जब योगी आदित्यनाथ ने दी थी भाजपा छोड़ने की धमकी
लखनऊ, 25 फरवरी। योगी आदित्यनाथ आज भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेताओं में एक हैं। एक समय वह भी था जब उन्होंने भाजपा छोड़ने की धमकी दी थी। उन्होंने जिस नेता की वजह से यह धमकी दी थी वह अचानक चर्चा में है।

आज उसी नेता को कहा जा रहा है कि वह उत्तर प्रदेश में सीएम योगी की राह को रोक सकता है। कौन है वह नेता और उसकी वजह क्या थी ?

उत्तर प्रदेश में कौन रोक सकता है भाजपा को ?
उत्तर प्रदेश में भाजपा को कौन हरा सकता है ? अगर अखिलेश यादव, मायावती और प्रियंका गांधी नहीं तो फिर कौन ? एआइएमआइएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इस सवाल का जवाब दिया है। उनके जवाब पर कोई सवाल खड़ा कर सकता है। कोई हंसी उड़ा सकता है। लेकिन ओवैसी का अपना आंकलन है। बाराबंकी की चुनावी सभा में उन्होंने कहा, मैं आप लोगों से अपील करता हूं। आप लोग 2014, 2017 और 2019 की गलती मत दोहराइगा। सपा, बसपा और कांग्रेस को समर्थन देकर अपना वोट जाया मत कीजिए। अगर कोई योगी सरकार को फिर बनने से रोक सकता है तो वे हैं बाबू सिंह कुशवाहा। बाबू सिंह कुशवाहा ! कौन बाबू सिंह कुशवाहा ? चुनावी परिदृश्य में किनारे खड़े बाबू सिंह कुशवाहा अचानक चर्चा के केन्द्र में आ गये। जो काम सपा के अखिलेश यादव, बसपा की मायावती और कांग्रेस की प्रियंका गांधी नहीं कर सकतीं वह काम गुमनामी में खोये बाबू सिंह कुशवाहा कर सकते हैं ? जो बाबू सिंह कुशवाहा फिर खड़ा होने के लिए खुद संघर्ष कर रहे हैं वे सत्तारुढ़ भाजपा को रोक पाएंगे ?

उत्थान के बाद पतन
चुनाव में माहौल बनाने के लिए नेता कई बार काल्पनिक बातों को भी बहुत मजबूती से कहते हैं। ओवैसी बड़ी मुस्लिम आबादी को देख कर उत्तर प्रदेश में पांव जमाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी से चुनावी समझौता किया है। ओवैसी मुस्लिम, दलित और अतिपिछड़ी जातियों की गोलबंदी से कुछ सीटें जीतना चाहते हैं। बाबू सिंह कुशवाहा एक समय बसपा के बड़े नेता थे। कुशवाहा समाज में बहुत पैठ थी। लेकिन एनएचआरएम घोटाला ने उनकी साख मिट्टी में मिला दी। वे गिरफ्तार हुए। गाजियाबाद की डसना जेल में पौने चार साल तक बंद रहे। 2016 में जमानत मिली तो बाहर निकले। मायावती ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी से निकाल दिया था। बसपा से निकाले जाने के बाद वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ते चले गये। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी, बाबू सिंह कुशवाहा से गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं। ओवैसी को भरोसा है कि बाबू सिंह के प्रभाव से बुंदेलखंड में चुनावी कामयाबी मिल सकती है। ओवैसी ने बाबू सिंह कुशवाहा को सीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट किया है। जाहिर है वे अपने सीएम कैंडिडेट को सबसे मजबूत बताएंगे ही।

जब योगी आदित्यनाथ ने दी थी भाजपा छोड़ने की धमकी ?
राजनीतिक दलों को दागी नेताओं से कभी परहेज नहीं रहा। बाबू सिंह कुशवाहा को बसपा ने निकाल दिया तो 2012 में भाजपा ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। भाजपा के कई नेताओं ने इस फैसले का भारी विरोध किया। भ्रष्टाचार के आरोपी नेता को पार्टी में शामिल किये जाने से वे खपा थे। योगी आदित्यनाथ उस समय सांसद थे। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर कुशवाहा को बाहर नहीं किया गया तो वह खुद पार्टी छोड़ देंगे। नितिन गड़करी उस समय भाजपा के अध्यक्ष थे। योगी आदित्यनाथ जैसे बड़े नेता के विरोध के बाद उन्होंने कहा था, पार्टी के नेता धीरज रखें, बाबू सिंह को एक रणनीति के तहत पार्टी में शामिल किया गया है। बाबू सिंह कुशवाहा ने बिनय कटियार की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ली थी। राजनाथ सिंह और तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही भी इस फैसले में शामिल थे। भारी विरोध के चलते बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा से बाहर होना पड़ा।

भाजपा के बाद मुलायम सिंह का साथ
भाजपा से निकलने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा की तरफ मुलायम सिंह यादव ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। बाबू सिंह कुशवाहा जेल में बंद थे। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पत्नी शिवकन्या कुशवाहा को गाजीपुर से उम्मीदवार बना दिया। मुलायम सिंह यादव-कुशवाहा वोट से चुनाव जीतना चाहते थे। शिवकन्या कुशवाहा का मुकाबला भाजपा के मजबूत नेता मनोज सिन्हा से हुआ। मनोज सिन्हा ने करीब 32 हजार वोटों से शिवकन्या कुशवाहा को हरा दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बाबू सिंह कुशवाहा का कांग्रेस से तालमेल हुआ। कांग्रेस ने कुशवाहा को सात सीटें दी थीं। उनकी पत्नी शिवकन्या कुशवाहा ने इस बार चंदौली से चुनाव लड़ा। शिवकन्या को सिर्फ 22 हजार 190 वोट मिले। उनकी करारी हार हुई। बाबू सिंह कुशवाहा के भाई शिव शरण कुशवाहा ने कांग्रेस के सिम्बल पर झांसी से चुनाव लड़ा था। शिवशरण को 86 हजार वोट मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे थे। यानी बाबू सिंह कुशवाहा ने कई दलों के समर्थन से चुनावी किस्मत आजमायी। लेकिन वे सफल नहीं हुए। अब वे ओवैसी के साथ हैं और ओवैसी उनकी शान में कसीदे गढ़ रहे हैं।
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