उत्तराखंड के प्रत्याशियों को कांग्रेस शासित राज्यों में पहुंचाने की तैयारी, जानिए पार्टी को है किस बात का डर
रिजल्ट आने के बाद जोड़तोड़ की आशंका
देहरादून, 4 मार्च। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के नतीजे 10 मार्च को आने हैं। उससे पहले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह नजर आ रहा है। कांग्रेसी सरकार बनाने को लेकर आश्वस्त दिख रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस अब परिणाम आने के बाद की रणनीति पर फोकस कर रही है। इसके लिए पार्टी अपने प्रत्याशियों से लगातार संपर्क बनाए हुए है। पार्टी सूत्रों का दावा है कि पार्टी ने कांग्रेस शासित राज्यों में रणनीति के तहत प्रत्याशियों को ठहरने की रणनीति पर फोकस करना शुरू कर दिया है।

रिजल्ट आने के बाद जोड़तोड़ की आशंका
प्रदेश में अब चुनाव परिणाम का काउंडाउन शुरू हो गया है। सियासी दलों में परिणाम को लेकर उत्सुकता नजर आ रही है। सबसे ज्यादा कांग्रेस चुनाव बाद सरकार बनाने की रणनीति पर फोकस कर रही है। जिसके लिए पार्टी किसी भी तरह की परिस्थिति से निपटने को भी तैयार नजर आ रही है। पार्टी के अदंरखाने अपने प्रत्याशियों के संपर्क में रहने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। जिससे परिणाम आने के बाद सभी को अपने साथ ही रखा जा सके। बहुमत के आसपास रहने या फिर कम नंबर आने पर भाजपा जोड़ तोड़ कर सकती है। इसको लेकर कांग्रेस के अंदरखाने अभी से इस बात का डर है कि केन्द्र में सरकार होने से भाजपा विधायकों को तोड़ सकती है।

राजस्थान या छत्तीसगढ़ है विकल्प
इधर अंदरखाने इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी ने पुराने इतिहास को देखते हुए प्रत्याशियों को दूसरे राज्यों में शिफ्ट करने की भी तैयारी कर ली है। दूसरे राज्यों में हुई अब तक की घटना और 2016 में उत्तराखंड में हुए दलबदल के खेल के बाद से कांग्रेस सबक ले चुकी है। इसके कारण पार्टी अपने शासित राज्यों में ही इसकी व्यवस्था कर रही है। सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस पहले विकल्प के तौर पर राजस्थान को देख रही है। राजस्थान ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए सबसे सेफ जगह मानी जा रही है। राजस्थान के नेताओं ने चुनाव में उत्तराखंड में सहयोग भी किया है। इस तरह की परिस्थिति से निपटने में गहलोत सरकार बड़ा रोल निभा सकता है। दूसरा विकल्प छत्तीसगढ़ माना जा रहा है। छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस समय कांग्रेस पार्टी में सबसे मजबूत मुख्यमंत्री के तौर पर नजर आ रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ भी कांग्रेस के प्रत्याशियों के लिए सबसे सेफ हो सकता है। इन सभी विकल्पों पर कांग्रेस के रणनीतिकार मंथन करने में जुटे हैं। साथ ही सभी कमजोर कड़ियों पर भी कांग्रेस अभी से नजर रख रही है।

हरदा के बयान के निकाले जा रहे सियासी माय
इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक बयान ने भी कांग्रेस के अंदरखाने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें हरीश रावत ने सभी लोकतांत्रिक ताकतों से साथ आने की बात की है। इस बयान के भी कई सियासी मायने निकाले जा रहे है। जिसमें कांग्रेस के बहुमत से कम नंबर आने पर बसपा, निर्दलीय और यूकेडी को साथ आने का न्यौता माना जा रहा है। इस समय उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में अन्य के भी कुछ सीटें जीतने की उम्मीद लगाई जा रही है। जिनको लेकर भाजपा, कांग्रेस अभी से खास रणनीति बना चुकी है। इसी कड़ी में हरीश रावत का ये बयान इसी ओर इशारा कर रहा है कि किसी भी विपरीत परिस्थिति में कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तैयार है।












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