उत्तराखंड में निर्दलीय फैक्टर का रहा है अपना अनोखा रिकॉर्ड, जीते तो हाथ में रहती है सत्ता की चाबी
निर्दलीयों की चुनावों में हैट्रिक और सत्ता में रही भागीदारी
देहरादून, 24 फरवरी। उत्तराखंड की 5वीं विधानसभा के लिए चुनाव प्रक्रिया निपटने के बाद अब 10 मार्च के परिणाम का इंतजार है। जिस तरह की रिपोर्ट मीडिया और सियासी दलों के बूथ स्तर से मिल रही है, उसके आधार पर इस बार निर्दलीय और अन्य दलों के प्रत्याशियों के पिछले चुनाव से इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। ऐसे में सभी सियासी दल निर्दलीय और जिताऊ प्रत्याशियों से संपर्क करने में जुट गए हैं। जानते हैं,उत्तराखंड के विधानसभा में अब तक निर्दलीयों के प्रदर्शन के बारे में।

2002 से 2012 तक मारी हैट्रिक
उत्तराखंड में अब तक 4 विधानसभा का गठन हो चुका है। अबकी बार 5वीं विधानसभा के लिए चुनाव हुआ है। प्रदेश के अब तक के इतिहास में तीन चुनावों में हैट्रिक मार चुके हैं। जबकि 2017 में दो निर्दलीय विधानसभा पहुंचे थे। इस बार भी निर्दलीय प्रदेश की सियासत में रिकॉर्ड बना सकते हैं। अभी तक 2 से 3 विधानसभाओं में निर्दलीय जीतने की स्थिति में नजर में आ रहे हैं। जो कि पिछले रिकॉर्ड को कायम रख सकते हैं। पहली बार 2002 में हुए चुनाव में 3 विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन लक्सर, डॉ शेलेन्द्र मोहन सिंघल जसपुर और गगन सिंह धारचूला से बतौर निर्दलीय चुनाव जीतकर आए। 2007 में फिर से 3 विधायक यशपाल बेनाम पौड़ी, राजेन्द्र भंडारी नंदप्रयाग और गगन सिंह धारचूला से जीतकर आए थे। 2007 में ही निर्दलीयों पर तब भाजपा की नजर गई जब मुख्यमंत्री को विधानसभा पहुंचाने के लिए एक सीट खाली कराने की चुनौती सामने आई। यशपाल बेनाम जो बतौर निर्दलीय पौड़ी से चुनाव जीतकर आए उन्होंने बीजेपी के तीरथ सिंह रावत को कड़ी टक्कर देते हुए 11 वोट से जीत हासिल की। भाजपा ने बहुत कोशिश की कि यशपाल बेनाम अपनी सीट मुख्यमंत्री के लिए छोड़ दें। लेकिन यशपाल बेनाम ने अपनी सीट छोड़ने से मना कर दिया। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस के टीपीएस रावत को अपने पाले में लाकर इस्तीफा दिलाया। फिर बीसी खंडूरी बतौर सीएम चुनाव जीतकर आए। इस सरकार में यूकेडी कोटे से दिवाकर भट्ट और निर्दलीय राजेन्द्र भंडारी मंत्री बने। इसके बाद 2012 में भी 3 विधायक मंत्री प्रसाद नैथानी देवप्रयाग, दिनेश धनै टिहरी और हरीश चंद्र दुर्गापाल लालकुंआ से चुनाव जीतकर आए और सरकार में बतौर मंत्री अहम भूमिका निभाई। अब तक 2012 में सबसे ज्यादा निर्दलीयों ने सत्ता में अपना योगदान दिया है।

2017 से बदला ट्रेंड, इस बार क्या टूटेगा रिकॉर्ड
2017 में प्रचंड बहुमत के बाद भी 2 विधायक निर्दलीय जीतकर आए। इनमें प्रीतम पंवार धनोल्टी और राम सिंह कैड़ा भीमताल से जीतकर विधानसभा पहुंचे। इस बार किस निर्दलीय को जनता अपना आशीर्वाद देती है। इसके लिए 10 मार्च का इंतजार है। जिन सीटों पर निर्दलीय का ज्यादा प्रभाव नजर आया, उनमें यमुनोत्री, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, धर्मपुर, रुद्रपुर सीटें शामिल हैं। ऐसे में सभी सियासी दलों की निर्दलीयों पर भी नजर लगी हुई है। हालांकि ज्यादा संभावनाओं में यमुनोत्री से संजय डोभाल, केदारनाथ से कुलदीप रावत, रुद्रपुर से राजकुमार ठुकराल, देवप्रयाग से यूकेडी दिवाकर भट्ट और खानपुर से उमेश कुमार पर ही सियासी दलों की नजर है।
अब तक कितने निर्दलीय पहुंचे विधानसभा
2002- 3
कुंवर प्रणव चैंपियन- लक्सर
डॉ शेलेन्द्र मोहन सिंघल- जसपुर
गगन सिंह- धारचूला
2007 -3
यशपाल बेनाम- पौड़ी
राजेन्द्र भंडारी- नंदप्रयाग
गगन सिंह -धारचूला
2012-3
मंत्री प्रसाद नैथानी- देवप्रयाग
दिनेश धनै-टिहरी
हरीश चंद्र दुर्गापाल-लालकुंआ
2017-2
प्रीतम पंवार- धनोल्टी
राम सिंह कैड़ा- भीमताल

10 से ज्यादा मतप्रतिशत मिले हैं निर्दलीयों को
2002 से 2017 तक निर्दलीय प्रत्याशियों का मत प्रतिशत 10 से नीचे नहीं गया। 2002 में निर्दलीय को सबसे ज्यादा 16.30 प्रतिशत, 2007 में 10.81, 2012 में 12.34 प्रतिशत और 2017 में 10.04 प्रतिशत रहा है।
चुनाव दर चुनाव मत प्रतिशत पर एक नजर
चुनाव भाजपा कांग्रेस बसपा यूकेडी निर्दलीय
2002 25.45 26.91 10.93 5.49 16.30
2007 31.90 29.59 11.76 5.49 10.81
2012 33.13 33.79 12.19 1.93 12.34
2017 46.51 33.49 6.98 0.74 10.04












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