उत्तराखंड की सियासत के ये दिग्गज, जीते तो रिकॉर्ड, हारे तो राजनीति की पारी का अंत, जानिए
ये दिग्गज चुनाव हार गए तो इनकी राजनीति की पारी का अंत
देहरादून, 15 फरवरी। उत्तराखंड की 70 सीटों पर मतदान हो चुका है। अब सभी प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद हो चुकी है। जो कि 10 मार्च को खुलेगी। जिसका सभी को इंतजार रहेगा। हालांकि सियासत में अपने उम्र के ऐसे पड़ाव में खड़े नेताओं को इस रिजल्ट का बेसब्री से इंतजार होगा। जिनका ये आखिरी चुनाव माना जा रहा है। यहां अगर ये दिग्गज चुनाव हार गए तो इनकी राजनीति की पारी का अंत माना जा सकता है। इस लिस्ट में कांग्रेस चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, 5 बार से विधायक और कैबिनेट मंत्री रहे विशन सिंह चुफाल, 7 वां चुनाव लड़ रहे बंशीधर भगत, राजनीतिज्ञ और आध्यात्मिक गुरू सतपाल महाराज और पूर्व कैबिनेट मंत्री और उत्तराखंड क्रांति दल के प्रदेश अध्यक्ष रहे दिवाकर भट्ट शामिल हैं।

हरदा सीएम से लेकर सांसद और केन्द्र में मंत्री, हारने का भी रिकॉर्ड
ग्राम सभा से अपनी राजनीति की शुरूआत करने वाले हरीश रावत के लिए 2022 का चुनाव काफी अहम माना जा रहा है। लालकुंआ सीट से चुनावी मैदान में खड़े हरीश रावत कांग्रेस की सरकार आने पर मुख्यमंत्री के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। 1980 में हरीश रावत ने पहली बार अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी को हराकर संसद पहुंचे। इसके बाद 1984 में उन्होंने और भी बड़े अंतर से मुरली मनोहर जोशी को शिकस्त दी। इसके बाद 1989 में उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल के बड़े नेता काशी सिंह ऐरी को हराया और लगातार तीसरी बाद लोकसभा पहुंचे। 1991, 1996, 1998 और 1999 के चुनाव में लगातार चार बार उन्हें अल्मोड़ा सीट से हार मिली। 2009 के लोकसभा चुनाव में वे हरिद्वार सीट से चौथी बार लोकसभा पहुंचे। फरवरी 2014 से 2017 तक वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे। जुलाई 2014 में उत्तराखंड की धारचुला सीट से उपचुनाव में जीत दर्ज की। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में हरीश रावत ने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दो सीटों से विधानसभा चुनाव लड़ा और दोनों सीटें हार गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे नैनीताल-उधमसिंह नगर सीट से फिर से चुनाव हारे।
सतपाल महाराज, राजनीतिक व्यक्ति के अलावा आध्यात्मिक गुरु
सतपाल महाराज की पहचान राजनीतिक व्यक्ति के अलावा आध्यात्मिक गुरु के तौर पर भी है। 1989 में कांग्रेस का दामन थाम कर राजनीतिक सफर की शुरूआत की। 1989 में पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट पर पहला चुनाव लड़ा। राजनीति के साथ ही समान रूप से धर्म के क्षेत्र भी सक्रिय रहे महाराज ने 1995 में एनडी तिवारी के साथ मिलकर तिवारी कांग्रेस बनाई। 1996 में पौड़ी संसदीय सीट से ही पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के खिलाफ चुनाव जीते। केंद्र में रेल राज्यमंत्री और राज्य वित्त मंत्री रहे। 1999 में फिर कांग्रेस में शामिल हुए। 1998,1999 और 2004 में हुए लोक सभा चुनावों में पौड़ी संसदीय सीट से ही हार का सामना किया। उत्तराखंड में तिवारी सरकार में सतपाल महाराज 20 सूत्रीय कार्यक्रम के अध्यक्ष रहे। 2009 में सतपाल महाराज गढ़वाल सीट से सांसद चुने गए। 2014 में महाराज भाजपा में शामिल हो गए। 2017 में चौबट्टाखाल सीट से विधायक चुने गए, फिर त्रिवेंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। एक बार फिर महाराज चौबट्टाखाल सीट से चुनावी मैदान में हैं।
7वीं बार चुनाव लड़ रहे बंशीधर भगत
बंशीधर भगत कालाढूंगी विधानसभा से एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। भगत 2012 और 2017 में इस सीट पर दो बार जीत दर्ज कर चुके हैं। भगत भाजपा के सबसे वरिष्ठ विधायक और नेताओं में शामिल हैं। जो कि उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार में राज्यमंत्री रहने के साथ-साथ उत्तराखंड में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर कई प्रमुख जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। 1975 में जनसंघ से जुड़े भगत की सक्रिय राजनीति की शुरुआत 1984 में हल्द्वानी से लगे पनियाली गांव के प्रधान बनने से हुई। 1991 में पहली बार वह नैनीताल के विधायक बने। भगत ने सात बार चुनाव लड़ा और छह बार जीत दर्ज की। 2002 में वह हल्द्वानी विधानसभा सीट पर कांग्रेस नेता डॉ. इंदिरा हृदयेश से चुनाव हार गए थे। हालांकि अगले ही चुनाव में उन्होंने इंदिरा को हराकर बदला लेने के साथ ही अपने कद को भी साबित किया। वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
6वीं बार चुनाव मैदान में बिशन सिंह चुफाल
बिशन सिंह चुफाल लगातार 5 बार विधायक बनने के बाद इस बार 6वीं बार चुनाव लड़ रहे हैं। चुफाल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। डीडीहाट विधानसभा से वे लगातार पांच बार विधायक रहे हैं। 1996 में उत्तर प्रदेश राज्य में पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे, तब से अपनी सीट में हमेशा अजेय रहे हैं। तीरथ सरकार में वे पेयजल मंत्री बने। धामी सरकार में भी चुफाल कैबिनेट मंत्री रहे हैं।
यूकेडी के अध्यक्ष और मंत्री रह चुके हैं दिवाकर भट्ट
उत्तराखण्ड आन्दोलन के वरिष्ठ नेता व राज्य सरकार में मन्त्री रहे दिवाकर भट्ट एक बार फिर देवप्रयाग सीट से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वह उत्तराखंड क्रांति दल में भी अध्यक्ष रह चुके हैं। 2007 में भाजपा की भुवन चंद्र खंडूरी के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के समय सहयोगी उत्तराखंड क्रांति दल उक्रांद के कोटे से भट्ट सिंचाई मंत्री थे। बाद में वर्ष 2012 में वह भाजपा में शामिल हो गये और देवप्रयाग से विधानसभा चुनाव लड़ा। निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े भट्ट को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2017 में भी वे भाजपा के प्रत्याशी विनोद कंडारी के सामने निर्दलीय चुनाव लड़े, जिसके बाद भट्ट को भाजपा ने निष्कासित कर दिया। अब भट्ट एक बार फिर उत्तराखंड क्रांति दल में शामिल होकर देवप्रयाग से चुनाव लड़ रहे हैं।












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