यूपी चुनाव से पहले जितिन प्रसाद पर दांव लगाने के पीछे भाजपा की ये है रणनीति
लखनऊ, 9 जून: भाजपा को बड़े दिनों से उत्तर प्रदेश के लिए राज्य स्तर पर एक भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरे की दरकार थी। जितिन प्रसाद के रूप में उसे प्रदेश स्तर का एक ऐसा ब्राह्मण चेहरा मिला है, जिसके परिवार की राजनीतिक विरासत की धाक कभी दिल्ली तक में जमी हुई थी। कलराज मिश्र के बाद पार्टी के पास राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं था, जिसकी बदलौत वह ठाकुर-ब्राह्मण की राजनीति में तालमेल बिठा सके। विधानसभा चुनाव में करीब 8 महीने बचे हुए हैं और चुनाव सीएम योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में लड़ना है। इसलिए पार्टी ने जितिन प्रसाद को लाकर अपने एक सशक्त समर्थक वर्ग का मनोबल फिर से ऊंचा करने का दांव लगाने की कोशिश की है।

ब्राह्मणों की मायूसी दूर करने की कोशिश ?
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में भाजपा से उसके कोर वोट बैंक ब्राह्मणों की मायूसी की अटकलों ने अंदर ही अंदर पार्टी के रणनीतिकारों को काफी परेशान कर रखा है। ऐसे में प्रदेश के धौरहरा लोकसभा सीट के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को कांग्रेस से तोड़कर लाने में भाजपा को बहुत बड़ी कामयाबी दिख रही है। जितिन प्रसाद प्रदेश के एक युवा ब्राह्मण नेता माने जाते हैं और बीजेपी को उम्मीद है कि उनकी बदलौत अगले विधानसभा चुनाव तो ब्राह्मणों की कथित नाराजगी दूर करने में उसे काफी मदद मिल सकती है। खासकर कुछ महीने पहले जिस तरह से गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ था, उसको देखकर राज्य के ब्राह्मण समाज में योगी आदित्यनाथ सरकर को लेकर एक अजीब असहजता की स्थिति बनने की बात कही गई। हालांकि, गैंगस्टर के साथ खड़े दिखने की कोशिश तो किसी ने नहीं की, लेकिन एक संदेश यह गया कि अपराधी अगर ब्राह्मण नहीं होता तो शायद उसका ऐसा अंजाम नहीं होता।
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भाजपा के कोर वोटर रहे हैं ब्राह्मण
उत्तर प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार से ब्राह्मणों की असहजता की शुरुआत का दावा तभी से किया जा रहा है, जबसे भाजपा ने ठाकुर या राजपूत जाति के योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाया है। प्रदेश में इस बड़े पद के लिए दोनों जातियों में परंपरागत तौर पर रस्साकशी की स्थिति पैदा होती रही है। प्रदेश में ब्राह्मणों की जनसंख्या 10 से 12 फीसदी बताई जाती है, जो कि 90 के दशक से बीजेपी के वोट बैंक की तरह काम करते रहे हैं। उससे पहले ये कांग्रेस के कट्टर वोट बैंक माने जाते थे। हाल के दिनों में मीडिया के एक वर्ग में उत्तर प्रदेश सरकार के नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को भी खूब उछाला गया था, लेकिन बीजेपी ने स्पष्ट कर दिया है कि 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए उसके पास योगी का कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में पार्टी को एक ऐसे ब्राह्मण चेहरे की दरकार थी, जो युवा भी हो और जिसका थोड़ा-बहुत प्रभाव भी हो। पार्टी के नजरिए से जितिन प्रसाद शायद उसमें फिट बैठते हैं।

2022 के लिए बन रही है रणनीति
पार्टी के संगठन मंत्री बीएल संतोष, प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह ने पिछले दिनों यहां के राजनीतिक हालात पर जो मंथन किया है, लगता है कि उसी के अनुसार पार्टी अब चुनाव के मुताबिक जातिगत गोटी सेट करने में लग गई है। जितिन प्रसाद से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास पूर्व नौकरशाह एके शर्मा को भी लखनऊ भेजा जा चुका है। वैसे शर्मा टाइटल की वजह से कुछ लोग उन्हें भी ब्राह्मण समझ ले रहे हैं, लेकिन वह दूसरी प्रभावशाली ऊंची जाति भूमिहार समाज से ताल्लुक रखते हैं। इसलिए किसी न किसी प्रभावी ब्राह्मण चेहरे को आगे लाना पार्टी के लिए जरूरी भी हो गया था।

रीता बहुगुणा जोशी को भी कांग्रेस से लाई है बीजेपी
बीजेपी की दिक्कत ये है कि प्रदेश स्तर पर कलराज मिश्र के बाद उसके पास कोई भी बड़ा विश्वसनीय चेहरा नहीं है। 2016 में पार्टी ने एक और ब्राह्मण नेता रीता बहुगुणा जोशी को भी कांग्रेस से झटका था, लेकिन वो अपने पिता और राज्य के पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा की तरह मास लीडर नहीं बन पाईं। ऐसे में कभी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इनर सर्किल में रहे जितिन प्रसाद पर सियासी दांव लगाना भाजपा की रणनीति का एक सधा हुआ प्रयास माना जा सकता है, जो कमल थामने से पहले अपनी पुरानी पार्टी में गैर-गांधी नेतृत्व की मांग उठाने की हिम्मत दिखा चुका है।












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