किठौर विधानसभा सीट: ध्रुवीकरण की कोशिशों के बीच जातीय लामबंदी का होगा बड़ा असर, जानिए ग्राउंड रिपोर्ट
लखनऊ, 2 फ़रवरी: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। आम की मिठास के लिए मशहूर किठौर विधानसभा सीट पर इस समय जातीय लामबंदी का पूरा असर दिख रहा है। विधानसभा से जुड़े गावों में किसान आंदोलन का भी असर दिखाई दे रहा है। लेकिन कस्बों में ध्रुवीकरण का असर भी साफ देखा जा सकता है। दलितों पर यहां बीएसपी से ज्यादा बीजेपी और गठबंधन की निगाहें हैं।

बीजेपी ने मौजूदा विधायक सत्यवीर त्यागी को ही दोबारा मैदान में उतारा है। वहीं सपा और आरएलडी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर पर दाव लगाया है। वहीं कांग्रेस ने धनसिंह कोतवाल की प्रपौत्री को मैदान में उतारा है। बीएसपी ने गुर्जर के पी मावी पर दाव लगाया है। ओवैसी ने तस्लीम अहमद को प्रत्याशी बनाया है।
बीजेपी को 2017 की लहर में इस सीट से जीत मिली थी। आरएलडी से बीजेपी में आए सत्यवीर त्यागी ने यहां से तीन बार विधायक रह चुके शाहिद मंजूर को शिकस्त दी थी। शाहिद के पिता मंजूर अहमद भी दो बार यहां से विधायक बने थे। मंजूर के किले को भेदने वाले सत्यवीर इस सीट से बीजेपी के दूसरे विधायक हैं। इनके पहले 1993 में रामकिशन वर्मा ने पहली बार कमल खिलाया था। इस सीट पर कांग्रेस को 3 बार और बीजेपी को 2 बार जीत मिली है। बीएसपी को यहां कभी जीत नहीं मिली है। मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर दलित, गुर्जर, ठाकुर और त्यागी मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं। मुस्लिम मतदाता करीब सवा लाख हैं तो दलितों की संख्या 72 हजार है।
क्या कहते हैं पिछले आंकड़े
पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी के सत्यवीर त्यागी को 90,622 वोट मिले थे जबकि सपा के सहित मंजूर को 79,800 मत मिले थे। बीएसपी के गजराज सिंह 62, 503 और आरएलडी के उम्मीदवार को 6598 वोट मिले थे। जातीय आंकड़ों की बात करें तो इस सीट पर 1.25 हजार मुस्लिम, 72 हजार दलित, 42 हजार गुर्जर, 28 हजार ठाकुर, 18 हजार त्यागी, 19 हजार और 12 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं।












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