अपने दल का नेता चुनता है। इसके बाद वही चुना हुआ नेता राष्ट्रपति या राज्यों में राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करता है। राष्ट्रपति या राज्यपाल उसके बहुमत के दावे को परखते हैं और पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद सरकार बनाने का न्यौता देते हैं।

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लेकिन व्यावहारिक रूप से ऐसा कभी हो नहीं पाया। ये बातें सिद्धांत रूप में लागू हैं और औपचारिक रूप से इसकी खानापूर्ति भी की जाती है लेकिन स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक यात्रा देखें तो पार्टी सिम्बल से अधिक नेता ही पार्टी का चेहरा बनते आये हैं। स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक जवाहरलाल नेहरु कांग्रेस की पहचान रहे। 1951 से 1971 कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था। 1971 से 1977 तक गाय बछड़ा इंदिरा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था जबकि 1977 के बाद से हाथ का पंजा कांग्रेस का चुनाव निशान है। लेकिन इन 73 सालों में कांग्रेस के नेताओं से ही कांग्रेस की पहचान होती रही।

अब क्योंकि आजादी के बाद कांग्रेस में एक ही परिवार का आधिपत्य रहा है इसलिए उसकी पहचान कभी नेहरु से, कभी इंदिरा से तो कभी राजीव गांधी से होती रही। 1991 में राजीव गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद कुछ साल के लिए नेहरु वंश का प्रभाव कांग्रेस में कम हुआ लेकिन सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद से कांग्रेस की पहचान एक बार फिर नेहरु-गांधी वंश बन गया। फिर भी जब से सोनिया गांधी अध्यक्ष बनी हैं उसके बाद केन्द्र में कोई भी चुनाव कांग्रेस के प्रायोजित चेहरे की बजाय पार्टी के चुनाव चिन्ह को ही आगे करके लड़ा जा रहा है। कारण या मजबूरी चाहे जो हो, लेकिन सच्चाई यही है।

दूसरी ओर विपक्ष में जनसंघ का उदय देश के पहले आमचुनाव 1951 के समय में ही हो गया था। 1951 से 1977 तक जनसंघ का चुनाव निशान जलता दीपक रहा और 1980 के बाद भारतीय जनता पार्टी बन जाने के बाद कमल का फूल बन गया। जनसंघ हो या भाजपा इसमें किसी एक परिवार का प्रभुत्व कभी नहीं रहा और यह संगठन आधारित दल बना लेकिन इसकी पहचान भी इसके शीर्ष नेताओं से ही होती थी। शुरुआत में श्यामा प्रसाद मुखर्जी उसके बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी इस पक्ष की पहचान बने।

नब्बे के दशक में जब कांग्रेस किसी नेहरुवंश वाले चेहरे के अभाव में थी और अन्य दल भी नये नये चेहरों के साथ मैदान में थे तब अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा का एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे। नब्बे के दशक में उनकी स्वीकार्यता सर्वाधिक थी और इसका लाभ भी भाजपा को मिला। 1996 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने और एक बार अपना कार्यकाल भी पूरा किया। लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी के उभार ने अब तक के सारे चेहरों को धूमिल कर दिया।

2013 में भाजपा के भीतर यह बहस बहुत हुई कि क्या पार्टी लाइन से अलग हटकर चुनाव से पहले किसी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करना चाहिए? भाजपा में इसे लेकर विरोधाभास तो था लेकिन मोदी के आक्रामक प्रचार और सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल से वो स्वयं 'सर्वाधिक लोकप्रिय' नेता बन गये। 2014 में चुनाव जीतने के बाद जब बीजेपी पार्लियामेन्ट्री बोर्ड ने उन्हें अपना नेता घोषित किया तब वह महज एक औपचारिकता भर थी।

परंतु आश्चर्यजनक रूप से जो नरेन्द्र मोदी स्वयं पार्टी सिम्बल की बजाय एक मजबूत चेहरा बनकर चुनाव जीतने का पुरजोर समर्थन कर चुके हों, उनके समर्थक उसको सही भी ठहरा चुके हों, वही मोदी राज्यों में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करना चाहते। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान तीनों ही जगह भाजपा सामूहिक नेतृत्व के नाम पर चुनाव लड़ रही है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। भारत की संसदीय प्रणाली में दल ही चुनाव लड़ते हैं और चुनाव के बाद अपने नेता का चयन करते हैं। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि अगर यह फार्मूला राज्यों पर लागू हो सकता है तो फिर केन्द्र में भाजपा किसी चेहरे पर चुनाव क्यों लड़ना चाहती है?

संभवत: भाजपा के पास इस सवाल का जवाब शायद यह होगा कि उनके पास लोकसभा से लेकर ग्रामसभा चुनाव तक एक चेहरा है तो किसी और की जरूरत क्या है। लेकिन संगठन आधारित बीजेपी से उलट कांग्रेस पूरी तरह से नेता आधारित पार्टी है। इंदिरा गांधी ने एक दौर में क्षेत्रीय क्षत्रपों को ठिकाने लगाया था जिसका परिणाम कांग्रेस को आज तक भोगना पड़ रहा है। इसलिए केन्द्र में अगर नेहरुवंश कांग्रेस की पहचान है तो राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रप उसको संभालकर रखते हैं। इसलिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, तेलंगाना, छत्तीसगढ और राजस्थान चारों जगहों पर वह अपने भावी मुख्यमंत्री के चेहरों को प्रायोजित करके चुनाव लड़ रही है। कर्नाटक की तरह चुनाव के बाद घोषित चेहरा मुख्यमंत्री बनेगा या नहीं बनेगा यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा लेकिन मध्य प्रदेश में कमलनाथ हों या छत्तीसगढ में भूपेश बघेल, तेलंगाना में रेवंत रेड्डी हों या राजस्थान में अशोक गहलोत। ये सभी चुनाव को फ्रंट से लीड कर रहे हैं और बतौर चेहरा अपने आपको प्रस्तुत भी कर रहे हैं।

संसदीय लोकतंत्र में व्यवस्था भले ही दलीय हार जीत की हो लेकिन चुनाव के समय कोई मजबूत चेहरा एक मजबूरी बनता जा रहा है। वह कोई एक चेहरा ही होता है जो जीत हार को अपने कंधों पर ढोता है। संवैधानिक रूप से भले ही इसकी व्यवस्था न हो लेकिन व्यावहारिक रूप से इसकी प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता। फिर भी पार्टियों का केन्द्रीय नेतृत्व राज्यों में चेहरा घोषित करने से संभवत: इसलिए हिचकता है क्योंकि चुनाव के बाद वह अपनी मर्जी नहीं चला पाता। बहरहाल, चार बड़े राज्यों के चुनाव परिणाम जब आयेंगे तो उनका विश्लेषण इस दृष्टिकोण से जरूर होगा कि चेहरों का हार जीत पर कितना असर होता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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