Ashok Chavan: भाजपा के दरवाजे सब दागियों के लिए क्यों खुल रहे है?
डी.पी. यादव की याद आती है, वह अपने जमाने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली थे। अस्सी के दशक में वह मुलायम सिंह के नजदीक आ गए, जिन्होंने 1989 में बुलन्दशहर से जनता दल का टिकट दिला दिया।
चुनाव जीत कर डीपी यादव विधायक बने, उधर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन गए थे, उन्होंने पहली बार जीते डी.पी. यादव को अपने मंत्रीमंडल में केबिनेट मंत्री बना दिया था। 1996 में वह मायावती के चहेते बन गए और बसपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत कर संसद में पहुंच गए।

1998 में वह भाजपा में घुस कर भाजपा का टिकट पा गए थे। तब संभल लोकसभा सीट पर ही उनका मुकाबला मुलायम सिंह से हुआ और वह हार गए। लोकसभा चुनाव हारने के बाद उसी साल उत्तर प्रदेश के 40 विधायकों को खरीद कर वह राज्यसभा में पहुंच गए थे।
इस बीच 2004 में उनकी दुबारा भाजपा में एंट्री हुई। जिस पर भाजपा के खिलाफ इतना बड़ा जनाक्रोश पैदा हो गया कि चार दिनों में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने दखल देते हुए उन्हें पार्टी से निकाल बाहर किया।

तब भारतीय जनता पार्टी लोकलाज की चिंता करती थी। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी के दरवाजे हर किसी के लिए खोले जा रहे हैं। हेमंत बिस्व सरमा, सुवेंदू अधिकारी, मुकुल राय, अजित पवार, सुखराम, नारायण राणे, नितेश राणे पर विपक्ष सवाल उठाता रहा है। इन सभी पर भ्रष्टाचार या अन्य आपराधिक मुकदमे चल रहे थे।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ अपनी राजनीतिक लड़ाई को जारी रखे हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ईडी और सीबीआई ने जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाई हुई है, क्या महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को भाजपा में शामिल किए जाने से उस मुहिम पर सवाल नहीं खड़े होंगे। अशोक चव्हाण के लिए भाजपा के दरवाजे खुलने के बाद यह सवाल खड़ा होता है कि भाजपा के दरवाजे दागियों के लिए इतनी जल्दी क्यों खुल जाते हैं।
भाजपा की ओर से आदर्श हाउसिंग सोसायटी का मामला बड़े पैमाने पर उठाए जाने के कारण ही 2010 में अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। 2010 में मुम्बई का आदर्श हाउसिंग सोसायटी का घोटाला राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था, क्योंकि सेना की हाउसिंग सोसाइटी के लिए आवंटित जमीन पर बनाई गई हाउसिंग सोसायटी में राजनीतिक दलों के नेताओं को फ्लेट अलाट किए गए थे, जिनमें अशोक चव्हाण के रिश्तेदार भी शामिल थे।
इसमें अशोक चह्वाण की सास के नाम पर भी एक फ्लेट था, कुल 25 राजनीतिज्ञों को फ्लेट अलाट किए गए थे। यह घोटाला 1999 में शुरू हुआ, जब सेना के कुछ पूर्व अधिकारियों ने हाउसिंग सोसाइटी के लिए मुख्यमंत्री के सामने आवेदन किया था। सरकार ने उसी महीने कुछ दिनों में ही जमीन अलॉट कर दी, 2004 में जमीन सोसाइटी को सौंप दी गई, लेकिन 2010 में भारतीय नौसेना ने सुरक्षा की दृष्टि से हाउसिंग सोसाइटी बनाने का विरोध किया।
बाद में खुलासा हुआ कि कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम पर इस सोसाइटी में फ़्लैट ले लिए थे, जबकि उनका या उनके रिश्तेदारों का सेना से कोई ताल्लुक नहीं था। घोटाला खुला तो अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि सोसाइटी में उनके दो रिश्तेदारों के नाम भी थे। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान बड़ा घोटाला माना था।
इस घोटाले की धीमी गति से सीबीआई जांच अभी भी चल रही है, हालांकि 2014 में सीबीआई ने अदालत में एक याचिका दाखिल कर के अशोक चव्हाण का नाम एफआईआर से हटाने की मांग की थी, कोर्ट ने सीबीआई की याचिका खारिज कर दी थी। अशोक चव्हाण इसके खिलाफ हाईकोर्ट गए, तो हाईकोर्ट ने भी उनका नाम हटाने से इनकार कर दिया|
2016 में सीबीआई इजाजत लेने के लिए दुबारा राज्यपाल के पास गई, तो राज्यपाल ने अशोक चव्हाण के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की इजाजत दे दी, क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार आ चुकी थी। अशोक चव्हाण राज्यपाल की इजाजत के खिलाफ हाईकोर्ट गए, दिसंबर 2017 में हाईकोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार ली और उनके खिलाफ मुकद्दमा चलाने के राज्यपाल की इजाजत को रद्द कर दिया।
सीबीआई ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की हुई है। अशोक चव्हाण के अब पाला बदल कर भाजपा में शामिल होने के बाद सीबीआई का रूख क्या होगा। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता बार बार आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी वाशिंग मशीन बन गई है, जिसमें शामिल होते ही दागियों के दाग धुल जाते हैं, फिर वह दाग कितने भी गहरे क्यों न हों। सवाल यह है कि क्या भाजपा में शामिल होने के बाद अशोक चव्हाण के दाग भी धुल जाएंगे। भारतीय जनता पार्टी क्या नारायण राणे की तरफ अशोक चव्हाण को राज्यसभा में भेजकर उपकृत करेगी।
महाराष्ट्र सरकार ने भाजपा के दबाव में एक आयोग भी बनाया, जिसने अपनी रिपोर्ट में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों विलासराव देशमुख,,सुशील कुमार शिंदे और अशोक चव्हाण को घोटाले में शामिल बताया था। अशोक चव्हाण एकमात्र पूर्व मुख्यमंत्री थे, जिन्हें घोटाले में आरोपी बनाया गया था, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें आरोपी बनाने की इजाजत नहीं दी। तो सीबीआई ने उनका नाम एफआईआर से हटाने की याचिका लगाई थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया था।
सीबीआई जांच की निगरानी मुम्बई हाईकोर्ट कर रहा है, 2012 में मुम्बई हाईकोर्ट ने ईडी से भी जांच में शामिल होने के लिए कहा था। कोर्ट धीमी जांच के लिए ईडी को भी डांट पिला चुकी है। लेकिन भाजपा की वाशिंग मशीन में अशोक चव्हाण के दाग धुलने के बाद ईडी और सीबीआई का रवैया अब क्या होगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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