'सपने में देवी के दर्शन हुए तो फिर...' जानिए संतानदायिनी माता अनसूया के मंदिर का चमत्कारी रहस्य
चमोली जिले का प्रसिद्ध माता अनुसूया मंदिर। मंदिर में हर वर्ष की तरह दो दिवसीय अनुसूया मेला आयोजित होता है। माता अनुसूया मंदिर को निःसंतान दंपत्तियों के लिए खास माना जाता है। यह मेला न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
इसमें स्थानीय परंपराओं और आस्थाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। माता अनुसूया का यह मेला निःसंतान दंपत्तियों के लिए आस्था का केंद्र बन गया है।संतानदायिनी माता अनुसूया मंदिर। चमोली-ऊखीमठ सड़क पर गोपेश्वर से 8 किमी की सड़क और पांच किमी की पैदल दूरी पर संतानदायिनी माता अनुसूया के मंदिर पहुंचा जा सकता है।

यह मंदिर निर्जन जंगल में स्थित है। हर साल दत्तात्रेय पर्व पर यहां दो दिवसीय अनुसूया मेले का आयोजन होता है। जिसमें लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं। मान्यता है कि मंदिर में निसंतान दंपति द्वारा सच्चे मन से उपासना करने पर संतान प्राप्त होती है।
मान्यता है कि दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर आयोजित इस मेले में जो भी निःसंतान दंपति माता अनुसूया की पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें संतान का वरदान मिलता है। मेले के दौरान श्रद्धालु विशेष अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, और निःसंतान महिलाएं रात के अनुष्ठान में सम्मिलित होकर अपने सपनों में फल देखने की प्रतीक्षा करती हैं।
इसे संतान प्राप्ति का संकेत माना जाता है। माना जाता है कि सपने में देवी के दर्शन हो गए, तो समझो माता ने अपने भक्त की प्रार्थना सुन ली है। सदियों से रात्रि जागरण की यह परंपरा निरंतर जारी है, यहां आ चुके हजारों दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति हुई है।
दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर क्षेत्र के विभिन्न गांवों-सगर, बणद्वारा, देवलधार, कठूड़ और खल्ला-से देव डोलियां मंदिर में पहुंचती हैं। इन डोलियों के साथ पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन होता है। यह मंदिर कत्यूरी शैली में बना है।
अनसूया मंदिर परिसर के पास पीछे की ओर दत्तात्रेय भगवान की एक प्राचीन शिला है, जो माता के तीन पुत्रों में से एक हैं। दत्तात्रेय भगवन विष्णु के अवतार माने जाते हैं। हर साल दत्तात्रेय जयंती के दिन यहां मेला लगता है, जिसे स्थानीय लोग अनसूया मेला या नौदी मेला कहते हैं।












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