क्या यूपी के अरुण जेटली बनेंगे केशव प्रसाद मौर्य ?
लखनऊ, 15 मार्च। क्या केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश के अरुण जेटली बनेंगे? उपमुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए मौर्य विधानसभा चुनाव हार गये। योगी आदित्यनाथ जब दूसरी बार सरकार का गठन करेंगे तो क्या उन्हें पुराना ओहदा मिलेगा ? केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश में भाजपा का अतिपिछड़ा चेहरा माना जाता है।

स्वामी प्रसाद मौर्य और ओमप्रकाश राजभर प्रकरण के बाद मौर्य की भाजपा में अहमियत पहले से अधिक बढ़ गयी है। लेकिन दुर्भाग्य से वे चुनाव हार गये। लेकिन कई नेता ऐसे भी होते हैं जो चुनाव हारने के बाद भी पार्टी के लिए अपरिहार्य बने रहते हैं। जैसे अरुण जेटली (दिवगंत) 2014 में अमृतसर से लोकसभा का चुनाव हार गये थे। लेकिन उनकी विशिष्टता और योग्यता के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें वित्त मंत्री तो बनाया ही था, रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया था। क्या केशव प्रसाद मौर्य के बारे में भी भाजपा के नेता ऐसा ही सोच रहे हैं ?

एमएलसी हैं केशव प्रसाद मौर्य
केशव प्रसाद मौर्य के चुनाव हारने के बाद भी उनके उपमुख्यमंत्री या मंत्री बनने में कोई अड़चन नहीं है। वे विधान परिषद के सदस्य हैं। वे फूलपुर से सांसद चुने गये थे। लेकिन 2017 में जब उन्हें योगी सरकार में शामिल किया गया तो उन्होंने सांसदी से इस्तीफा कर दिया था। फिर विधान परिषद के सदस्य बने थे। वे अभी भी एमएलसी हैं और मंत्रिपरिषद में शामिल होने की योग्यता रखते हैं। अब सवाल ये है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता उनके बारे में क्या सोचते हैं ? संघ उनके बारे में क्या सोचता है ? केशव प्रसाद मौर्य अति पिछडे वर्ग के कुशवाहा (मौर्य) समाज से आते हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति का सबसे मजबूत आधार अतिपिछड़ा वर्ग ही है। ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। केशव प्रसाद मौर्य के समर्थकों ने उन्हें डिप्टी सीएम बनाने के लिए सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाया है। उनके समर्थकों कहना है कि वे भले चुनाव हार गये लेकिन उन्होंने भाजपा की जीत के लिए धुआंधार प्रचार किया था। विधानसभा का चुनाव हारने वाले केन्द्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल का कहना है, केशव प्रसाद मौर्य ने सिराथू का ध्यान छोड़ कर पूरे प्रदेश के उम्मीदवारों के लिए मेहनत की। उन्होंने निजी हित के बदले पार्टी हित को प्राथमिकता दी। पार्टी की नजर में वे एक बड़े नेता हैं।

कई सवाल भी हैं
केशव प्रसाद मौर्य विश्व हिंदू परिषद और संघ के जरिये भाजपा की राजनीति में आये हैं। विहिप में उन्हें अशोक सिंघल (दिवंगत) का करीबी माना जाता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवर संघ के सह कार्यवाहक दत्तात्रय होसबोले से उनकी निकटता है। इसलिए केशव प्रसाद मौर्य के बारे में संघ और भाजपा के शीर्ष स्तर पर फैसला लिया जाएगा। भाजपा में फिलहाल योगी सरकार के स्वरूप पर मंथन चल रहा है। क्या दो डिप्टी सीएम की व्यवस्था जारी रखी जाए ? अगर दो डिप्टी सीएम बनाना जरूरी हो तो विकल्प क्या होने चाहिए ? पहले अतिपिछड़ा और ब्राह्मण को इस पद पर मौका मिला था। 2022 के समीकऱण के मुताबिक अब किस समुदाय को डिप्टी सीएम का पद दिया जाए ? दलित, ओबीसी, ब्राह्मण या कोई अन्य ? 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एससी-एसटी के लिए सुरक्षित 86 सीटों में से 66 पर जीत हासिल की है। इस व्यापक समर्थन को देख कर भाजपा दलित समुदाय को उचित सम्मान देना चाहती है। दलित समाज से आने वाली बेबीरानी मौर्य उत्तराखंड में राज्यपाल थीं। लेकिन भाजपा ने उन्हें भविष्य की राजनीति के लिए इस्तीफा दिला कर उत्तर प्रदेश बुला लिया था। वे विधायक चुनी गयी हैं। चर्चा है कि उन्हें डिप्टी सीएम बना कर भाजपा दलित राजनीति में मजबूत पैठ बनाना चाहती है।

कोई दूसरी बड़ी जिम्मेदारी भी विकल्प
केशव प्रसाद मौर्य करीब एक लाख (98727) लाने के बाद भी चुनाव हार गये। उनको हराने वाली पल्लवी पटेल को 1 लाख 5 हजार 568 वोट मिले थे। कांटे के मुकाबले में वे 7586 वोटों से चुनाव हारे। पीएम मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा जैसे नेताओं ने सिराथू में सभा की थी। इसके बाद भी केशव प्रसाद मौर्य चुनाव हार गये। इस बात का अफसोस शीर्ष नेताओं को भी है। चर्चा है कि अगर उन्हें डिप्टी सीएम नहीं बनाया गया तो कोई अन्य बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। उत्तर प्रदेश में यादव, कुर्मी के बाद मौर्य (कुशवाहा) तीसरी प्रमुख जाति है। इस समुदाय के करीब 6 फीसदी वोटर हैं। केशव प्रसाद मौर्य के भविष्य का फैसला लेने से पहले भाजपा इन तथ्यों पर जरूर गौर करेगी।
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