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UP Crime News: चंबल की पहली 'डाकू हसीना', जिसके घुंघरुओं से फैली थी दहशत, पुलिस वालों की कटवा दी थी उंगलियां!

UP Crime News Chambal Dacoit Putlibai Story: चंबल नदी के आस-पास फैले बीहड़ में 50 के दशक में एक ऐसी महिला डाकू का नाम गूंजा, जिसने अपने घुंघरुओं की झंकार से लोगों का दिल जीता। दुबली-पतली, पैरों में घुंघरु, बेहद खूबसूरत, रूप की रानी, हसीना से कम नहीं थी। तबले की थाप पर, शरीर पुतली की तरह हरकत करता। नाम पड़ा- 'पुतलीबाई'। शृंगार और नृत्य की शौकीन थी।

हालात के ऐसे भंवर में फंसी कि चंबल की पहली महिला खूंखार डाकू बन गई। बचपन में घुंघरुओं की छन-छन पर नाचते हुए शोहरत पाई, वही आगे चलकर बंदूक की गूंज से दहशत फैलाने लगी। उसकी जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी - प्यार, धोखा, बदला और अंत में खौफनाक मौत। Oneindia Hindi अपनी क्राइम सीरीज में आपको इस 'डाकू हसीना' की कहानी से रूबरू करा रहा है...

UP Crime News Chambal Dacoit Putlibai Story

घुंघरुओं की झंकार से बनी महफिलों की शान

पुतलीबाई का असली नाम गौहरबानो (Gauharbano) था। 1926 में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के बरबई गांव में जन्मी इस लड़की की परवरिश एक नर्तकी के रूप में हुई। उसके बड़े भाई अलादीन तबला बजाते थे, और पुतलीबाई उसकी थाप पर नाचती थी। उसकी खूबसूरती और नृत्य कला के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए। धीरे-धीरे, आगरा, कानपुर, लखनऊ जैसी जगहों पर भी उसकी महफिलें सजने लगीं, जहां अमीर लोग उसे देखने के लिए अपनी तिजोरियां खोल देते थे।

लेकिन, शोहरत के साथ दुश्मन भी बढ़ते हैं। उसकी बढ़ती लोकप्रियता से जलने वाले कई लोग उसे परेशान करने लगे। पुलिसवाले भी उसकी महफिलों में खलल डालने लगे। इससे परेशान होकर वह अपने गांव लौट आई।

डाकू सुल्ताना से मुलाकात और बीहड़ों में कदम

पुतलीबाई के नृत्य और सुंदरता की चर्चा चंबल के डाकुओं तक भी पहुंच गई थी। खासतौर पर डाकू सुल्ताना उसके दीवाने हो गए थे। एक दिन, जब वह एक शादी में नृत्य कर रही थी, तभी वहां डाकू सुल्ताना अपने गिरोह के साथ आ धमका। उसने बंदूक की नोक पर पुतलीबाई को अपने साथ चलने के लिए मजबूर किया। भाई की जान बचाने के लिए पुतलीबाई को मजबूरन सुल्ताना के साथ जाना पड़ा।

धीरे-धीरे पुतलीबाई को भी सुल्ताना से प्यार हो गया। वह उसके बच्चे की मां बनने वाली थी, इसलिए सुल्ताना ने उसे वापस गांव भेज दिया। लेकिन गांव लौटते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया। जबरन सुल्ताना का पता पूछना चाहा, प्रताड़ित किया और उनकी इज्जत भी लूटी। जब उसने एक बच्चे के जन्म दिया, तो उसे गांव में छोड़ दिया गया। लेकिन, अपने सम्मान की रक्षा के लिए वह फिर से बीहड़ लौट गई। इस बार उसने बदला लेने की ठानी और खूंखार डाकू बन गईं।

बदले की आग में बनी 'डाकू हसीना'

पुलिस की क्रूरता और समाज की ठोकरों ने उसे और भी निर्दयी बना दिया था। अब वह सिर्फ सुल्ताना की प्रेमिका नहीं, बल्कि खुद एक खतरनाक डकैत बन चुकी थी। जब पुलिस ने सुल्ताना के गिरोह को घेरकर हमला किया, तो उसके ही साथी डाकू लाखन सिंह ने साजिश रचकर सुल्ताना को मरवा दिया।

सुल्ताना की मौत के बाद बाबू लोहार उस गैंग का सरदार बन गया। इस बीच, लोहार की पुतलीबाई पर नियत खराब हो गई, और कई बार रेप किया। हालांकि, लोहार का राज ज्यादा दिन नहीं चला। पुलिस की मुठभेड़ में लोहार मारा गया। इसके बाद, पुतलीबाई डाकू बनकर उभरी और गैंग की सरदार बन गई। उसने बदला लेने की ठानी और एक-एक करके अपने दुश्मनों को मार गिराया। कहा जाता है कि उसने उन पुलिसवालों की उंगलियां काट दीं, जिन्होंने उसे यातनाएं दी थीं। वह लूटपाट और कत्ल के मामलों में पुरुष डाकुओं से भी ज्यादा खतरनाक साबित हुई।

एक हाथ कटने के बाद भी बनी खौफ की मिसाल

एक मुठभेड़ में पुलिस की गोली उसके बाएं हाथ में लगी, जिससे जहर फैलने लगा। आखिरकार, उसका हाथ काटना पड़ा। लेकिन, पुतलीबाई ने हार नहीं मानी। उसने अपने दाएं हाथ से बंदूक चलाना सीखा और और भी सटीक निशानेबाज बन गई। उसकी दहशत पूरे चंबल में फैल गई थी।

32 साल की उम्र में मौत का अंत

23 जनवरी 1958 को मुरैना जिले के कोथर गांव में पुलिस ने उसके गिरोह को चारों तरफ से घेर लिया। दोनों तरफ से जबरदस्त फायरिंग हुई। आखिरकार, 32 साल की इस खूंखार डाकू हसीना को पुलिस ने गोलियों से भून दिया। अगले दिन उसकी लाश मुरैना गांव में घूमाई गई, ताकि फिर कोई ऐसा करने की जुररत न करे।

चंबल की पहली बागी औरत

पुतलीबाई की कहानी केवल अपराध की नहीं, बल्कि बगावत की भी थी। वह चंबल की पहली महिला डकैत बनी, जिसने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी। उसकी बेटी तन्नो आज भी कोलकाता में रहती है। महज 32 साल की जिंदगी में पुतलीबाई ने शोहरत, प्रेम, धोखा और हिंसा - सबकुछ देखा। चंबल के बीहड़ों में उसकी कहानी आज भी एक रहस्य और रोमांच का हिस्सा बनी हुई है। क्या पुतलीबाई मजबूरी में डाकू बनीं या हालात ने उन्हें बदला लेने के लिए मजबूर कर दिया? इस सवाल का जवाब आज भी चंबल के बीहड़ में गूंजता है।

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