UP Power Crisis: सरकार- हड़ताली कर्मचारियों के बीच सुलह में इन 5 बड़ी बातों ने निभाई अहम भूमिका
उत्तर प्रदेश में बिजली का संकट दूर हो गया। कर्मचारी संगठन और सरकार के बीच सुलह हो गई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि समय से पहले ये हड़ताल कैसे समाप्त हो गई ये बड़ा और अहम सवाल है।

UP Power Strike update: उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों के संगठन यूपी विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने 72 घंटे की हड़ताल का ऐलान किया था। गुरुवार रात दस बजे से शुरू हुई यह हड़ताल समय से आठ घंटे पहले समाप्त हो गई। इस बीच कई जिलों में ब्लैक आउट जैसी स्थिति देखी गई। कर्मचारी अपनी मांग पर अड़े थे तो सरकार अपने कड़े एक्शन से उन्हें हड़ताल वापस लाने के लिए दबाव बना रही थी। लेकिन जानकारों की माने तो इन सबके बीच कई जिलों में बत्ती गुल होने से जिस तरह से आम पब्लिक ने सोशल मीडिया पर अपने तेवर दिखाए उससे दोनों ही पक्ष बैकफुट पर आ गए और उन्हें समय से पहले ही हड़ताल समाप्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मुख्यमंत्री योगी की नाराजगी का खतरा
हालांकि रविवार की दोपहर ऊर्जा मंत्री एके शर्मा और यूपीपीसीएल के अध्यक्ष एम देवराज और संगठन के बीच एक "सौहार्दपूर्ण बैठक" के बाद निर्धारित समय से लगभग आठ घंटे पहले वापस ले ली गई। जनता के कड़े रुख के बाद दोनों तरफ से नरमी के संकेत एक दिन बाद ही मिलने लगे थे। दूसरी ओर यूपी में बिजली को लेकर जिस तरह से यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जिस तरह से हमेशा प्रशंसा किया करते थे उससे भी दोनों पर भारी दबाव था कि उनके हस्तक्षेप से पहले ही इसम मामले को समाप्त किया जाए क्योंकि योगी की नाराजगी बढ़ी तो संगठन की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।

सोशल मीडिया पर जनता के गुस्से ने बढ़ाया सुलह के लिए दबाव
दरअसल हड़ताल के पहले दिन शाम तक ही उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) प्रबंधन और आंदोलनकारी कर्मचारी दोनों अलग-अलग कारणों से 72 घंटे की राज्यव्यापी हड़ताल के जल्द से जल्द अंत को देखने के लिए बेताब थे। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा की बार-बार की गई अपीलों की अनदेखी करते हुए कर्मचारी 16 मार्च की रात हड़ताल पर चले गए थे। उसके बाद यूपीपीसीएल प्रबंधन ने हड़तालियों से सख्ती से निपटने का फैसला किया और राज्य में बिजली आपूर्ति सामान्य रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की। इस बीच कई जिलों से लोग बिजली कटौली को लेकर फेसबुक, ट्वीटर और वाट्सअप पर अपने गुस्से का इजहार कर रहे थे। आम पब्लिक के गुस्से का शिकार सरकार और संगठन दोनों हो रहे थे। जनता के विरोध ने जल्दी सुलह कराने का दबाव बढ़ा दिया।

ऊर्जा मंत्री ने शुरू की कर्मचारयों का निलंबन और बर्खास्तगी
इस बीच, शुक्रवार को उच्च न्यायालय के एक आदेश के साथ, प्रबंधन ने आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (एस्मा) के तहत कर्मचारियों और उनके नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करते हुए सैकड़ों अनुबंधित श्रमिकों की सेवाओं को समाप्त करने और प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कार्रवाई भी शुरू कर दी। इस बीच संघर्ष समिति के नेताओं ने धमकी दी कि 72 घंटे की "सांकेतिक" हड़ताल राज्यव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदल जाएगी और कर्मचारी सामूहिक "जेल भरो आंदोलन" किया जाएगा। हालांकि दूसरे दिन ही ऊर्जा मंत्री ने संविदाकर्मियों को बर्खास्तगी की कार्रवाई शुरू कर दी थी। कई संविदाकर्मियों की सेवा समाप्त की गई तो कई लोगों का निलंबन हुआ। हालांकि सुलह के बाद ये सारे फैसले वापस लिए जाने की घोषणा की गई।

उच्च न्यायालय के अल्टीमेटम से बैकफुट पर आया संगठन
उच्च न्यायालय द्वारा अवमानना कार्यवाही शुरू किए जाने के बाद भी संघर्ष समिति के नेताओं के अप्रत्याशित सख्त रुख के कारण कर्मचारी नेताओं को शनिवार की शाम नई वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया। पांच घंटे तक चली यह बातचीत कोई नतीजा नहीं निकला। क्योंकि वे कर्मचारियों के खिलाफ शुरू की गई दंडात्मक कार्रवाई को वापस लेने का आश्वासन चाहते थे। हालांकि ऊर्जा मंत्री ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से परामर्श किए बिना किसी तरह का आश्वासन देने के खिलाफ थे।

उच्च न्यायालय के कोप का शिकार नहीं बनना चाहते थे कर्मचारी नेता
बिजली विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि,
यूपीपीसीएल ने हड़ताल से निपटने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने का दावा किया था। उसके पास बड़े पैमाने पर बिजली की आपूर्ति बाधित होने की रिपोर्ट थी। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी के कारण काफी दिक्कतें हो रही थीं। इस बीच हाइकोर्ट के निर्देश के बाद संघर्ष समिति के नेताओं के पास 72 घंटे की हड़ताल को जारी रखने के लिए बहुत कम गुंजाइश बची थी। अनिश्चितकालीन हड़ताल करना तो दूर की बात है और वे अदालत में पेश होने से पहले इसे हर हाल में निपटाना चाहते थे। हाइकोर्ट के कड़े रुख की वजह से ही संगठन का बारगेनिंग पॉवर भी कम हो गया था।












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