Artificial Intelligence Risks: एआई के खतरों से सजग होती दुनिया
आर्टिफिशिएल इन्टेलिजेन्स (एआई) के दुष्प्रभावों और भावी खतरों ने बौद्धिकों और प्रभावशाली देशों की सरकारों के कान खड़े कर दिए हैं। अब इस पर नियंत्रण की तैयारी शुरू हो चुकी है।

पिछले कुछ दिनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) अर्थात एआई की दुनिया में और एआई की वजह से हमारी दुनिया में बहुत कुछ घटित हुआ है। एआई के रूप में दुनिया को जो एक सहूलियत मिली थी, लोगों ने उसे अपनी मनमानी का हथियार बना लिया। इससे कुछ लोगों के अत्यधिक ताकतवर हो जाने का खतरा काफी बढ़ चुका है। शक्ति और प्रभुत्व की इसी चाह की वजह से, एआई कंपनियों में पूंजीपतियों का निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है।
कुछ दिन पहले अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने गूगल, ओपेन एआई, माइक्रोसॉफ्ट व एन्थ्रोपिक जैसी अग्रणी एआई कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को व्हाइट हाउस में बुलाकर उन्हें इससे जुड़े जोखिमों पर ध्यान देने और संभावित खतरों को सीमित करने के लिए कहा है। वहीं दूसरी ओर यूरोप में भी एआई को हाई रिस्क घोषित करने की तैयारी शुरू हो गई है।
यूरोपियन यूनियन (ईयू) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अंकुश लगाने के लिए नया कानून बना रही है। इसने अमेरिकी टेक कंपनियों को चिंता में डाल दिया है। ओपेन एआई (चैट जीपीटी डेवलप करने वाली कंपनी) के सीईओ सैम एल्टमैन ने कहा है कि अगर उनकी कंपनी ईयू के प्रस्तावित एआई कानूनों का पालन करने में कठिनाई अनुभव करेगी तो वह ईयू के सदस्य देशों से अपना व्यवसाय समेट सकती है।
यही एल्टमैन हैं, जिन्होंने पिछले हफ्ते अपने सहयोगियों के साथ एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा था कि एआई अगले दस सालों में मनुष्य से आगे निकल जाएगी। उनका कहना था कि सुपर इंटेलीजेंस वाली एआई को मैनेज किए जाने की जरूरत है। उनका आशय कुशलता और उत्पादकता से था। एआई पहले ही बहुत से क्षेत्रों में मानव से बेहतर प्रदर्शन कर रही है। समय और गुणवत्ता, दोनों की दृष्टि से। जैसे-जैसे यह उन्नत होती जाएगी, इन क्षेत्रों की संख्या भी बढ़ती जाएगी।
एआई से होगी 35 लाख करोड़ की सालाना ग्रोथ
अमेरिकी फाइनेंशियल कंपनी गोल्डमैन सैक्स ने अनुमान जताया है कि जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की आय में हर साल 35 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होगी। इसका अधिक से अधिक हिस्सा हथियाने के लिए गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और उनके जैसी कई बड़ी टेक कंपनियों में एक-दूसरे से बेहतर एआई प्रोग्राम डेवलप करने की होड़ शुरू हो चुकी है। यह होड़ कुछ वर्षों के भीतर एआई को असीमित शक्तियॉं दे देगी। जिसका सीधा असर मनुष्यों पर पड़ेगा। एआई एक सीमा से ज्यादा एडवांस्ड न हो पाए, इसके लिए एल्टमैन इंटरनेशनल न्यूक्लियर एनर्जी एजेंसी जैसी संस्था के गठन का सुझाव देते हैं, जो इसकी बढ़ती शक्ति पर निगरानी रख सके।
लेकिन, सुझाव देना अलग बात है और उन पर अमल करना एकदम अलग। यही कारण है कि जब ईयू एआई कंपनियों पर कानूनी रूप से नियंत्रण चाहता है तो सैम एल्टमैन यूरोप में कारोबार बंद करने की बात करते हैं। सैम एल्टमैन को अगर वाकई मानवता की इतनी फिक्र है तो उन्हें एआई के गॉडफादर माने जाने वाले जेफ्री एवरेस्ट हिंटन से सीखना चाहिए।
प्रतिस्पर्धा ने एआई को बनाया और खतरनाक
यही वजह है कि एआई और चैटबोट्स को संभव बनाने के लिए जरूरी तकनीक पर दशकों तक शोध करने वाले हिंटन आज इसके मुखर विरोधियों में सबसे आगे खड़े हैं। वह इसकी खोज को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल बताते हैं। 1978 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पीएचडी करने वाले हिंटन ने 2012 में न्यूरल नेटवर्क (Neural Network) डेवलप किया था जो चित्रों का विश्लेषण कर उन्हें पहचान सकता था। चैटजीपीटी समेत जितने भी एआई टूल डेवलप किए गए हैं या किए जा रहे हैं, वे हिंटन की डीप न्यूरल नेटवर्क रिसर्च पर ही आधारित हैं।
हिंटन के न्यूरल नेटवर्क को जब गूगल ने खरीद लिया तो वह भी गूगल से जुड़ गए। वहॉं उन्होंने एआई डेवलपमेंट पर काम करने के लिए गूगल ब्रेन नामक एक स्पेशल टीम की स्थापना की। वही हिंटन आज जब कंपनियों के बीच एआई टूल डेवलप करने की गलाकाट स्पर्धा को देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि एआई की खोज कर उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी। इसी गलती को सुधारने के लिए वे गूगल की नौकरी छोड़कर आज लोगों को एआई से जुड़े खतरों के बारे में जागरूक करने में लगे हैं।
लेकिन ये जोखिम कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। प्रतिस्पर्धा एआई को निरंतर पहले से अधिक शक्तिशाली और खतरनाक बनाती जा रही है। एआई की वजह से पिछले साल टेक कंपनियों में डेढ़ लाख से अधिक लोगों की नौकरियॉं गई हैं। गोल्डमैन सैक्स आगाह कर रही है कि एआई की वजह से अगले कुछ सालों में तीस करोड़ नौकरियॉं जा सकती हैं। मिस इन्फॉर्मेशन और डिस इन्फॉर्मेशन जनरेट करके एआई सामाजिक-राजनीतिक संतुलन को तहस-नहस कर सकती है। आंकड़ों में उथल-पुथल कर नीतियों को प्रभावित कर सकती है। एआई की मदद से ऐसे हथियार बनाए जा रहे हैं जो खुद ही फैसला लेने में सक्षम होंगे कि कब और किसे मारना है। निजी तौर पर एआई हमारे रिश्तों के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकती है। हमें अकेला, अवसादग्रस्त और मनोरोगी बना सकती है।
ऐसे और न जाने कितने खतरे और भी हो सकते हैं, जिनकी हम अभी कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। कुछ अर्सा पहले नॉर्थ कैरोलिना के वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग में एआई को कोई बीमारी ठीक करने के लिए एक केमिकल कंपाउंड बनाने का टास्क दिया। उन्होंने पॉजिटिव रिजल्ट की बजाए, नकारात्मक रिजल्ट वाले ऑप्शन को मार्क किया। एआई का कमाल देखिए, सिर्फ छह घंटों के भीतर उसने चालीस हजार नए रासायनिक हथियार कंपाउंड तैयार कर डाले। ये इतने खतरनाक थे कि उन्हे अगर केमिकल वेपंस के रूप में डिजाइन किया जाए तो भारी तबाही ला सकते हैं।
बढ़ रहा है विरोध
आज अगर एआई को लेकर चिंता और विरोध का माहौल बन रहा है तो इसके पीछे यही अनुभव और आशंकाएं हैं। इस विरोध की शुरुआत काफी पहले और बहुत व्यापक स्तर पर हो चुकी है। मार्च महीने में एलन मस्क सहित करीब एक हजार टेक दिग्गजों, शोधकर्ताओं और एआई से जुड़े विद्वानों ने एआई प्रोग्राम डेवलपमेंट से जुड़ी लैब्स को खुला खत लिखकर एआई की वजह से समाज और मानवता के लिए उत्पन्न जोखिमों के बारे में चेतावनी दी थी। उन्होंने इन एआई लैब्स से अपील की थी कि वे अगले छह महीनों के लिए एआई को और अधिक शक्तिशाली बनाने के अपने प्रयासों को रोक दें। और, इस समय का इस्तेमाल इस प्रौद्योगिकी के पीछे के खतरों को बेहतर ढंग से समझने में करें। इस पत्र पर अब तक 27 हजार से अधिक लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं।
विज्ञान कथा लेखक विलियम जिब्सन ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि इंसान के अंदर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम इतना बढ़ जाएगा कि वह इंसान ही नहीं रह जाएगा। आज हम इसी विज्ञान कथा लेखक विलियम जिब्सन ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि इंसान के अंदर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम इतना बढ़ जाएगा कि वह इंसान ही नहीं रह जाएगा। आज हम इसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। वह भी बहुत तेज गति से। सवाल यही है कि क्या हम समय रहते जाग पाएंगे?
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