क्या सिराथू में केशव प्रसाद की हार के पीछे है पार्टी की अंदरूनी भीतरघात !, जानिए
लखनऊ, 15 मार्च: उत्तर प्रदेश में चुनाव सम्पन्न होने के बाद यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ की जीत से ज्यादा चर्चे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की हार के हैं। उनकी हार को लेकर बीजेपी के अंदरखाने समीक्षा हो रही है। संगठन के बड़े नेताओं के मुताबिक केशव के खिलाफ सिराथू में भितरघात हुआ है जिसकी वजह से वह चुनाव हार गए हैं। केशव की हार की पूरी रिपोर्ट कौशांबी बीजेपी यूनिट से मांगी गई है। सवाल ये है कि 2012 में केशव ने उस समय रिकॉर्ड मार्जिन से जीत हासिल की थी जब यूपी में सपा की सरकार बनी थी। इसके बाद वह 2014 के आम चुनाव में वह फूलपुर सीट से भी सांसद बनने में सफल रहे थे। लेकिन क्या वजह है कि यूपी में एक लोकप्रिय नेता को हार का सामना करना पड़ा।

कौशांबी के सासंद विनोद सोनकर ने नहीं ली दिलचस्पी
बीजेपी के बड़े नेताओं से मिली जानकारी के अनुसार केशव प्रसाद मौर्य की हार के कई बड़े कारण सामने आए हैं। कहा जा रहा है कि बीजेपी के स्थानीय सांसद विनोद सोनकर ने सिराथू में केशव के लिए प्रचार ही नहीं किया उल्टे अपने लोगों को केशव के खिलाफ भड़काने की कोशिश की जिससे लोगों के बीच एक गलत मैसेज गया। यही वजह से है कि विनोद सोनकर के समाज ने केशव को वोट नहीं किया जिससे केशव की हार हो गई।

कौशांबी की सभी सीटों पर सपा का कब्जा
कौशांबी के सिराथू में जहां केशव की हार को लेकर लोग चर्चा करने में जुटे हैं वहीं दूसरी ओर इस जिले की सभी विधानसभा सीटों पर सपा ने जीत का परचम लहरा दिया। अखिलेश यादव ने पहले ही दावा किया था कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य चुनाव हार रहे हैं। उनकी भविष्यवाणी उस समय सही हो गई जब सपा की उम्मीदवार पल्लवी पटेल ने केशव की सत्ता को पलट दिया। सपा ने कौशांबी में बीजेपी को जोर का झटका धीरे से दिया। बीजेपी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि वह कौशांबी की सिराथू सहित सारी सीटें हार जाएंगी। इसके लिए अब विनोद सोनकर के प्रचार न करने की बात सामने आ रही है।

क्या अति आत्मविश्वास का शिकार हो गए केशव
बीजेपी के सूत्रों के मुताबिक पार्टी स्तर पर जो आंतरिक सर्वे कराए गए थे उमसें सिराथू सीट बीजेपी 100% जीत रही थी क्योंकि 2012, 2017 में भी बीजेपी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव भी जीता गया है। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी भी इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि वह हर हाल में यह सीट जीत लेगी। ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य भी क्षेत्र में समय नहीं दे पाए और वह प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार करते रहे। दूसरे को जिताने में लगे केशव को अपनी हार की खबर नहीं थी। पार्टी के भीतर ही इतना भितरघात हुआ कि वह चुनाव हार गए।

क्या विनोद सोनकर पर फोड़ा जा रहा हार का ठीकरा
इन सारे सवालों के बीच एक सवाल यह भी है कि केशव की हार के बाद क्या उनके अपने सांसद विनोद सोनकर पर इसका ठीकरा फोड़ने में जुटे हैं। सोनकर का कहना है कि वह दलित समाज से हैं इसलिए कोई भी उनको आसानी से निशाना बना सकता है। एक बात गौर करने वाली है कि क्या बीजेपी सांसद सोनकर कौशांबी में इतने प्रभावी हो गए कि उन्होंने भितरघात करके बीजेपी का पूरे जिले से सूपड़ा साफ कर दिया। विनोद सोनकर को मोदी के करीबीयों में गिना जाता है कि लिहाजा पार्टी भी यहां हार का ठीकरा उनके सिर नहीं फोड़ना चाहेगी क्योंकि सिराथू की हार के कई कारण हैं जिनकी तह तक जाना जरूरी है।

पहले कार्यकाल में योगी और केशव के बीच चला था शीत युद्ध
यूपी में पहली बार योगी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही केशव मौर्य के बीच शीत युद्ध चल रहा था। इसकी कहानी उस समय शुरू हुई जब केशव बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उनकी अगुवाई में बीजेपी ने यूपी में 312 सीटें हासिल की थीं जिससे उनका कद बढ़ा और वो सरकार बनने पर उपमुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। हालांकि केशव की दिली चाहत तो सीएम बनने की थी लेकिन वह पूरी नहीं हो पायी। डिप्टी सीएम बनने के बाद भी केशव और योगी के बीच कई बार तनतनी की खबरें सामने आयीं थीं। लेकिन दोनों नेता कभी खुलकर एक दूसरे के सामने नहीं आए। राजनीतिक विश्लेषकों का यही मानना है कि दोनों की अंदररूनी लड़ाई में तीसरे व्यक्ति ने अपना हाथ साफ कर लिया।












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