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रोशनी के इस त्‍योहार में अंधकार का जीवन बिताने वाले बच्‍चे जला रहे उम्‍मीद की लौ

दिल में अगर जज्बा हो तो भला अपनी उम्मीदों को पंख लगते कितनी देर लगती है। वाराणसी के नेत्रहीन बच्चों में कुछ ऐसी ही कहावत चरितार्थ होते दिख रही है। ये नेत्रहीन बच्चे न सिर्फ इस बार की दीपावली में दिए और मोमबत्तियां बना रहे हैं बल्कि पूरे देश में अपनी कला के माध्यम से उम्मीदों का उजाला फैला रहे हैं।

पूरे देश को प्रकाशमान करने का एक अनूठा प्रयास

पूरे देश को प्रकाशमान करने का एक अनूठा प्रयास

जीवन ज्योति अंध विद्यालय में पढने वाले बच्चों की जिंदगी में कुदरत ने भले ही अधियारा फैला दिया हो मगर इस बार की दीपावली में इन नेत्रहीनो ने अपने नन्हें हाथों से दूसरों की जिंदगी के अंधियारों को दूर कर रोशनी करने का बीड़ा उठाया है। शारीरिक विकलांगता के शिकार इन बच्चों ने अपने नन्हें हाथों की कला से पूरे देश को प्रकाशमान करने का एक अनूठा प्रयास किया है। भले ही इन बच्चो की आँखों में ज्योति न हो पर दीपावली के मौके पर ये बच्चे दुसरो की जिन्दगी में रोशनी भरने के लिए दीपावली से एक-दो महीने पहले ही मोमबत्ती और दिया बनाने में जुट जाते है। दीपावली तक इनका बनाया हुआ दिया और मोमबत्ती आम लोगो की जिन्दगी के अंधियारे को दूर करने का काम करता है। इनमे से कई बच्चे नेत्रहीन, मेंटली रिटायर्ड,हियरिंग इम्पेयर्ड, और फिजिकली हेंडीकैप्ड हैं। ऐसे बच्चों को मोमबत्ती और दीपक बनाना सिखाया गया और इन्होने अपनी मेहनत और लगन से कई प्रकार की मोमबत्तियां बनाई हैं। जो बच्चे रंगों की पहचान नहीं कर सकते उन बच्चों ने दीपक में रंग भरे हैं। जिन बच्चों ने कभी रौशनी नहीं देखी उन बच्चों ने दीवाली के दिन कई घरों को रोशनी देने का सामान तैयार किया है.

शुरू में आई थीं परेशानियां

शुरू में आई थीं परेशानियां

रविता (छात्रा) कहतीं हैं कि यह कार्य हम 3 साल से कर रहे हैं। शुरू में थोड़ी कठिनाइयों का सामना अवश्य करना पड़ा था परन्तु टीचर्स की गाइडेंस और सहायता से अब हम यह काम बहुत आसानी से कर लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहती हैं हर घर में दिया जले और लोगों के घर में हमेशा रौशनी हो. अगर उनके जैसी और भी बच्चियां है उनके माता पिता भी उन्हें स्कूल लेकर आएं और अपने पैरों पर खड़ा होने में सक्षम बनाएं।

टीचरों का रहता है पूरा सहयोग

टीचरों का रहता है पूरा सहयोग

टीचर मुकेश कुमार बताते हैं कि यह कार्य वह पिछले 10 वर्षों से कर रहे हैं। दीपावली से 3 महीनों पहले इस कार्य में जुट जाते हैं। मुकेश जी कहते हैं कि ट्रेनिंग देने के लिए पहले एक-एक चीज़ को स्पर्श करा के उसकी पहचान कराते हैं। इसी तरह से धीरे-धीरे पूरा कार्य सीख जाते हैं और अद्भुत कलाकृतियें बनाने में सक्षम हो पाते हैं। दिवाली के इलावा भी यह बच्चे विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाते हैं।

सलाम है इनके जज्बे को !

सलाम है इनके जज्बे को !

इस अंध विद्यालय में इन बच्चों की प्रतिभा को न सिर्फ निखारा जा रहा है बल्कि इनके सपनों को तस्वीर भी दी जा रही है स्पर्श से शुरू होकर सांचे में ढलने वाले इनके दिए और मोमबत्तियां अब पूरे देश में उजाला करने के लिए तैयार हैं। कौन कहता है की आसमान में सुराख नही हो सकता बस एक पत्थर तबियत से उछालो यारो ऐसा ही कुछ कर रहे हैं वाराणसी के ये अद्भुत बच्चे। सलाम है इनके जज्बे को !

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