मिलिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ वाराणसी के 'धरतीपकड़' से

वाराणसी में रहने वाले नरेंद्र नाथ दुबे उर्फ 'अडिग' के चुनाव लड़ने का रिकॉर्ड चौंकाने वाला है। 'अडिग' अब तक सभासद से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन अभी तक जीत नसीब नहीं हुई।

वाराणसी। विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद सभी पार्टियों के प्रत्याशी अपने-अपने तरीके से चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं। तो वहीं पीएम के संसदीय क्षेत्र में एक अनोखा प्रत्याशी भी है। जिसने अब तक कई चुनाव लड़े हैं लेकिन जीत का स्वाद उनसे कोसों दूर रहा है। इसके बावजूद ये प्रत्याशी अपने नाम की ही तरह हर बार चुनाव लड़ने के लिए अडिग है।

'धरतीपकड़' के बाद 'अडिग'

'धरतीपकड़' के बाद 'अडिग'

आपने काका जोगिन्दर सिंह उर्फ धरतीपकड़ का नाम तो सुना ही होगा। जिस तरह काका प्रत्याशी के तौर पर हर चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। उसी तरह वाराणसी में रहने वाले नरेंद्र नाथ दुबे उर्फ 'अडिग' भी चुनाव लड़ते हैं। बता दें कि नरेंद्रनाथ दुबे अब तक सभासद से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में नामांकन भर चुके हैं।

चुनाव लड़ने का लगा चुके हैं अर्धशतक

चुनाव लड़ने का लगा चुके हैं अर्धशतक

उन्होंने अब तक चुनाव लड़ने का अर्धशतक पूरा कर लिया है। नरेंद्र साल 1984 से चुनाव लड़ रहे हैं, इसमें स्नातक से लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव भी शामिल हैं। इनका यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इन्होंने अब तक चार बार राष्ट्रपति चुनाव में भी नामांकन किया हैं। इस बार नरेंद्र यूपी विधानसभा चुनाव में फिर से वाराणसी के उत्तरी विधानसभा सीट से बतौर प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर रहे हैं।

जीत से हैं कोशों दूर फिर भी हैं अडिग

जीत से हैं कोशों दूर फिर भी हैं अडिग

'अडिग' इस बार नरेंद्र मोदी के नोटबंदी को मुद्दा बना कर चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। उन्होंने अब तक सभी चुनाव निर्दलीय ही लड़े हैं, लेकिन इस बार वह क्षेत्रीय पार्टी अखिल भारतीय राम राज्य पार्टी के सहारे चुनाव लड़ रहे हैं। 'अडिग' की इस छवि को पूरा बनारस जानता हैं, उन्हें कोई वोट दे या ना दे लेकिन 'अडिग' चुनाव में जरूर खड़े होते हैं और चुनाव प्रचार करते हैं। 'अडिग' को अब हर बनारसी पहचानता है और चुनाव प्रचार के दौरान उनका स्वागत करता है।

जीत की आस लिए जीने का हुनर

जीत की आस लिए जीने का हुनर

बता दें कि 'अडिग' वकील होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। ये राजनेताओं पर कविता के माध्यम से व्यंग भी करते हैं। आज कि राजनीति में जहां एक अपराधी पैसे और बाहुबल की बदौलत नेता बन जाते हैं तो वहीं 'अडिग' जैसे लोग भी हैं जो जीत कि आस लगाए जिंदगी गुजार रहे हैं। भले ही 'अडिग' का चुनाव मैदान में होना एक मजाक हो लेकिन राजनीति को भ्रष्ट पेशा मानकर इससे विमुख होते जा रहे लोगों के लिए 'अडिग' एक उदाहरण ही हैं।

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