AIADMK and BJP: अन्नाद्रमुक ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति का मौका दिया है
AIADMK and BJP: अन्नाद्रमुक के वरिष्ठ नेता डी. जयकुमार ने 18 सितंबर को एक धमाकेदार ब्रेकिंग न्यूज दी है कि एआईएडीएमके भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ रही है, यानि वह एनडीए से बाहर हो रही है| इस खबर को लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए और मोदी के लिए झटके के रूप में देखा गया, क्योंकि जबसे इंडी एलायंस बना है, तबसे एनडीए अपने घटक दलों की संख्या बढाने की कोशिश कर रहा था| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी दिन 38 दलों को बुला कर एनडीए का शक्ति प्रदर्शन भी किया था जिस दिन पटना में विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक हो रही थी| उस बैठक में सबसे ज्यादा महत्व अन्नाद्रमुक को ही दिया गया था, क्योंकि एनडीए के घटक दलों में वही सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल बचा था, जिसकी कभी अपने राज्य में सरकार रही और मौजूदा तमिलनाडु के सत्ताधारी दल द्रमुक का विकल्प भी है|
ऐसे समय में जब द्रमुक के मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन विरोधी बयान के कारण देश में सनातन और सनातन विरोधियों में ध्रुवीकरण हो रहा है, उस समय अन्नाद्रमुक का भाजपा को छोड़कर जाना ऐसा संदेश दे रहा है कि द्रविड़ राजनीति के चलते ही अन्नाद्रमुक ने एनडीए छोड़ा है| तमिलनाडु में क्योंकि द्रविड़ राजनीति करना वहां के क्षेत्रीय दलों की मजबूरी बन चुका है, इसलिए अन्नाद्रमुक ने स्थानीय दबाव में आकर एनडीए छोड़ा है| अन्नाद्रमुक के इस कदम को इसीलिए एनडीए को झटके के रूप में देखा जा रहा है| अन्नाद्रमुक के इस कदम की तुलना पंजाब के अकाली दल से की जा सकती है, जिसने कृषि बिलों पर अपने समर्थकों के दबाव में आकर एनडीए छोड़ दिया था|

अकाली दल के एनडीए छोड़ने पर पंजाब के भाजपा नेताओं ने राहत की सांस ली थी, क्योंकि पंजाब प्रदेश भाजपा 2015 से भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व पर क्षेत्रीय सोच रखने वाले अकाली दल से गठबंधन तोड़ने का दबाव बना रही थी| 2014 में भाजपा के पास पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू के रूप में लोकप्रिय सिख चेहरा था, जिसे सामने रख कर भाजपा पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बना रही थी, लेकिन भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व अकाली दल से गठबन्धन तोड़ने को तैयार नहीं था|
अकाली दल के दबाव में भाजपा ने 2014 में उनका लोकसभा का टिकट काट दिया था। 2016 में नवजोत सिंह सिद्धू ने इसीलिए भाजपा छोड़ कर कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी, क्योंकि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व अकाली दल से साथ छोड़ने के लिए राजी नहीं हुआ| 2017 के चुनाव में अकाली भाजपा गठबंधन चुनाव हार गया और कांग्रेस चुनाव जीत गई, जिसमें नवजोत सिंह सिद्धू मंत्री बने| 2020 में अकाली दल ने खुद कृषि बिलों के मुद्दे पर एनडीए छोड़ा तो प्रदेश भाजपा के नेताओं ने राहत की सांस ली थी| हालांकि 2022 में हुए पंजाब विधानसभा के चुनावों में भाजपा को अकेले चुनाव लड़ने का कोई फायदा नहीं हुआ, और अकाली दल को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा| इसके बावजूद पंजाब में भविष्य के लिए भाजपा की जमीन तैयार हुई है| दर्जनों की तादाद में कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं|

नवजोत सिंह सिद्धू की तरह पिछले एक साल से तमिलनाडु प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष अन्नामलाई कुप्पूसामी भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रहे थे कि अन्नाद्रमुक से गठबंधन तोड़ा जाए| अन्नामलाई ने पिछले दो तीन साल में प्रो-एक्टिव भूमिका निभा कर तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक हैसियत कायम की है| इससे पहले तमिलनाडू में भाजपा को इतना लोकप्रिय नेता पहले कभी नहीं मिला था| इसी साल मार्च में उन्होंने भाजपा की एक बैठक में घोषणा कर दी थी कि अगर केन्द्रीय नेतृत्व ने अन्नाद्रमुक से गठबंधन नहीं तोड़ा तो वह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देंगे और सामान्य कार्यकर्ता की तरह काम करेंगे|
2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद से अन्नाद्रमुक में भी भाजपा से गठबंधन तोड़ने की मांग चल रही थी| अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं का तर्क था कि भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन के कारण अल्पसंख्यक वोटर अन्नाद्रमुक से छिटक गए, इसलिए वे चुनाव हारे| इसमें कोई सशंय नहीं कि अन्नाद्रमुक का एक बड़ा वर्ग भाजपा से संबंध तोड़ने का पक्षधर था|
प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष अन्नामलाई भी अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन जारी रखने के पक्षधर नहीं थे| इसके बावजूद अप्रेल के आखिर में अमित शाह और अन्नाद्रमुक के महासचिव पलानीस्वामी में 2024 का चुनाव एक साथ लड़ने की सहमति बन गई थी| इस सहमति में बड़ी भूमिका खुद अन्नाद्रमुक के महासचिव पलानीस्वामी की ही थी, जिनका मानना था कि द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन का मुकाबला करने के लिए अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन जरूरी है| तब भाजपा को अपने प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई को गठबंधन जारी रखने के लिए मनाना पड़ा|
अप्रेल में उच्च स्तरीय सहमति के बाद दोनों दलों के नेताओं ने इस तथ्य को स्वीकार किया था कि दोनों दलों के पास साथ बने रहने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है| तब तर्क यह दिया गया था कि अगर अन्नाद्रमुक और भाजपा अलग हो जाते हैं, तो उसका लाभ द्रमुक कांग्रेस गठबंधन को ही होगा| लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व के सामने झुकने के बावजूद अन्नामलाई केन्द्रीय नेतृत्व के फैसले से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि वह तमिलनाडु को द्रमुक-अन्नाद्रमुक की द्रविड़ राजनीति से मुक्त करवाने की लाईन पर चल रहे हैं|
तमिलनाडु पिछले 50 साल से द्रविडियन राजनीति के शिकंजे में है| लेकिन यह भी सच है कि तमिलनाडु के भीतर ही एक वर्ग में इस राजनीति के खिलाफ असंतोष है, खासकर द्रमुक की राजनीति से, लेकिन जनता के पास राष्ट्रीय विकल्प नहीं है| राष्ट्रीय सोच रखने वाली कांग्रेस और 1980 तक द्रविड़ राजनीति का विरोध करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी द्रविड़ प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया है| इस पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखने और द्रविड़ राजनीति से मुक्ति चाहने वालों के लिए भाजपा ही एक राष्ट्रीय विकल्प बचता है| लेकिन 2014 के बाद भाजपा ने भी किसी न किसी द्रविड़ पार्टी के साथ समझौते की लाईन अपनाई हुई है|
अन्नामलाई प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को द्रविड़ राजनीति से अलग लाईन पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं| उनकी लाईन राष्ट्रीय सोच रखने वाले वोटरों को पसंद है, इसलिए छोटे से समय में उनकी लोकप्रियता में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है| इसी साल उन्होंने छह महीने तक पदयात्रा करके जनसंपर्क अभियान शुरू किया, जो तमिलनाडु में भाजपा जैसी पार्टी से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था|
30 अगस्त को अपने एक इंटरव्यू में अन्नामलाई ने कहा था कि वह तमिलनाडु को द्रविड़ राजनीति के चंगुल से निकाल कर राष्ट्र की मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ना चाहते हैं| इसी इंटरव्यू में द्रविड़ राजनीति पर बोलते हुए उन्होंने द्रविड़ राजनीति करने वाले नेताओं पर सख्त टिप्पणियाँ की, इन्हीं में एक टिप्पणी अन्नाद्रमुक नेताओं के बारे में भी थी|
डी. जयकुमार ने जब भाजपा से गठबंधन तोड़ने का एलान किया, और इसे पार्टी का स्टैंड बताया, तो वह अन्नामलाई पर जमकर बरसे| ऐसा लगा कि अन्नाद्रमुक की नाराजगी भाजपा से नहीं बल्कि अन्नामलाई से है, उन्होंने कहा कि भाजपा उन पर लगाम लगाए| अब भाजपा को अगर स्थाई तौर पर तमिलनाडु में अपने पैर जमाने हैं, तो उसके सामने एक मौक़ा है। उसे द्रविड़ राजनीति के सामने घुटने टेकने से बचना होगा, और अन्नाद्रमुक ने गठबंधन तोड़कर उसे यह मौक़ा दे दिया है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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