बूढ़ाकेदार नाथ धाम: शिव ने वृद्ध संन्यासी बन पांडवों को दिखाया स्वर्ग का मार्ग,केदारनाथ का यहीं से पैदल रास्ता
उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित है बूढ़ा केदार मंदिर
देहरादून, 16 जुलाई। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान शिव का प्रिय मास सावन मास शुरू हो चुका है। इसके साथ ही कांवड़ यात्रा भी चल रही है। उत्तराखंड में भगवान शिव के कई पौराणिक मंदिर हैं। जहां शिवभक्त सावन मास में जाकर दर्शन करना चाहते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत और पौराणिक मंदिर है बूढ़ाकेदार नाथ धाम। जो कि पंचकेदार के रुप में माना जाता है। जहां मंदिर की शिला पर उभरी पांडवों की मूर्ति आज भी रहस्य बनी है।

वृद्ध सन्यासी के रुप में दर्शन देने के कारण वृद्ध केदारेश्वर या बूढ़ा केदारनाथ कहलाए
बूढ़ा केदार मंदिर उत्तराखंड के टिहरी जिला में टिहरी शहर से लगभग 60 किलोमीटर की की दूरी पर समुद्र तल से तकरीबन 4400 फुट की ऊंचाई के साथ स्थित हिंदुओं का एक पवित्र धार्मिक स्थल है। पैदल कांवड़िये केदारनाथ धाम के लिए यहीं से होकर जाते हैं। मान्यता है कि गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर गए। यहीं पर भगवान शंकर ने बूढ़े ब्राहमण के रुप में पांडवों को दर्शन दिया था। दर्शन देने के बाद शिव शिला रुप में अन्तर्धान हो गए। वृद्ध सन्यासी के रुप में दर्शन देने के कारण ही वृद्ध केदारेश्वर या बूढ़ा केदारनाथ कहलाए।

बूढ़ा केदार में बालगंगा व धर्मगंगा नदियों की संगमस्थली
उत्तराखंड में पंच केदार मंदिरों के दर्शन का विशेष महत्व है। बूढ़ा केदार में बालगंगा व धर्मगंगा नदियों की संगमस्थली भी है। प्राचीन समय में यह स्थल पांच नदियों बालगंगा, धर्मगंगा, शिवगंगा, मेनकागंगा व मट्टानगंगा के संगम पर था। पर अब तीन नदियां दिखाई नहीं देतीं। बालगंगा और धर्मगंगा के संगम में स्नान करना पुण्यदायी माना गया है। आगे बढ़कर यही नदी भिलंगना का रूप धारण कर लेती है।

पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर गए
वृद्ध केदारेश्वर की चर्चा स्कन्द पुराण के केदारखंड में सोमेश्वर महादेव के रुप में मिलती है। बूढ़ा केदार के बारे में मान्यता है कि गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर गए। यहीं पर भगवान शंकर ने बूढ़े ब्राहमण के रुप में पांडवों को दर्शन दिया था। दर्शन देने के बाद शिव शिला रुप में अन्तर्धान हो गए। वृद्ध सन्यासी के रुप में दर्शन देने के कारण ही भोलेनाथ वृद्ध केदारेश्वर या बूढ़ा केदारनाथ कहलाए। मान्यता के मुताबिक यही वह स्थान है, जहां कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। बूढ़ा केदार के बारे में कहते हैं कि बाबा केदार यहां कुछ समय तक रुके थे।

विशालकाय लिंग पर भगवान शंकर की मूर्ति और लिंग विराजमान
बूढ़ा केदारनाथ मन्दिर के गर्भगृह में विशालकाय लिंगाकार फैलाव वाले पाषाण पर भगवान शंकर की मूर्ति और लिंग विराजमान है। दावा है कि इतना बड़ा शिवलिंग देश के किसी भी मंदिर में नहीं दिखाई देता। मंदिर में गणेश, पांचो पांडवों सहित द्रौपदी के प्राचीन चित्र हैं। मंदिर में ही बगल में भू शक्ति, आकाश शक्ति और पाताल शक्ति के रूप में विशाल त्रिशूल विराजमान है।

नाथ जाती के हैं पुजारी
प्राचीन मान्यता के अनुसार बूढ़ाकेदार नाथ मंदिर के पुजारी गुरु गोरक्ष नाथ साम्प्रदाय के नाथ जाती के ठाकुर होते है। बूढ़ा केदार में हर साल मार्गशीष माह में गुरु कैला पीर देवता का भब्य मेला आयोजित होता है। जिसमे देश बिदेशो से लोग दर्शनार्थ यहाँ पहुचते हैं। पूर्व में जब आवागमन की सुविधा नहीं थी तब बूढ़ाकेदार केदारनाथ का मुख्य मार्ग था केदारनाथ जाने वाले यात्री सबसे पहले बूढ़ाकेदार के दर्शन कर केदार नाथ को निकलते थे।












Click it and Unblock the Notifications