7 महीने में चार मंत्रियों के वायरल पत्रों ने मचाई सनसनी, क्या UP में बढ़ रहा अफसरों का दबदबा ?
उत्तर प्रदेश में सत्ता के गलियारों में मंत्रियों के पत्र का वायरल होना अब आम बात हो गई। Uttar Pradesh के CM Yogi Adityanath के दूसरे कार्यकाल में पिछले सात महीने में चार मंत्रियों के पत्र वायरल हुए हैं। इन पत्रों के वायरल होने के बाद सरकार के भीतर काफी उथल-पुथल भी मची लेकिन हर बार इन मामलों को किसी तरह दबाकर शांत कर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो पत्रों का वायरल होना यह दर्शाता है कि सरकार में मंत्रियों की बजाए नौकरशाही की ज्यादा चल रही है जिससे इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं।

ब्रजेश पाठक के वायरल पत्र को लेकर मचा था हंगामा
दरअसल सरकार बनने के बाद इसी साल जुलाई में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का एक पत्र वायरल हुआ था जिसे उन्होंने तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव अमित मोहन प्रसाद को लिखा था। इस पत्र में डॉक्टरों और पैरा-मेडिकल स्टाफ के तबादलों में विसंगतियों पर प्रकाश डाला गया था। पत्र में कहा गया है, "मेरी जानकारी में आया है कि वर्तमान सत्र में जो भी तबादले हुए हैं, उनमें स्थानांतरण नीति का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया है। . 'पत्र विवाद' के दो महीने बाद खादी विभाग से अमित मोहन प्रसाद का तबादला कर दिया गया था।

राज्य मंत्री दिनेश खटीक के पत्र ने मचाई सनसनी
पाठक के पत्र की चर्चा चल रही थी तो एक अन्य वायरल पत्र ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी। यूपी के राज्य मंत्री दिनेश खटीक ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर जल शक्ति विभाग के अधिकारियों द्वारा उपेक्षा की शिकायत की थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके वरिष्ठ समकक्ष स्वतंत्र देव सिंह, जो उस समय यूपी भाजपा के प्रमुख थे, ने उन्हें कोई काम आवंटित नहीं किया था। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि उन्होंने अपना इस्तीफा तक भेज दिया था लेकिन बाद में केंद्र सरकार और योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हो गया था।

जितिन प्रसाद के पत्रों ने बटोरी सुर्खियां
इसके बाद यूपी के पीडब्ल्यूडी मंत्री जितिन प्रसाद का पत्र वायरल हुआ था। उन्होंने इस साल 1 नवंबर को पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव नरेंद्र भूषण को पत्र लिखकर अपनी नाखुशी व्यक्त की थी क्योंकि उन्हें विभाग द्वारा गड्ढों से मुक्त सड़कों के बारे में प्रगति रिपोर्ट प्रदान नहीं की जा रही थी। उन्होंने कहा था कि 15 नवंबर तक यूपी में सड़कों को गड्ढा मुक्त करने के सीएम के निर्देशों के बावजूद, उनकी प्रगति रिपोर्ट उन्हें प्रदान नहीं की गई थी।

राज्य मंत्री दिनेश सिंह ने भी जताई थी नाराजगी
MoS (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने सीएम योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर मंडी परिषद में भ्रष्टाचार पर प्रकाश डाला। यह पत्र सितंबर में वायरल हुआ था। इसी तरह, औद्योगिक विकास आयुक्त अरविंद कुमार द्वारा 19 अक्टूबर को अपने अधीनस्थों को लिखे गए एक पत्र में विभाग की बैठकों में आमंत्रित नहीं किए जाने के लिए राज्य मंत्री जसवंत सैनी की नाखुशी का हवाला दिया था। कुमार ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि सैनी को सभी बैठकों में आमंत्रित किया जाए। राजनीतिक विशेषज्ञ कुमार पंकज कहते हैं कि दरअसल बात वायरल होने वाली चिट्ठियों की नहीं थी बल्कि विभिन्न विभागों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। जबकि भाजपा नेतृत्व सरकार और पार्टी संगठन के बीच समन्वय पर ध्यान केंद्रित कर रहा था, कैबिनेट, राज्य मंत्रियों और विभागों का नेतृत्व करने वाले नौकरशाहों के बीच समन्वय को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता है।

वायरल पत्र सरकार में नौकरशाही के प्रभुत्व का प्रतिबिम्ब
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पत्रों का वायरल होना यह दर्शाता है कि ऐसे लोग भी हैं जो सरकार की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट हैं और जो इस सरकार के कामकाज की शैली के खिलाफ हैं। राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के एक डिग्री कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर एस के द्विवेदी कहते हैं कि वायरल पत्र सरकार में नौकरशाही के प्रभुत्व का प्रतिबिंब हैं, जिसने वास्तव में मंत्रियों के महत्व को कम कर दिया है। पत्रों का वायरल होने का मतलब ही है कि सरकार में मंत्रियों की बजाए अफसरों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।












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