Kanwar yatra 2022: डाक कांवड़ क्यों मानी जाती है सबसे मुश्किल, कौन लेकर आया था पहली कांवड़, जानिए सबकुछ

श्रावण मास: कांवड़ यात्रा 14 जुलाई से 27 जुलाई तक आयोजित

देहरादून, 25 जुलाई। आजकल श्रावण मास चल रहा है। जिसमें कांवड़ यात्रा होती है। कांवड यात्रा 14 जुलाई से 27 जुलाई तक आयोजित हो रही है। इस दौरान लाखों करोड़ों भक्त कांवड़ लेकर इन दिनों उत्तराखंड में आ रहे हैं। गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक कांवड़ियों की धूम है। हर तरफ कांवड़ के रंग नजर आ रहे हैं। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि आखिर कांवड़ कितने प्रकार की होती है और सबसे मुश्किल कौन सी कांवड़ मानी जाती है।

4 प्रकार की होती है कांवड़

4 प्रकार की होती है कांवड़

कांवड़ मुख्यत 4 प्रकार की होती है। पहली सामान्य कांवड़, जिसमें कांवड़िए कांवड़ यात्रा के दौरान रुककर आराम भी करते हैं। दूसरी डाक कांवड़ जो कि बिना रूके होती है। खड़ी कांवड़ इसमें उनकी मदद के लिए कोई.न.कोई सहयोगी उनके साथ चलता है। चौथी दांडी कांवड़ में भक्त यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। कांवड़ पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेट कर नापते हुए यात्रा पूरी करते हैं।

सबसे मुश्किल मानी जाती है डाक कांवड़

सबसे मुश्किल मानी जाती है डाक कांवड़

इन सभी प्रकार की कांवड़ में सबसे ज्यादा मुश्किल डाक कांवड़ मानी जाती है। इस दौरान कांवड़ियों को विश्राम करने की अनुमति नहीं होती है। डाक कांवड़ में जब एक बार कांवड़ उठा लेते हैं तब बिना गंतव्य तक पहुंचे हुए वो रुकते नहीं हैं। डाक कांवड़ियों को एक निश्चित समय सीमा के अंदर ही शिवालय में जलाभिषेक करना होता है। अगर नियमों को कोई तोड़ता है तो यात्रा खंडित हो जाती है। आमतौर पर डाक कावंडि़ए समूह में चलते हैं लेकिन कभी .कभी ये किसी वाहन का इस्तेमाल भी करते हैं।

कांव़ड़ के सख्त हैं नियम

कांव़ड़ के सख्त हैं नियम

डाक कांवड़ के इस्तेमाल के दौरान सिर्फ सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है। साथ ही बिना रूके इस यात्रा को करना होता है। इस यात्रा में यात्रा की शुद्धि के साथ ही मन और तन की शुद्धि की सलाह दी जाती है। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा मदिरा मांस और तामसिक भोजन वर्जित माना गया है। साथ ही बिना गंगा स्नान के कांवड़ को हाथ नहीं लगा सकते। कांवड़ को जमीन या सिर पर रखने की भी मनाही होती है।

कांवड का पौराणिक महत्व

कांवड का पौराणिक महत्व

ये जानते हैं कि आखिर कांवड का पौराणिक महत्व क्या है, कांवड़ की शुरूआत करने को लेकर अलग-अलग मत है। पहला मत ये है कि भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। मान्यता है कि वे सबसे पहले कांवड़ लेकर बागपत जिले के पास पुरा महादेव गए थे। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लेकर भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। उस समय श्रावण मास चल रहा था और तब से इस परंपरा को निभाते हुए भक्त श्रावण मास में कांवड़ यात्रा निकालने लगे। दूसरा मत है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा की थी। श्रवण कुमार ने अपने माता.पिता को कांवड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया।

भगवान राम और रावण को लेकर भी हैं मत

भगवान राम और रावण को लेकर भी हैं मत

एक अन्य मत ये भी है कि भगवान राम पहले कांवडियां थे। उन्होंने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर, बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। चौथा मत ये है कि समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया। तत्पश्चात कांवड़ में जल भरकर रावण ने ष्पुरा महादेव स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कांवड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ।

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