AI in Media: मीडिया में भी बढ़ रहा है एआई का दखल

AI in Media: समाचारों को संजोने-संवारने के काम में तो एआई का इस्‍तेमाल पहले से हो रहा है। बार्ड, चैटजीपीटी, अल्फाकोड, क्‍विलबोट, हाईपरराइट, गिटहब, कोपायलट, सिंथेसिया, स्टेबल डिफ्यूजन, मिडजर्नी जैसे बहुत सारे एआई प्रोग्राम हैं, जो टेक्‍स्ट, वीडियो और चित्रों के सृजन व कंटेंट मैनेजमेंट सिस्‍टम (सीएमएस) जैसे कामों में, मीडियाकर्मियों के लिए काफी मददगार साबित हो रहे हैं। इनसे समय भी बचता है, पैसा भी और ऊर्जा भी।

यह मुमकिन हो रहा है, जेनरेटिव एआई के बढ़ते असर की बदौलत। बीते आठ-दस महीनों में एआई में काफी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। जेनरेटिव एआई इन्‍हीं बदलावों की देन है। एआई मुख्‍यत: दो पैटर्न पर काम करता है। एक प्रिडक्टिव एआई, जो पहले से मौजूद डेटा के आधार पर आगे के लिए अनुमान प्रस्‍तुत करता है। इसका उन्‍नत संस्‍करण जेनरेटिव एआई है। यह प्रशिक्षण डेटा के आधार पर नई सामग्री बनाने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए मॉडल के माध्यम से डेटा के बड़े सेट को सिंथेसाइज करके बेहतरीन कंटेंट तैयार करता है।

artificial intelligence in Media: AI is also increasing in media

क्विंटटाइप भी ऐसा ही एक एआई प्रोग्राम है, जिसका इस्‍तेमाल डिजीटल मीडिया में काफी समय से सीएमएस के लिए हो रहा है। अब ये जेनेरेटिव एआई से जुड़कर समाचार सामग्री तैयार करने के काम में भी मदद के लिए तैयार है। यह सामग्री के संक्षिप्तिकरण, संपादन, टाइटिल लगाने, हाइलाइटर्स निकालने, पैराग्राफ बनाने, उसे अधिक आकर्षक बनाने, सर्च इंजनों के अनुकूल बनाने के लिए सही शब्‍दों के चयन आदि के अलावा उसे नए सिरे से लिखने में भी सक्षम होगा।

जेनेसिस और क्विंटटाइप जैसे प्रोग्रामों के बारे में प्रचारित तो यही किया जाता है कि ये जर्नलिस्‍टों को जल्‍दी खबर लिखने में मदद करने और उनकी उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए डेवलप किए गए हैं। लेकिन, खबरों की दुनिया से जुड़े लोगों में इन्‍हें लेकर स्‍पष्‍ट मत विभाजन देखने में आ रहा है। एक पक्ष इन्‍हें एक अवसर के तौर पर देख रहा है, दूसरा खतरे की घंटी के रूप में।

जहॉ तक जेनेसिस का प्रश्‍न है, इसके बारे में कहा जा रहा है कि इसके पीछे न तो ऐसी कोई भावना है और न ही इसके लिए यह संभव है कि यह समाचारों की दुनिया में पत्रकारों की भूमिका को खत्‍म करके उनकी जगह ले सके। कारण, एआई फील्‍ड में जाकर रिपोर्टिंग नहीं कर सकता, खबरों के तथ्‍यों की पुष्टि नहीं कर सकता, खबरें लिखने में मानवीय संवेदनाओं का परिचय नहीं दे सकता, संबंधित पक्षों से उनका फीडबैक नहीं ले सकता। लेकिन, यह सब बातें किसी को आश्‍वस्‍त नहीं कर पा रही हैं। न तो उन संजीदा पाठकों और सामाजिक चिंतकों को, जो सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के प्रभुत्‍व वाले इस दौर में मिसइन्‍फॉर्मेशन, डिसइन्‍फॉर्मेशन और फेक न्‍यूज के बढ़ते परिमाण और मीडिया की घटती विश्‍वसनीयता को लेकर चिंतित रहते हैं। और, न ही उन पत्रकारों को जो हर संकट में 'ले ऑफ' का शिकार बन अपनी नौकरियॉं गंवाते हैं। कविता, अनुवाद, संपादन, स्क्रिप्टिंग, प्रूफ रीडिंग, सारांश, बायोडाटा बनाने, सामग्री के पुनर्लेखन जैसे कामों ने फ्रीलांसरों को मिलने वाले काम पर काफी असर डाला है। अब एआई के न्‍यूजरूम में पहुँचने की खबरों ने उनकी चिंताएं और बढ़ा दी हैं।

अभी गूगल ने यह तक नहीं बताया है कि जेनेसिस कब बाजार में आएगा। यह भ्रूणावस्‍था में ही है, लेकिन कई समाचार पत्र समूह अभी से इसे अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं। इनमें द न्‍यूयार्क टाइम्‍स, द वाशिंगटन पोस्‍ट और द वॉल स्‍ट्रीट जर्नल निकालने वाले न्‍यूज कॉर्प जैसे दिग्‍गज शामिल हैं। बीते दिनों एसोसिएटेड प्रेस ने भी ओपेन एआई (चैटजीपीटी बनाने वाली कंपनी) को 1985 के बाद से एकत्र अपने कंटेंट आर्काइव के इस्‍तेमाल की अनुमति दी है।

जेनेसिस के बारे में जितनी जानकारी उपलब्‍ध है, उसके अनुसार यह सामयिक घटनाओं से जुड़ी जानकारियों के आधार पर एक समाचार लेख लिख सकता है। उसका शीर्षक लगा सकता है। उसके मुख्‍य बिंदु छांट सकता है। उसमें इस्‍तेमाल फोटो का कैप्‍शन तैयार कर सकता है।

हालांकि, पत्रकारों के पास अभी जो एआई टूल्‍स उपलब्‍ध हैं, वे उनके ग्रामर चेक करने, नकल की गई सामग्री को पहचानने जैसे रोजमर्रा के कामों में उनकी मदद करते रहे हैं। लेकिन, जेनेसिस जैसे प्रोग्राम तो उनसे उनका न्‍यूज कंटेंट तैयार करने का मूल काम ही छीन लेने की तैयारी में हैं। अभी यह देखने की बात है कि समाचार उद्योग इनका इस्‍तेमाल कैसे करता है। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं कि यह काफी उथल-पुथल मचा सकता है। खासकर, समाचारों की प्रस्‍तुति के मामले में तो यह बहुत सारी पारंपरिक चीजों को बदलने वाला साबित हो सकता है।

इन टूल्‍स को समाचारों के एक बड़े डाटा संग्रह की मदद से प्रशिक्षित किया गया है। इससे ये समाचार लेखन की संरचना और शैली को सीखने में सक्षम हैं। ये तथ्‍यों और पाठकों को जोड़कर रखने वाली सामग्री तैयार कर सकते हैं। और ये कारोबार, राजनीति, खेल, विज्ञान व प्रौद्योगिकी जैसे जनरुचि के लगभग सभी विषयों पर लिखने में समर्थ हैं।

अब सवाल यह उठता है कि क्‍या कोई एआई प्रोग्राम किसी प्रशिक्षित व अनुभवी पत्रकार से बेहतर समाचार लेखन कर सकता है? यह एक ऐसा जटिल, लेकिन जरूरी प्रश्‍न है, जिसका उत्तर कई बातों पर निर्भर करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सूचनाओं को प्रोसेस करने में एआई किसी भी मनुष्‍य की तुलना में ज्‍यादा तेजी और कुशलता से काम कर सकता है। उसे किसी भी विषय का जानकार होने की जरूरत भी नहीं है, क्‍योंकि उसकी पहुँच हर विषय से संबंधित जानकारियों तक होगी। बेशक एक पत्रकार जैसा अनुभव और अंतर्दृष्टि उसके पास न हो, लेकिन आज जिस तरह से हर क्षेत्र में क्‍वालिटी से ज्‍यादा क्‍वांटिटी पर जोर दिया जा रहा है, वहॉं जेनेसिस जैसे प्रोग्रामों को हाथोंहाथ लिया जाना लाजिमी है।

प्रोग्राम के पक्ष में एक बात यह भी जाती है कि यह किसी भी प्रकार के भावनात्‍मक या संज्ञानात्‍मक पूर्वाग्रहों से मुक्‍त होता है। लेकिन, यह तुलनात्‍मकता, भाषाई विविधता और शब्‍दों की बाजीगरी की भी समझ नहीं रखता, जिससे इसे कभी भी भ्रमित किया जा सकता है और इसके द्वारा र‍चे गए टेक्‍स्‍ट में गलतियॉं होने की आशंका हमेशा रहने वाली है। स्रोतों से सम्‍पर्क और संबंध को लेकर भी इसकी बहुत सारी सीमाएं हो सकती हैं। जिससे शुद्ध और संतुलित सामग्री का सृजन सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।

उदाहरण के लिए इसी साल अमेरिकन मीडिया पोर्टल सीनेट (कम्‍प्‍यूटर नेटवर्क) ने प्रयोग के तौर पर खबरें लिखने के लिए एआई का इस्‍तेमाल किया। उसे इनमें बहुत सारे सुधार करने पड़े। पिछले महीने ऐसा ही अनुभव साइंस और गैजेट वेबसाइट गिजमोडो को हुआ। इसके लिए एआई से स्‍टारवार्स जैसे सामान्‍य विषय पर स्‍टोरी लिखने के लिए कहा गया। उसने लिखी, लेकिन इसमें भी सुधार करने की जरूरत पड़ी। यह अलग बात है कि त्रुटियों के बावजूद उनका कंटेंट राइटिंग में एआई का इस्‍तेमाल करने से बचने का कोई इरादा नहीं है।

एआई जनित डीपफेक इन दिनों दुनिया भर में चिंता का विषय बना हुआ है। इस शब्‍द का आशय ऐसे फर्जी कंटेंट से है, जो देखने में वास्‍तविक से भी ज्‍यादा विश्‍वसनीय लगती है। एआई का एल्‍गोरिदम कंटेंट रच सकता है। तथ्‍य नहीं गढ़ सकता। इसके लिए प्रोग्राम के एलएलएम अर्थात लार्ज लैंग्‍वेज मॉडल एलगोरिदम को सीखने के लिए उसी सब इनपुट पर निर्भर रहना पड़ेगा, जो साइबर स्‍फेयर में उपलब्‍ध है । इसमें फर्जी खबरों, गलत जानकारियों, दुष्‍प्रचार सामग्रियों की भरमार है। जो लोग चैटजीपीटी या दूसरे कृत्रिम बुद्धिमत्‍ता प्रोग्रामों का इस्‍तेमाल करते हैं, वे जानते हैं कि किस तरह ये प्रोग्राम किसी सवाल का एक जवाब देते हैं और उस पर संदेह प्रकट करने पर क्षमा मॉंगते हुए उसी प्रश्‍न का दूसरा उत्तर देते हैं, जो पहले से एकदम अलग होता है। जाहिर है कि उनमें दो अलग-अलग उपलब्‍ध तथ्‍यों में से सही का चुनाव करने की सामर्थ्‍य नहीं है। इस खतरे से खबरों को बचाना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

जब एक इंसान खबर लिखता है तो उसका कार्य महज सूचनाओं का संग्रहण और प्रस्‍तुतिकरण ही नहीं होता। बल्कि, इसके बीच उसे बहुत सारी चीजों को ध्‍यान रखना पड़ता है, अपने बुद्धि विवेक का इस्‍तेमाल करते हुए फैसले लेने होते हैं। क्‍या एआई से यह अपेक्षा की जा सकती है? खबर लिखने का काम वह बेशक कर सकता है, लेकिन खबर के असर का आकलन करने का एलगोरिदम फिलहाल तो उसके पास शायद ही हो। मिसाल के तौर पर, किसी विमान दुर्घटना की खबर आने पर, समाचार पत्र की नीतियों के हिसाब से, उसमें दस मृतकों की संख्‍या पर भी जोर दिया जा सकता है और पायलट की सूझबूझ पर भी, जो सौ यात्रियों की जान बचाने में सफल रहा। एआई यह फैसला नहीं कर सकता कि कौन सा एंगल लिया जाना चाहिए। और अगर वह ऐसा करने में सक्षम भी हो, तब भी उसे यह अधिकार नहीं दिया जा सकता। वर्ना, यह और भी घातक सिद्ध हो सकता है।

यह भय निराधार नहीं है। एआई एल्गोरिद्म को समाचार घटनाओं के संदर्भों को समझने में कठिनाई हो सकती है। वह एडिटोरियल स्‍टेंडर्ड, न्‍यूजपेपर पॉलिसी, तथ्‍यों की पुष्टि, स्रोतों की जॉंच, विषयों की संवेदनशीलता, कानूनी और नैतिक तकाजों की समझ जैसी चीजों के मामले में कभी मानव पत्रकारों से बेहतर नहीं हो सकता।

खबरें लिखना एक छुट्टी की अर्जी या प्रेमपत्र लिखना नहीं है। यह एक बहुत जिम्‍मेदारी और जवाबदेही वाला काम है। जिसे एआई के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसे सिर्फ एक असिस्‍टेंस टूल के तौर पर ही इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। मनुष्‍य के रिप्‍लेसमेंट के तौर पर नहीं। कार्य संपादन में तेजी लाने, कम वक्‍त में ज्‍यादा काम करने के लिए एआई का उपयोग अवश्‍य करें, लेकिन मानवीय निरीक्षण के बिना नहीं। एआई की तत्‍परता और मानव विवेक, दोनों मिलकर साथ कम करेंगे तो कोई दिक्‍कत नहीं होगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+