चुनावी साल में पूर्व सीएम हरीश रावत ने चला नया दांव, 4 नहीं इन 9 जिलों के गठन का भी दिखा रहे सपना

चुनावी साल में पूर्व सीएम हरीश रावत ने 4 नहीं 9 जिलों के गठन की कही बात

देहरादून, 29 अक्टूबर। विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर उत्तराखंड में नए जिलों की मांग तेज हो गई है। जिसको लेकर कांग्रेस भी चुनावी मैदान में उतर गई है। कांग्रेस की और से पूर्व सीएम हरीश रावत ने 4 की जगह 9 नए जिले बनाने को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ​जो कि चुनाव में मुद्दा बनना तय है। ऐसे में नई जिलों के गठन का मसला आने वाले दिनों में भाजपा सरकार के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

वर्ष 2011 से लटका है मामला

वर्ष 2011 से लटका है मामला

उत्तराखंड में 13 जिले हैं। इसके बाद नए जिलों की मांग लंबे समय से उठ रही है। वर्ष 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कोटद्वार, यमुनोत्री, रानीखेत और डीडीहाट को नया जिला बनाने की घोषणा की थी, जो कि पौड़ी गढ़वाल जिले में कोटद्वार, उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री, अल्मोड़ा जिले में रानीखेत और पिथौरागढ़ जिले में डीडीहाट को नया जिला बनाने की संस्तुति की गई थी। हालांकि बाद में नए जिलों को लेकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

हरीश सरकार ने की थी बजट की व्यवस्था

हरीश सरकार ने की थी बजट की व्यवस्था

कांग्रेस सरकार में पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी नए जिलों के गठन के लिए 2016 के बजट में 100 करोड़ की व्यवस्था करने की बात की। हालांकि इसके बाद कांग्रेस में राजनीतिक उठापटक शुरू हुई और 4 जिलों की मांग फिर से ठंडे बस्ते में डाल दी गई। भाजपा सरकार के पिछले साढ़े 4 साल के कार्यकाल में भी कई बार स्थानीय लोगों ने सड़क पर उतरकर आंदोलन किए। अब पूर्व सीएम हरीश रावत ने नए जिलों की मांग पर एक नया दांव खेला है। हरीश रावत ने 4 जिलों कोटद्वार, यमुनोत्री, रानीखेत और डीडीहाट की जगह 9 जिले जिनमें नरेंद्र नगर,काशीपुर, गैरसैंण, वीरोंखाल, खटीमा भी जोड़ दिए हैं। जिससे एक बार फिर स्थानीय लोगों के मन में चुनावी साल में नए जिले को लेकर भावनाएं जगनी तय है।

हरदा की घोषणा पत्र में शामिल करने की मांग

हरदा की घोषणा पत्र में शामिल करने की मांग

हरीश रावत ने पोस्ट करते हुए कहा कि हमारे कुछ सीमांत_क्षेत्र जैसे डीडीहाट, रानीखेत, पुरोला के लोग बहुत व्यग्र हैं कि उनके जिले कब बनेंगे, इतनी ही व्यग्रता कोटद्वार, नरेंद्र नगर, हमारे काशीपुर और गैरसैंण, वीरोंखाल, खटीमा के लोगों में भी है। ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनको जिले का स्वरूप देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मैंने सौ करोड़ की व्यवस्था इन जिलों को बनाने के लिए 2016 के बजट में की थी। लेकिन राजनैतिक दबावों के कारण एक क्षेत्र के दूसरी क्षेत्र से प्रति की कारण ये जनपद अस्तित्व में नहीं आ पाये। हरीश रावत का कहना कि वे इस सरकार को राय तो नहीं देंगे, मगर इतना जरूर कहेंगे कि यदि भाजपा सरकार नहीं करेगी तो कांग्रेस शासन के अंतिम वर्ष के लिए इंतजार नहीं करेंगे क्योंकि अंतिम वर्ष में किसी जिले को खोलना राजनैतिक बेमानी भी है, क्योंकि आपको कुछ बजट का प्राविधान करना नहीं होता है। आप आने वाली सरकार के लिए वह काम सौंप देते हैं तो कांग्रेस इस काम को सत्ता में आने के 2 वर्ष के अंदर पूरा कर देगी ताकि एक बार प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चल सकें। हरीश रावत का तर्क है कि जब हम छोटे राज्य की बात करते हैं तो प्रशासनिक इकाइयां भी छोटी करनी पड़ती हैं, इसलिये हमने 37 से ज्यादा तहसीलें और उप तहसीलें बनाई, नगरपालिकाएं बनाई, यह विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया राज्य के लिए आवश्यक है। हरीश रावत ने इसे घोषणापत्र में शामिल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के मैं अपने साथियों से कहूंगा कि अपने घोषणापत्र में इस बिंदु पर जरूर विचार-विमर्श करें कि किस तरीके से हम लोगों की इस विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था की आकांक्षा को पूरा कर सकते हैं और नये जिलों को अस्तित्व में ला सकते हैं।

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