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देश में ‘पंडित’ पर वार, ब्राह्मणों के सम्मान में मायावती की एंट्री, क्या बहन जी को 2027 में सवर्णों से उम्मीद

Mayawati Brahman UP Election 2027 Strategy: देश की राजनीति में एक बार फिर जाति, सिनेमा और चुनावी गणित आपस में टकराते दिख रहे हैं। नेटफ्लिक्स की अपकमिंग फिल्म 'घूसखोर पंडत' को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे सियासी मैदान में उतर आया है।

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस मुद्दे पर खुलकर मोर्चा संभाल लिया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ ब्राह्मण समाज के सम्मान की लड़ाई है या फिर 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले एक सोची-समझी राजनीतिक चाल?

Mayawati Brahman

फिल्म से सियासत तक का सफर

विवाद की जड़ बनी है फिल्म 'घूसखोर पंडत', जिसका ट्रेलर सामने आते ही ब्राह्मण संगठनों में नाराजगी फैल गई। ट्रेलर में अभिनेता मनोज बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका में दिख रहे हैं, जिसका नाम अजय दीक्षित है और जिसे लोग 'पंडत' कहकर बुलाते हैं। आरोप है कि सीरीज में 'पंडत' शब्द को नकारात्मक और अपमानजनक संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, जिससे पूरे ब्राह्मण समाज की छवि पर सवाल खड़े होते हैं।

मायावती की एंट्री, बयान ने बढ़ाई गर्मी

मायावती ने इस विवाद में कूदते हुए इसे केवल एक फिल्मी मसला नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान का सवाल बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि फिल्मों में सुनियोजित तरीके से 'पंडित' शब्द को गलत अर्थों में पेश किया जा रहा है। उनका आरोप है कि 'घुसपैठिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर ब्राह्मण समाज को पूरे देश में बदनाम किया जा रहा है। मायावती ने केंद्र सरकार से मांग की कि ऐसी जातिसूचक और भावनाएं आहत करने वाली फिल्मों पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए।

मायावती ने एक्स पर लिखा,

''यह बड़े दुख व चिन्ता की बात है कि पिछले कुछ समय से अकेले यूपी में ही नहीं बल्कि अब तो फिल्मों में भी 'पंडत' को घूसखोर आदि बताकर पूरे देश में जो इनका अपमान व अनादर किया जा रहा है और जिससे समूचे ब्राह्मण समाज में इस समय ज़बरदस्त रोष व्याप्त है, इसकी हमारी पार्टी भी कड़े शब्दों में निन्दा करती है। ऐसी इस जातिसूचक फिल्म (वेब सीरीज) 'घूसखोर पंडत' पर केन्द्र सरकार को तुरन्त प्रतिबन्ध लगाना चाहिये, बी.एस.पी. की यह माँग। साथ ही, इसको लेकर लखनऊ पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज करना उचित कदम।''

'घुसपैठिया' शब्द पर सबसे बड़ा ऐतराज

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील बिंदु है 'घुसपैठिया' शब्द। ब्राह्मण संगठनों का कहना है कि सीरीज में इस शब्द का प्रयोग ब्राह्मण पात्रों के लिए किया गया है, जिससे यह संदेश जाता है कि एक पूरा समुदाय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला है। मायावती ने इसे सीधे तौर पर जातिवादी मानसिकता करार दिया और कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी एक समाज को निशाना बनाना गलत है।

सीरीज की कहानी क्या कहती है?

फिल्मकारों का दावा है कि यह फिल्म सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी पर आधारित है। कहानी एक ऐसे सरकारी कर्मचारी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध वसूली करता है। लेकिन विरोध करने वालों का कहना है कि भ्रष्टाचार किसी जाति विशेष से नहीं जुड़ा होता। अगर कहानी सिर्फ सिस्टम की खामियों पर है, तो फिर शीर्षक और पात्र की पहचान को जाति से क्यों जोड़ा गया?

ब्राह्मण संगठनों का गुस्सा और चेतावनी

'सनातन रक्षक दल' समेत कई ब्राह्मण संगठनों ने इस फिल्म के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि 'पंडत' शब्द ज्ञान, सम्मान और धार्मिक पहचान का प्रतीक है। उसके साथ 'घूसखोर' जोड़ना समाज के लिए अपमानजनक है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर सीरीज के नाम और कंटेंट में बदलाव नहीं किया गया, तो वे इसके बहिष्कार के साथ कानूनी रास्ता भी अपनाएंगे।

मायावती के बयान के बाद निर्देशक रितेश शाह और निर्माता नीरज पांडे पर दबाव और बढ़ गया है। एक तरफ राजनीतिक बयानबाजी, दूसरी तरफ सामाजिक संगठनों की चेतावनी, इस सीरीज की रिलीज से पहले ही मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। मामला अब सिर्फ सियासी नहीं, बल्कि कानूनी शक्ल भी लेता दिख रहा है।

2027 UP चुनाव और सवर्ण राजनीति (UP Election 2027 Strategy)

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती का यह आक्रामक रुख सिर्फ सामाजिक चिंता है या 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी। बसपा लंबे समय से ब्राह्मण वोट बैंक को वापस जोड़ने की कोशिश करती रही है। ब्राह्मण सम्मान का मुद्दा उठाकर मायावती एक बार फिर सवर्णों को संदेश देने की कोशिश करती दिख रही हैं कि बसपा केवल दलितों की नहीं, बल्कि सभी वर्गों की आवाज है।

'घूसखोर पंडत' विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सिनेमा में रचनात्मक आजादी की सीमा क्या होनी चाहिए। क्या कहानी कहने के लिए किसी जाति या समुदाय की पहचान को इस तरह इस्तेमाल करना जरूरी है। और जब चुनाव नजदीक हों, तो ऐसे मुद्दे खुद-ब-खुद राजनीतिक रंग क्यों पकड़ लेते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि यह विवाद सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सियासी मंचों पर और जोर पकड़ सकता है, जहां सम्मान, अभिव्यक्ति और वोट बैंक तीनों की परीक्षा होगी।

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