चुनावी साल में धामी सरकार के सामने कर्मचारियों की मांगें पूरी करने का दबाव, कई संगठन आंदोलन की राह पर
उत्तराखंड सरकार के सामने कर्मचारियोंं को मनाने का बडा चेलेंज
देहरादून, 24 अगस्त। उत्तराखंड में चुनावी साल में कर्मचारी संगठनों का विरोध और उनकी मांगों को नजरअदांज करना सूबे की धामी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। उत्तराखंड विद्युत अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा के बाद अब उत्तराखंड परिवहन मिनिस्टीरियल कर्मचारी संघ भी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन की राह पर है। ऐसे में आने वाले दिनों में राज्य सरकार के सामने कर्मचारियों की मांगों पर फैसला लेने का दबाव बनता जा रहा है।

परिवहन मिनिस्टीरियल कर्मचारी संघ ने खोला मोर्चा
परिवहन विभाग के मिनिस्टीरियल संवर्ग में पदोन्नति प्रक्रिया शुरू न होने के कारण विभागीय कर्मचारियों ने भी आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है। उत्तराखंड परिवहन मिनिस्टीरियल कर्मचारी संघ की अध्यक्ष सुषमा चौधरी ने अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए विभागीय अधिकारियों को 25 अगस्त तक का समय दिया है। संघ ने 26 से आंदोलन शुरू करने और बड़े आंदोलन की भी रणनीति तैयार कर ली है। संघ का कहना है कि परिवहन विभाग के मिनिस्टीरियल संवर्ग के ढांचे के पुनर्गठन होने के बाद से करीब डेढ़ साल बाद भी मामला लटका हुआ है। विभागीय मंत्री के आश्वासन के बाद भी शासन की और से कार्रवाई नहीं होने से कर्मचारियों में रोष व्याप्त है।
फिर से हो सकता है ऊर्जा निगमों का आंदोलन
इधर ऊर्जा निगमों के कार्मिकों की एसीपी की पुरानी व्यवस्था की बहाली और समान काम के लिए समान वेतन समेत विभिन्न मांगों को लेकर उत्तराखंड विद्युत अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने पहले ही राज्य सरकार को आंदोलन की चेतावनी दे दी है। उत्तराखंड विद्युत अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा के संरक्षक इंसारुल हक ने कहा कि ऊर्जा मंत्री डा हरक सिंह रावत मांगों पर सरकार की और से फैसला लेने के लिए एक माह का समय मांगा गया था, जो कि 27 अगस्त को पूरा हो रहा है। जबकि अब तक सरकार की और से उनकी मांगों पर अभी तक कोई निर्णय नहीं हो पाया है। ऐसे में कर्मचारियों को आंदोलन के अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाता है। ऊर्जा निगमों के इस आंदोलन में करीब 10 हजार कर्मचारी जुड़े हुए हैं।
कर्मचारी और शिक्षकों ने भी दी है आंदोलन की चेतावनी
राज्य सरकार के लिए चुनावी साल में राज्य कर्मचारियों की और से लगातार अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाया जा रहा है। इसी तरह कर्मचारी और शिक्षकों की समन्वय समिति भी अपनी 14 सूत्रीय मांगो को लेकर सभी संगठनों को एकजुट कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी में है। इस तरह से प्रदेश के कई कर्मचारी संगठन चुनावी साल में अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने की तैयारी में जुटे हैं। जिनकी मांगों पर अगर सरकार ने जल्द से जल्द निर्णय नहीं लिया या कर्मचारियों को शांत नहीं करवाया तो आने वाला समय धामी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती लेकर आएगा।












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