Mainpuri by Election: Mulayam Singh की राजनीतिक विरासत को बचा पाएंगी डिम्पल यादव ?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने मैनपुरी संसदीय क्षेत्र के लिए 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारने का फैसला किया है। मैनपुरी हमेशा से पार्टी की अपनी सीट रही है और लंबे समय से यादव परिवार का गढ़ रहा है इसलिए इस बार सीट को बरकरार रखना सपा की सबसे बड़ी चुनौती है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो पिता मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव अखिलेश यादव के लिए पहली अग्नि परीक्षा है। इस साल फरवरी-मार्च में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (Bhartiya Janta Party) ने रामपुर और आजमगढ़ की सीट सपा से छीन ली थी।

सपा की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं शिवपाल
दरअसल जून 2022 में, समाजवादी पार्टी रामपुर और आजमगढ़ संसदीय क्षेत्रों में हुए उपचुनावों में हार गई, जिसे अखिलेश यादव का गढ़ माना जाता है। इस बार मैनपुरी में आगामी चुनाव के अखिलेश यादव चिंतित हैं कि उनके चाचा शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। प्रगति समाजवादी पार्टी (लोहिया) के संस्थापक उनके बिछड़े हुए चाचा लंबे समय से दावा कर रहे हैं कि वह वास्तव में मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं।

पारिवारिक कलह प्रभावित कर सकता है मैनपुरी का चुनाव
इसलिए, अखिलेश की पहली चुनौती चल रही पारिवारिक कलह से होने वाले नुकसान को दूर करना और कम करना होगा, क्योंकि यह मैनपुरी में चुनाव परिणाम को बहुत अच्छी तरह प्रभावित कर सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वालो का दावा है कि समाजवादी पार्टी द्वारा डिंपल यादव को मैदान में उतारने के फैसले ने शिवपाल यादव को नाराज कर दिया है। मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र को अच्छी तरह से समझने वाले शिवपाल यादव वोटों को विभाजित कर सकते हैं। जो परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसा करके वह समाजवादी पार्टी की कीमत पर बीजेपी को फायदा पहुंचा सकते हैं।

मैनपुरी सीट पर टिकी हैं बीजेपी की निगाहें
इधर, मैनपुरी सीट पर भी बीजेपी की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि पार्टी का मानना है कि मैनपुरी में समाजवादी पार्टी की हार से 2024 के आम चुनाव से पहले उसके मनोबल को ठेस पहुंचेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि समाजवादी पार्टी 1996 से लगातार इस सीट पर जीत हासिल कर रही है और बीजेपी ने कभी भी यह सीट नहीं जीती है। मुलायम सिंह ने 1996 और 2022 के बीच पांच बार सीट जीती। यादव परिवार के धर्मेंद्र यादव और तेज प्रताप सिंह ने भी क्रमशः 2004 और 2014 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।

पारिवारिक कलह का फायदा उठा सकती है बीजेपी
बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी यादवों के बीच चल रहे पारिवारिक विवाद का फायदा उठाकर मैनपुरी जीतना चाहती है। शिवपाल के खुद चुनाव लड़ने के इच्छुक होने की स्थिति में पार्टी उन्हें वापस लेने की योजना बना रही है। नहीं तो मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव को मैदान में उतारने की उसकी एक और योजना है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा नई दिल्ली में बुधवार को मुलाकात की थी।

जेपी नड्डा और अपर्णा की मुलाकात पर लग रही अटकलें
लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार है कि अपर्णा को बीजेपी का टिकट मिल सकता है। गुरुवार, 10 नवंबर को जब वह बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी से मिलने गईं तो मामला और बढ़ गया है। जानकारों का कहना है कि मणिपुरी सीट को लेकर भी चर्चा चल रही थी। भाजपा का मानना है कि मैनपुरी को सपा से जीतकर मतदाताओं को यह संदेश दिया जा सकता है कि अखिलेश की पार्टी भाजपा के मुकाबले कमजोर है। यह परसेप्शन उत्तर प्रदेश में 2024 के आम चुनावों में बीजेपी के मिशन 75 प्लस अभियान के दावे को और मजबूत कर सकती है।

गैर यादव ओबीसी बन सकते हैं डिंपल के लिए मुसीबत
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश ने अपनी पत्नी डिंपल यादव को टिकट देकर राजनीतिक भूल की है। वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन का कहना है कि अगर शाक्य समुदाय जैसे गैर-यादव ओबीसी भाजपा की ओर रुख करते हैं, तो सपा के लिए सीट बरकरार रखना मुश्किल होगा। बसपा के समर्थन के बावजूद 2019 में मुलायम सिंह की जीत का अंतर लगभग दो लाख वोटों से कम हो गया था। उपचुनावों में भी यही सिलसिला जारी रहा तो सपा के जीतने की संभावना को झटका लग सकता है।












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