Google की नौकरी छोड़ एक चोले में तप कर रही यह महिला
वाराणसी। इंसान को यदि भगवान और अध्यात्म की प्राप्ति हो जाए तो वह सांसारिक मोह माया को छोड़कर बस इसी रास्ते पर चल पड़ता है और कुछ इसी तर्ज पर वाराणसी की परम धर्म संसद में हिस्सा लेने पहुंची सबसे कम उम्र की संन्यासी साध्वी ब्रह्मवादिनी देवी स्कंद। मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली ब्रह्मवादिनी देवी अपना पिछला नाम बताने को तैयार नहीं है लेकिन उन्होंने लगभग 18 महीने पहले गूगल में 80 हजार महीने की नौकरी छोड़कर संन्यास ले लिया। संन्यास लेने की वजह क्या रही इसके पीछे उनका कहना है कि सिर्फ और सिर्फ अध्यात्म और अपने अंदर भगवान की खोज करने के बाद उन्हें यह ज्ञान हुआ कि अब सांसारिक मोह माया में कुछ नहीं है जो भी है वह निरंकार यानी अपने अंदर समाहित भगवान में ही हैं और उन्होंने सब कुछ छोड़ कर इस मार्ग पर चलना ही बेहतर समझा।

घर वालों ने पहले जताया था विरोध
साध्वी ब्रह्मवादिनी स्कंद जो मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली साध्वी ब्रह्मवादिनी स्कंद ने बताया कि दिल्ली में उनके पिता का गिफ्ट आइटम का बिजनेस है मां हमेशा से अध्यात्मिक की तरफ झुकी रही और बड़ा भाई पढ़ाई पर ध्यान देता रहा दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद सी एस की पढ़ाई कंप्लीट करने के साथ ही साथ ही ब्रह्मवादिनी को गूगल में नौकरी मिली लगभग डेढ़ साल तक उन्होंने गूगल में नौकरी करने के बाद एक दिन अचानक से संन्यास ले लिया। साध्वी ब्रह्मवादिनी ने बताया कि जब मैंने 18 महीने पहले संन्यास लिया तो पिताजी और मेरे भाई ने इसका विरोध किया लेकिन जब वह मेरी गुरु मां से मिलने पहुंचे तो उनसे मिलने के बाद उनका भी मन बदल गया उनका विरोध इस बात को लेकर था कि आज के दौर में साधु संन्यासियों पर विश्वास नहीं किया जा सकता फर्जी सन्यासी बन कर जिस तरह से लोगों को ठगा जा रहा है उसकी वजह से पिताजी और भाई काफी परेशान थे लेकिन मेरी गुरु मां से मिलने के बाद सब का मन बदल गया उन्होंने मेरे फैसले पर मेरा साथ दिया और आज मेरी गुरु मां की तरफ से मुझे इतना सशक्त बना दिया गया है।

एक चोले पर करनी पड़ती है तपस्या
उन्होंने बताया कि ठंड के मौसम में भी मैं सिर्फ एक ही चोले में अपना पूरा वक्त बिता रही हूं बिना किसी दिक्कत परेशानी के कई दिन भूखा रह ना सिर्फ पानी पर रहना मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया हां गूगल में नौकरी करते वक्त हाई-फाई लाइफ थी सांसारिक जीवन था लेकिन अब इन सब से मोहभंग हो चुका है परिवार वाले जब चाहे मुझसे बात कर सकते हैं लेकिन मैं कभी किसी से संपर्क नहीं करती हूं और मेरी जिंदगी आज बिल्कुल ही अच्छे ढंग से चल रही है क्योंकि सब कुछ बदल गया है जो मोह माया वाली जिंदगी थी उससे दूर होकर अब मैं इस संन्यासी जीवन को जी रही हूं जो मेरे लिए बड़ी बात है क्योंकि मेरी गुरु मां ने मंदिरों में मौजूद भगवान के नहीं बल्कि मेरे अंदर मौजूद भगवान के दर्शन करवाने का काम किया है जिसकी वजह से मैंने इतनी बड़ी और हाई प्रोफाइल नौकरी छोड़कर इस तरफ रुख किया।
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