2024 Elections: विपक्षी गठबंधन के बावजूद भाजपा का टारगेट 340 सीटें
लगातार दस दिन की मैराथन बैठकों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के दौरे बढ़ गए हैं। लोग हैरान हो रहे थे कि प्रधानमंत्री के आवास पर भाजपा के नेता और मंत्री आठ आठ घंटे बैठ कर क्या करते हैं। नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में कांग्रेस की भी ऐसी मैराथन मीटिंगे हुआ करती थीं। लेकिन उन बैठकों की चर्चा अखबारों में लीक हो जाती थी। भाजपा की बैठकों की चर्चा लीक नहीं होती, इसलिए विपक्षी दलों और मीडिया को समझ नहीं आता कि पीएम आवास पर क्या खिचड़ी पकती है। 28 जून और 7 जुलाई की लंबी बैठकों के दो फैसले अब सामने आ चुके हैं। कुछ और फैसले भी हुए हैं, वे भी जल्द ही सामने आ जाएंगे।

भाजपा ने चार राज्यों के अध्यक्ष बदल दिए हैं, चार और राज्यों के भी जल्द बदल दिए जाएंगे। भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित हो गई है, जिसमें पंजाब, राजस्थान, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से हटाए गए अध्यक्षों को शामिल किया गया है। इसके अलावा बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ के हटाए गए प्रदेश अध्यक्षों भी कार्यकारिणी में जगह मिली है।
इनके अलावा चुनाव वाले दो राज्यों छत्तीसगढ़ से धर्मपाल कौशिक और राजस्थान से मीना जाति के प्रभावशाली नेता और सांसद किरोड़ी लाल मीना को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया है। भाजपा ने राष्ट्रीय पदाधिकारियों में भी बदलाव करने और कुछ नए प्रकोष्ठ भी खोलने पर विचार किया है। अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के लगभग सभी प्रकोष्ट खत्म कर दिए गए थे, उनमें कुछ दुबारा शुरू हो सकते हैं।

संगठन को चाक चौबंद करने के मुख्य मुद्दे के अलावा भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और महासचिव संगठन बीएल संतोष की मैराथन बैठकों के कुछ अन्य मुद्दे थे। इनमें पहला था, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और दूसरा मुद्दा था लोकसभा चुनावों की रणनीति। तीसरा, विधानसभाओं और लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के लिए केन्द्रीय मंत्रीमंडल में फेरबदल और चौथा मुद्दा था एनडीए का पुनर्गठन। कुछ मंत्रियों को मंत्री पद से हटा कर संगठन में भेजा जाएगा, कुछ नए मंत्री शामिल किए जाएंगे, जिनमें एनडीए में शामिल हो रहे नए दल भी होंगे।
पांच राज्यों की विधानसभाओं पर फोकस शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दस दिनों में चुनाव वाले सभी राज्यों में दौरा किया है। 27 जून और पहली जुलाई को वह मध्यप्रदेश में थे, 6 जुलाई को छत्तीसगढ़ में थे, आठ जुलाई को तेलंगाना और राजस्थान में थे। इन सभी राज्यों में उन्होंने करोड़ों रूपए की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास किया। इन पिछले दस दिनों में अमित शाह और जेपी नड्डा ने भी इन चारों राज्यों का दौरा किया है।
भाजपा ने 340 सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है, सहयोगियों के साथ 400 का टारगेट है। भाजपा ने देश को चार हिस्सों में बांट लिया है। लेकिन राज्यों का बंटवारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के हिसाब से नहीं किया गया है। पहला हिस्सा है - उत्तर भारत के चार राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। इन चार राज्यों में कुल 125 सीटें हैं, पिछली बार भाजपा खुद 104 सीटें जीती थीं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड का आंकड़ा बरकरार रखने और उत्तर प्रदेश में कम से कम दस सीटें बढ़ाने का टारगेट है।
उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा 62 सीटें जीती थीं, जबकि 2014 में 71 जीती थीं, तो इस बार कम से कम 72 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा गया है। भाजपा की योजना का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है पश्चिम के राज्य महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान, लेकिन उनके साथ जम्मू कश्मीर, लद्दाख, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और चंडीगढ़ को जोड़कर एक ब्लॉक बना दिया गया है।
इन सात राज्यों और दो केंद्र शासित क्षेत्रों की 144 सीटें हैं, पिछली बार भाजपा इन में से 100 सीटें जीती थीं। महाराष्ट्र में भाजपा पिछली बार 25 सीटें लड़कर 23 जीती थी, जबकि शिवसेना 23 सीटें लड़कर 18 जीती थीं। इस बार शिंदे की शिवसेना के साथ साथ अजीत पवार और आर.पी.आई. को भी सीटें देनी पड़ेगी, तो संभवत भाजपा इस बार भी 25 सीटों पर ही चुनाव लड़े, लेकिन टारगेट सभी 25 सीटें निकालने का है।
पंजाब में पिछली बार भाजपा अकाली दल के साथ गठबंधन करके तीन सीटें लड़कर दो सीटें जीती थीं, इस बार भाजपा बेहतर स्थिति में है। क्योंकि कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, और अकाली दल गठबंधन से बाहर भी है। अगर अकाली दल एनडीए में शामिल होता है, तो भाजपा अकाली दल से 13 में से छह सीटें मांगेगी, अगर गठबंधन नहीं होता है तो भाजपा सभी 13 सीटों पर लड़ेगी। समझौता हो या न हो, भाजपा का टारगेट पंजाब में चार सीटें हासिल करने का है। राजस्थान में भाजपा 24 सीटें जीती थीं, इस बार 25 का टार्गेट है क्योंकि पिछली बार सीट जीतने वाला सहयोगी दल साथ छोड़ गया है। यानि इस दूसरे हिस्से में पांच सीटें बढ़ाने का लक्ष्य है।
तीसरा हिस्सा है बिहार, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, असम और पूर्वोतर के सारे राज्य। इन 12 राज्यों की 142 सीटों में से भाजपा पिछली बार सिर्फ 70 सीटें जीतीं थीं। दक्षिण के बाद यह भाजपा का सबसे कमजोर क्षेत्र है। इसके बावजूद भाजपा ने इस बार लक्ष्य 18 सीटें बढ़ाकर 88 सीटों को जीतने का रखा है, जिनमें 5 बिहार, 3 उड़ीसा, 3 झारखंड, 3 असम और 4 सीटें बंगाल में बढ़ाने का लक्ष्य है।
बिहार में पिछली बार जेडीयू से गठबंधन के चलते भाजपा ने सिर्फ 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी सत्रह जीती, जबकि 2014 में 22 सीटें जीती थीं। इसलिए भाजपा इस बार पासवान परिवार की दोनों पार्टियों, जीतन राम मांझी, मुकेश साहनी और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टियों के साथ मजबूत गठबंधन बना कर कम से कम 2014 वाली 22 सीटें खुद और कम से कम 11 सीटें सहयोगियों को हासिल करवाना चाहती है।
झारखंड में पिछली बार भाजपा 14 में से 11 सीटें जीतीं थी। बाबू लाल मरांडी को सभी 14 सीटें जीतने का लक्ष्य देकर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा भाजपा पूरी तरह आश्वस्त है कि बंगाल में भाजपा की ताकत बढ़ने के चलते, वहां 4 सीटों का इजाफा मुश्किल नहीं है।
अब बचा दक्षिण, तो दक्षिण में भाजपा सिर्फ कर्नाटक और तेलंगाना में थोड़ी मजबूत है। कर्नाटक में जेडीएस से समझौता करके पुराने 25 के आंकड़े को बरकरार रखने और तेलंगाना में 4 के आंकड़े को बढ़ा कर कम से कम 8 तक पहुंचाने का लक्ष्य है। यानि कम से कम 340 सीट जीतने का लक्ष्य है। इसे हासिल करने के लिए मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों और नेताओं का गठबंधन बनाने की रणनीति बनाई गई है।
भाजपा नेताओं ने इस बात को महसूस किया है कि अगर विपक्षी दल एकजुट हो कर चुनाव लड़ते हैं, और तीन सौ से साढ़े तीन सौ सीटों पर एक उम्मीदवार खड़ा करने में कामयाब हो जाते हैं, तो भाजपा को उन सीटों पर मजबूत सहयोगी चुन लेने चाहिएं। जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र तीन ऐसे राज्य हैं, जहां कई कई राजनीतिक दल हैं। इन तीनों राज्यों की 162 सीटों में से भाजपा की 102 सीटें हैं, भाजपा ने वहां 17 सीटों बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, इसलिए मजबूत सहयोगियों का होना जरूरी है।
इसलिए भाजपा बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गठबंधन के सहयोगी बढ़ा रही है। बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जेडीयू से टूट चुके हैं। मुकेश साहनी भी महागठबंधन से अलग हैं। चाचा पशुपति नाथ पारस के कारण अलग हुए चिराग पासवान को वापस लाया जा रहा है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे शिवसेना पर कब्जा करके एनडीए से जुड़े हैं, तो अजीत पवार एनसीपी पर कब्जा करके एनडीए से जुड़े हैं।
वैसे उत्तर प्रदेश में बड़ा खतरा नहीं है, क्योंकि मायावती विपक्षी गठबंधन में शामिल नहीं हो रही। मुलायम सिंह के देहांत के बाद सपा पहले से भी कमजोर हुई है। राजभर सपा से टूट चुके हैं, और जयंत चौधरी भी टूट रहे हैं। ये दोनों ही एनडीए में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। हरियाणा में आईएनएलडी भी टूट चुका है और उसका एक गुट भाजपा के साथ है। पंजाब में अकाली दल से बात चल रही है।
बाकी बचे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, लेकिन इन राज्यों में भाजपा की एक भी लोकसभा सीट नहीं है। फिर भी आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस से बात चल रही है। अजीत पवार की तरह तमिलनाडु में भी खेल हो सकता है, जहां मुख्यमंत्री स्टालिन की बहन कनिमोई भी अलग राह चुन सकती है। विपक्ष ने 17-18 को बेंगुलुरु में गठबंधन की बैठक बुलाई है, तो भाजपा ने भी 18 जुलाई को एनडीए की बैठक बुलाई है। आने वाले दिनों में बहुत उठापटक देखने को मिलेगी। लेकिन अगला लोकसभा चुनाव दो मोर्चों के बीच होगा, यह तय है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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