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कारगिल: ठोकरें खाने को मजबूर अमर शहीद आबिद खां का परिवार

By Rajeevkumar Singh
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हरदोई। उत्तर प्रदेश के हरदोई इलाके में कारगिल शहीद का परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। आबिद के परिजन कई बार सरकार से भी गुहार लगा चुके हैं कि कभी 6 महीने तो कभी 9 महीने बाद पेंशन मिल पाती है। आज तक ना ही बीपीएल कार्ड बना और ना ही गैस कनेक्शन मिला है इसलिए कच्ची मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाना पड़ता है।

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सेना के लिए जीवन समर्पित करना चाहते थे आबिद खां

सेना के लिए जीवन समर्पित करना चाहते थे आबिद खां

हरदोई जिले के पाली थाना क्षेत्र के अंतर्गत के काजिसराय में 6 मई 1972 मे जन्में आबिद खाँ का सपना था कि वह अपना जीवन सेना के लिए समर्पित कर दे। 5 फरवरी 1988 को उनकी यह ख्वाहिश पूरी हुई और वह सेना मे भर्ती हो गये।

टाइगर हिल की लड़ाई पर उनको भेजा गया

टाइगर हिल की लड़ाई पर उनको भेजा गया

आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान अकेले मोर्चा लेने और गिर जाने पर वहां से बचकर सकुशल चौकी पहुंचने पर आबिद को 1995 में सेना से मेडल भी प्राप्त हुआ था। 4 साल बाद 1999 में कारगिल की जंग शुरू हो गई जब आबिद खान बकरीद की छुट्टियों में अपने घर आए थे, तभी हेडक्वार्टर से बुलावा आ गया और टाइगर हिल फतेह करने के लिए भेजा गया।

17 पाक सैनिकों को मारने के बाद हुए शहीद

17 पाक सैनिकों को मारने के बाद हुए शहीद

30 जून को दुश्मन की गोलीबारी के बीच कई सैनिक शहीद हो गए। एक गोली आबिद के पैर में भी लगी। वे आगे बढ़ते हुए एक साथ 32 फायर झोंक दिए जिससे 17 पाक सैनिकों की लाशें धरती पर गिर गई। इसी बीच दूसरी गोली आबिद को लगी और वह शाहिद हो गये।

परिजनों ने कहा, सेना के लोगों ने दिया धोखा

परिजनों ने कहा, सेना के लोगों ने दिया धोखा

आबिद के परिजनों का यह कहना है सेना के लोगों ने हमलोगों को धोखा दिया है। आबिद के पिता गफ्फार खान के मुताबिक, उनका एक बेटा मजदूरी करता है और एक बेटा नाजिर के पास ही रहता है जबकि सरकार ने एक बेटे को नौकरी देने का वादा किया था पर वह अभी तक पूरा नही हुआ।

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English summary
Family of Kargil Martyr Abid Khan in distress in Hardoi, Uttar Pradesh.
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