UP चुनाव से गायब हैं BJP के फायर ब्रांड नेता वरूण गांधी, क्या पीलीभीत में बिगाड़ेंगे समीकरण ?
लखनऊ, 22 फरवरी: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अपने चरम पर है और बीजेपी के फायरब्रांड नेता और युवा चेहरे वरूण गांधी का कहीं पता नहीं है। वरूण न तो बीजेपी की रैलियों में जा रहे हैं और न ही बीजेपी उन्हें बुलाने को तैयार हो रही है। 23 फरवरी को वरूण गांधी के गढ़ में मतदान होना है लेकिन वो दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। स्थानीय नेताओं का कहना है कि वरूण अपने जिले की विधानसभाओं में प्रचार करते तो इससे बीजेपी को ताकत मिलती लेकिन उनका न होना सबको खटक रहा है। वरूण के साथ ही उनकी मां और सांसद मेनका गांधी भी प्रचार से दूर ही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो पिछले कुछ समय से बीजेपी की सरकार पर हमलावर रहे वरूण भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पाएंगे यह देखने वाली बात होगी।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में तीन अक्टूबर को मारे गए आठ लोगों में चार किसान, तीन भाजपा कार्यकर्ता और एक पत्रकार शामिल थे। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा 'टेनी' के बेटे आशीष मिश्रा के काफिले ने किसानों को कुचलकर मार डाला। अगले दिन, 4 अक्टूबर को, जब योगी सरकार क्षति नियंत्रण में लगी हुई थी, तब लखीमपुर खीरी से सटे पीलीभीत के सांसद वरुण ने पत्र लिखा। यूपी बीजेपी के एक महासचिव ने वन इंडिया हिन्दी डॉट काम को बताया, "पार्टी ने वरुण के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने नेताओं के बीच अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेगी।"
लखीमपुर खीरी कांड के बाद वरूण ने कहा था, "मैंने पिछले पांच वर्षों में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की एक भी बैठक में भाग नहीं लिया है, मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इसका हिस्सा था।" वह लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के बाद किसानों का खुलकर समर्थन करने वाले एकमात्र भाजपा नेता हैं। उन्होंने 7 अक्टूबर को ट्विटर पर घटना का वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि हत्या के जरिए प्रदर्शनकारियों को चुप नहीं कराया जा सकता और इसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

इसके बाद से ही वरुण ने सार्वजनिक मंचों पर राज्य सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं और बीजेपी के सांगठनिक कार्यक्रमों और राज्य कार्यसमिति की बैठकों से दूरी बना ली है। वह तीन नए केंद्रीय कृषि कानूनों के प्रमुख आलोचक रहे हैं और योगी सरकार द्वारा गन्ने के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पिछले महीने 25 रुपये की वृद्धि को भी अपर्याप्त बताया था। पीलीभीत के सांसद चाहते थे कि एमएसपी बढ़ाकर 400 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए।
दरअसल 65 वर्षीय मेनका गांधी और दिवंगत संजय गांधी की पत्नी और पुत्र वरुण गांधी का हाशिए पर जाना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में शुरू हुआ। पहले कार्यकाल में, मेनका महिला और बाल विकास मंत्री थीं, लेकिन 2019 में उन्हें हटा दिया गया जब मोदी सरकार ने दूसरा कार्यकाल जीता। मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही वरूण और मेनका को बीजेपी से साइडलाइन कर दिया गया जिसकी वजह से वरूण समय समय पर योगी के साथ ही मोदी सरकार की नीतियों की भी आलोचना करने से नहीं चूक रहे हैं।

2014 में लोकसभा चुनाव के बाद वरुण को पार्टी महासचिव के पद से हटा दिया गया था, जब अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। भाजपा की बंगाल इकाई की जिम्मेदारी भी उनसे छीन ली गई। 2016 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के दौरान उनके समर्थकों ने उन्हें "मुख्यमंत्री चेहरा" के रूप में पेश करने वाले होर्डिंग लगाए थे। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले दो चरणों में वरुण को स्टार प्रचारक के तौर पर भी नहीं शामिल किया गया था।
1999 के चुनाव प्रचार के दौरान वरुण को पहली बार उनकी मां ने पीलीभीत निर्वाचन क्षेत्र में पेश किया था। मेनका तब एक निर्दलीय सांसद थीं, जिन्होंने निर्वाचन क्षेत्र से लगातार तीन चुनाव जीते थे। वह 1998 से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा हैं। वह और वरुण औपचारिक रूप से 2004 में भाजपा में शामिल हुए थे।
रूहेलखंड विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर राधेश्याम गौतम कहते हैं कि,
''जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तो बीजेपी को लगता था कि उन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का मुकाबला करने के लिए गांधी परिवार से किसी की जरूरत है। इसीलिए मेनका बीजेपी से संसद में बनी रहीं। लेकिन आज मेनका और वरुण ने भाजपा के लिए राजनीतिक प्रासंगिकता खो दी है। इसका एक कारण कांग्रेस की स्थिति है, जो राज्य में हाशिए चली गई है। यदि कांग्रेस मजबूत होती तो शायद बीजेपी को इन दोनों की जरूरत पड़ती। लेकिन फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है।"

दरअसल मार्च 2013 को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने वरुण को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया था। 33 साल की उम्र में, वह पार्टी के सबसे कम उम्र के महासचिव थे। उसी वर्ष, उन्हें पश्चिम बंगाल में भाजपा के मामलों का प्रभार भी दिया गया। 2014 में, आम चुनाव से पहले, वरुण ने राजनाथ की तुलना वाजपेयी से की और यहां तक कि उन्हें भाजपा का पीएम उम्मीदवार बनाने की वकालत भी की थी। यह तब था जब अधिकांश पार्टी नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में चाहती थी।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार कुमार पंकज कहते हैं कि,
"पीलीभीत और रोहिलखंड के आसपास के क्षेत्रों में किसानों का वर्चस्व है। इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वरुण उनकी मांगों का समर्थन करके अपने लिए एक राजनीतिक जगह बना रहे हैं। वरुण अपनी छवि को एक तेजतर्रार हिंदुत्व नेता से बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि उनके किसान निर्वाचन क्षेत्र के लिए अधिक स्वीकार्य है, ताकि गैर-भाजपा दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़े।''
कुछ महीने पहले ही भाजपा ने पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी और उनकी मां सुल्तानपुर की सांसद मेनका गांधी को अपनी 80 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया था। यह घटना संभवतः वरुण गांधी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 4 अक्टूबर के पत्र का परिणाम थी, जहां उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच के साथ-साथ लखीमपुर खीरी घटना में हत्या का मामला दर्ज करने की मांग की थी।












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