2024 Elections: मोदी के लिए इतनी भी आसान नहीं है रायसीना की राह
आजकल समाचारों की सुर्खियों में राम लहर के साथ मोदी के लिए 'अबकी बार 400 पार' के साथ ही इंडिया गठबंधन बिखर जाने की खबरें छाई हुई है।
विभिन्न माध्यमों से आम मतदाताओं के बीच यह धारणा बनाई जा रही है कि चुनाव के नतीजे लगभग तय हो चुके हैं। खुद प्रधानमंत्री एवं उनकी टीम के नेता अपनी बातों एवं अनुकूलित मीडिया के जरिए अवधारणा के स्तर पर जनता में यह संदेश देने की लगातार कोशिश कर रहे हैं कि वे और उनका गठबंधन ही देश की असली गारंटी है।

हालांकि कई अंतरविरोधों से ग्रस्त इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के लगातार बिखराव और कलहकारी परिदृश्य भाजपानीत-एनडीए के दावों को पुख्ता करने के लिए खाद-पानी का काम कर रहे हैं, लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। गठबंधन की उठा पटक से ठीक पहले तीन राज्यों में बुरी तरह हार चुकी कांग्रेस न्याय यात्रा के जरिए रणनीतिक तरीके से सरकार को घेरने की हर संभव कोशिश कर रही है।
कांग्रेस नेता पाहुल गांधी अपनी सभाओं में छात्रों, नौजवानों, गरीबों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों,किसानों के मूलभूत मुद्दों को आगे कर मोदी सरकार की नीतियों पर लगातार प्रहार कर रहे हैं। यानी एक दूसरे को मात देने के लिए मतदान से पहले यह लड़ाई खबरों से लड़ी जा रही है।
तीसरी बार भी मोदी ही 'सरकार', अथवा 'अबकी बार 400 के पार' का नारा चुनाव की घोषणा के पहले ही दिया जा रहा है। भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता उठते बैठते इस स्लोगन को दोहरा रहे हैं। वही टीम राहुल से जुड़े लोग चुनिंदा बड़े उद्योगपतियों को निशाने पर लेकर सरकार पर गरीबों का हक मारने, आर्थिक लूट के आरोप मढ कर अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं।
यह मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका निभाने की क्षमता को प्रभावित करने की कोशिश जैसा दिखता है। टेक कंपनियों की मदद से खबरों के इको चेंबर का निर्माण कर विचारधारा के प्रभाव से मुक्त नए मतदाताओं की राजनीतिक समझ को कुंद करने की कोशिश जैसी लगती है। बाजार द्वारा उपलब्ध आंकड़ों और कृत्रिम मेधा की मदद से एक-एक मतदाता की भावनात्मक कमजोरी के हिसाब से उसे चुभने वाले राजनीतिक असरकारी संवाद परोसे जा रहे हैं। इस मामले में कोई भी दल पीछे नहीं है, लेकिन विशाल वैभव के सहारे सत्ता पक्ष ऐसी अवधारणाएं गढ़ने में सबसे आगे है।
भाजपा भले ही 400 पार का नारा लगा रही है, मगर इसे पाना बहुत आसान काम नहीं है। वर्तमान को देखकर यह कतई नहीं कहा जा सकता कि 2024 के चुनाव में इंडिया गठबंधन भाजपा के विजय रथ को लगाम दे सकता है, लेकिन मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि खेल अभी उतना आसान नहीं है जितना बीजेपी की ओर से दावे किए जा रहे हैं।
जो लोग दुहाई दे रहे हैं कि राम मंदिर मसले के बाद पूरा देश राम मय हो गया है और भाजपा बड़े अंतर से चुनाव जीतेगी, यह ऐसा सोचने वालों की महज कोरी कल्पना है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर पूरा देश खुश और संतुष्ट है। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में भारत के प्रति सहानभूति रखने वाले भी गदगद है। लेकिन वोट को लेकर राम मंदिर निर्माण का असर आधिकाधिक हिंदी प्रदेशों पर ही पड़ेगा जहां पहले से ही भाजपा की स्थिति बहुत अच्छी है। कहने का आशय यह है कि इस मुद्दे का जितना अधिकतम फायदा मिलना था, 2019 के चुनाव में मिल चुका है। 2024 में भाजपा के लिए यह मुद्दा कोई खास करिश्मा करेगा इसमें संदेह है।
यही कारण है कि मंदिर उद्घाटन और राम के नाम का खुलेआम राजनीतिकरण कर सत्ता की हैट्रिक लगाने का सपना देखने वाली भारतीय जनता पार्टी भी इंडिया गठबंधन से सहमी हुई है। इसी असुरक्षा का नतीजा था कि जिस नीतीश कुमार के लिए भाजपा ने अपने दरवाजे सदा सदा के लिए बंद कर दिए थे, अब खुशी-खुशी रेड कारपेट बिछाकर उनकी अगवानी करनी पड़ी है। उत्तर प्रदेश में 2019 की परफॉर्मेंस को बरकरार रखने के लिए जाट बिरादरी के किसान नेता चौधरी चरण सिंह को मरणोपरांत भारत रत्न देकर उनके पोते जयंत चौधरी से गलबहियां करनी पड़ी।
इंडिया गठबंधन में सपा, आप, राजद, डीएमके, झामुमो जैसी बड़ी और स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभाव रखने वाली पार्टीयां शामिल है। पिछली बार भाजपा के 37% वोट के मुकाबले अकेले कांग्रेस को 20% वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में 189 ऐसी सीट थी जहां कांग्रेस की भाजपा से सीधी टक्कर थी अबकी बार इन सीटों में से कई पर समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं।
पिछली बार पूर्वोत्तर में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था लेकिन अबकी बार ऐसा नहीं होने वाला। मणिपुर हिंसा असम मेघालय विवाद के नजरिए से देखें तो कांग्रेस मतदाताओं पर असर डाल रही है। हाल में आया मिजोरम विधानसभा चुनाव का परिणाम इस बात का प्रमाण है।
इसी प्रकार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी भाजपा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन पिछले चुनाव में कर चुकी है जिसका एकमात्र कारण मोदी का नेतृत्व रहा है। लेकिन इस बार अगर इन राज्यों में संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा होता है तो निश्चित रूप से भाजपा के लिए 2019 की तुलना में मुकाबला कई गुना बढ़ जाता है।
इसी तरह दक्षिण भारत में छह राज्य आते हैं और इनमें पांच राज्यों से लोकसभा में 129 सदस्य चुने जाते हैं। भाजपा के सामने अब लक्ष्य केवल जीत का नहीं बल्कि विपक्ष की करारी हार का भी खड़ा हो गया है। भाजपा पश्चिम बंगाल में 2014 में दो सीट के मुकाबले साल 2019 में 18 सीटों पर और उड़ीसा में एक सीट से आठ सीटों पर जीत दर्ज कर वहां के मजबूत गढ़ में दाखिल हुई थी लेकिन केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में खाली हाथ रह गई थी।
अभी दावों-प्रतिदावों का दौर चल रहा है लेकिन वर्ष 1977, 1980, 2004 और 2014 के राजनीतिक बयार का अनुभव मौजूद है। चुनावी हवा कब किस वेग में किधर का रुख करेगी, इसका सहजता से पता नहीं चलता। सरकार और विपक्ष के हर कदम को परखने वाला मतदाता इस चुनाव में भी दृढ़ता के साथ अपना पक्ष रखेगा यह तय है।
आजादी के बाद से ही देश में हुए चुनावों में अपनी समझदारी का परिचय देते आए मतदाताओं का ट्रेंड और विशुद्ध भारतीय चिति का अनुभव तो यही कहता है कि मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस के लिए 2024 अभी भी टेढ़ी खीर ही है, लेकिन सत्ताधारी दल के लिए भी रायसीना की राह उतनी आसान नहीं है, जितना प्रचार किया जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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