UP News: 2024 लोकसभा चुनाव से पहले आकाश आनंद के सामने होंगी ये बड़ी चुनौतियां
BSP Chief Mayawati: उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने लखनऊ में चल रही अहम बैठक में बड़ा ऐलान किया है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी बनाते हुए यूपी-उत्तराखंड को छोड़कर पूरे देश की जिम्मेदारी सौंप दी है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो आकाश आनंद के सामने 2024 आम चुनाव से पहले कई तरह की चुनौतियां खड़ी हैं। पांच राज्यों में बसपा के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उन्होंने दस दिसंबर को पार्टी की एक अहम बैठक बुलाई थी जिसमें उन्होने ये बड़ा ऐलान किया।

पार्टी को मूल आधार की तरफ लौटाने की चुनौती
मायावती का उत्तराधिकारी होने के बाद आकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को मूल आधार की तरफ लौटाना होगा। जिस तरह से बसपा और दलित के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है उससे बसपा को काफी नुकसान हुआ है। बसपा को अब उसी तेवर में जाना हो जो कभी वो 90 के दशक में हुआ करती थी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि समावेशी होने के प्रयास में एक तरफ जहां बसपा ने दूसरी जातियों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया तो दूसरी ओर दलित छिटकते चले गए। इसका उदाहरण 2014 से लेकर 2022 के बीच हुए कई चुनावों में बसपा देख चुकी है।
बीजेपी लाभार्थी वोट बैंक को कैसे काउंटर करेंगे आकाश
आकाश के सामने एक चुनौती यह भी है कि वह बीजेपी ने लाभार्थी वर्ग को खड़ा किया है उसको कैसे तोड़ेंगे। बीजेपी सरकार की तरफ से करीब एक दर्जन ऐसी योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनका लाभ दलित, पिछड़ों, मुसलमानों और सवर्णों को भी मिल रहा है। ऐसा करके बीजेपी ने जो लाभार्थी वोट बैंक बनाया है उसको बसपा कैसे काउंटर करेगी इसका हल आकाश को निकालना होगा।
यूपी के बाहर जनाधार बढ़ाने की चुनौती
मायावती ने बसपा के मूवमेंट को यूं तो यूपी से बाहर कई राज्यों में चलाने का प्रयास किया लेकिन वह ज्यादा सफल नहीं हो पायीं। आकाश के सामने यह भी चुनौती होगी कि यूपी-उत्तराखंड के बाहर वह हिन्दी पट्टी के राज्यों में बसपा को कैसे मजबूत करेंगे। हालांकि आकाश ने बिहार से लेकर राजस्थान समेत कई राज्यों में पार्टी के अभियानों की कमान संभाल रखी है लेकिन अब वहां जनाधार बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
दलितों को वापस पार्टी से जोड़ना होगा
आकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती गैर जाटव दलित को वापस लाना होगा। पिछले कई चुनावों से ऐसा देखा जा रहा है कि बीजेपी ने गैर जाटव में अपनी पैठ बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। बीजेपी के इस काट का जवाब बसपा को देना होगा क्योंकि दलितों को एकजुट किए बिना बसपा को मजबूत करना टेढ़ी खीर साबित होगी। पिछले कई चुनावों से ऐसा देखने में आ रहा है कि बीजेपी दलितों को साधने में लगी हुई है। इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने बेबीरानी मौर्या और असीम अरुण जैसे चेहरों को मंत्री बनाया है।
यूपी में चंद्रशेखर बनेंगे बड़ा रोड़ा
आकाश के सामने चुनौती पश्चिम में चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित नेता भी पेश करेंगे जो दलित युवाओं के बीच आइकन बनते जा रहे हैं। चंद्रशेखर के रहते पश्चिमी यूपी में बसपा दलितों के बीच पैठ कैसे बनाएगी इसका हल आकाश को निकालना होगा। चंद्रशेखर ने भी अपनी पार्टी को अभियान छेड़ा हुआ है। विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर ने गोरखपुर जाकर चुनाव लड़ा और एक बड़ा सियासी संदेश देने की काशिश की थी। चंद्रशेखर को कांग्रेस, सपा और रालोद जैसी पार्टियां अपने साथ लाने के लिए उतावली रहती हैं क्योंकि पश्चिम के कई जिलों में दलितों के बीच उनकी अच्छी पैठ मानी जाती है।
क्या कहते हैं पॉलिटिकल एक्सपर्ट
राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र नाथ भट्ट कहते हैं कि
आकाश के सामने चुनौतियां कम नहीं होंगी। उनकोइन चुनौतियों से पार पाने के लिए कठिन मेहनत करनी होगी। जिस तरीके से कांशीराम ने पार्टी की स्थापना की थी 80 के दशक में की थी उसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत शामिल थी। उन्होंने लोगों को गोलबंद किया था। उन्होंने जातीय गोलबंदी का तरीका अपनाया। तब उनके नारे हुआ करते थे तिलक तराजू और तलवार इनको मारे जूते चार। पहली बार बसपा को 13 एमएल 1989 में मले थे।
भट्ट ने कहा कि, कांशीराम कहते थे कि पहला चुनाव हारने के लिए होता है, दूसरा हरवाने के लिए और तीसरा जीतने के लिए। इसी रणनीति पर उन्होंने काम किया। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की नींव में आक्रामक राजनीति की नींव रखी थी। यही कारण था कि महज कुछ विधायकों से शुरू होने वाली बसपा 90 का दशक आते आते एकाएक सत्ता की दोड़ में शामिल हो गई थी।
वीरेंद्र नाथ भट्ट साफतौर पर कहते हैं कि,
समय के साथ ही सत्ता पाने के लिए बसपा ने अपनी विचारधारा से समझौता कर लिया था जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा। 1995 के बाद 2003 आते आते बसपा ने अपनी धारणा बदली। हाथी नहीं गणेश है ब्रह़मा विष्णु महेश है। पार्टी की मूल विचारधारा को त्याग दिया था। दलितों पर अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन की वजह से दलितों से दूरियां बढ़ने लगी इसका फायदा अन्य दलों ने उठाना शुरू किया जिसका खामियाजा बसपा को उठाना पड़ रहा है।









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