मोदी के गढ़ में पूर्व MLA का परिवार खा रहा है सूखी रोटी, जानिए क्यों?

मुश्ताक की दोनों बेटियां,बहुएं और चारों बेटे बुनकरों के लिए रील का अंटा भरते हैं। इनकी मजदूरी एक किलो धागे पर 8 रुपया है। नौबत यहां तक आ जाती है कि इन्हें जिंदा रहने के लिए सूखी रोटी खानी पड़ती है।

वाराणसी। यूपी में चुनावी दंगल पूरे शबाब पर है। ऐसे में प्रत्याशियों और पार्टियों ने अपनी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है। OneIndia आपको वाराणसी के तेलियाना के रहने वाले पूर्व MLA मुश्ताक अहमद अंसारी के परिवार से मिला रहा है। जिनकी पत्नी, बेटे, बेटियां और बहुएं दूसरों की मजदूरी करते हैं। उनकी पत्नी, बेटी, बहू टेलरों से मिले कपड़े को लेकर घर पर सिलाई करती हैं। जिसकी बमुश्किल मजदूरी 70 से 90 रूपए ही मिल पाती है। पत्नी ताहिरा ने बताया कि 1977 में जब मुश्ताक का नाम फाइनल हुआ तो घर में 300 रुपए थे और दोस्तों ने 18 हजार रुपए चंदा जुटाकर उन्हें चुनाव लड़वाया था।
मोदी के गढ़ में पूर्व MLA का परिवार खा रहा है सूखी रोटी, जानिए क्यों?
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इमरजेंसी के बाद मुश्ताक ने कांग्रेस के उम्मीदवार को हराया था

पत्नी ताहिरा ने बताया कि 1977 में इमरजेंसी के बाद कांग्रेस को हराने के लिए सभी विपक्षी पार्टियों ने जनता पार्टी बनाई थी। हमारे शौहर वकालत करते थे और ज्यादा पढ़े-लिखे थे। समाजसेवी होने के नाते टिकट पा गए। उस चुनाव में उन्होंने 38,562 वोट पाए और कांग्रेस के अब्दुल अजीज को 15,462 वोटों से हराया। इस दौरान उन्होंने वकालत करना छोड़ दिया। केवल लोगों के लिए परेशान रहने वाले मुश्ताक उस समय 1000 जरुरतमंदों पर अपनी पूरी तनख्वा खर्च कर देते थे। 1980 में जब मुश्ताक MLA पद से हटे तो कोई काम नहीं बचा था। वो चाह कर भी अपनी वकालत को दोबारा चला नहीं पाए। 1976 में शादी के बाद 1978 के करीब बड़े बेटे मो. अहमद का जन्म हुआ, धीरे-धीरे चार बेटे और दो बेटियां हुई। 1980 के बाद वो लगातार संघर्ष करते रहे, राजनीति में जो दोस्त उन्हें लाए थे साथ छोड़कर चले गए। नौबत यहां तक आ गई कि कोई भी बेटा-बेटी पढ़ नहीं पाया।

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क्या कहता हैं पूरा परिवार?

बड़े बेटे मो. अहमद ने बताया कि 1983-84 में पिताजी को न्यूरो की बीमारी हो गई, कर्जे से इलाज का प्रयास किया गया लेकिन कोई फायदा न हो सका। वो अदालत में जिरह के समय गिर भी गए थे। 1990 में उनका स्कूटर से एक्सिडेंट भी हो गया था। इलाज के चलते परिवार कर्ज में दबता चला गया। पिताजी के जिंदा रहने तक 1997 तक MLA पेंशन मिलती रही लेकिन फरवरी 1997 में मौत के बाद वो भी मिलना बंद हो गई। कई जगह चक्कर लगाए लेकिन कभी कागज अधूरे तो कभी किसी दूसरे बहाने से उन्हें भगा दिया जाता। वक्त वो भी आया जब बिजली नदारत रहने से काम भी ठप हो गया।

पत्नी ताहिरा ने बताया कि 1978 में पहली बार MLA रहते हुए वो 2,000 रुपए का सेकेंड हैंड फ्रीज खरीद कर लाए जो बाद में खराब हो गया। 1985 ली गई ब्लैक एंड वाइट टीवी भी खराब ही पड़ी है। 2009 में छोटी बहन की शादी तय हुई तो 30 हजार रुपए करीब कर्ज लिया गया। दिन रात मेहनत कर कर्ज जैसे-तैसे भरा गया। 2003 में पड़ोसी ने कर्ज दिया तो 15 हजार तो रील भरने की मशीन खरीदने में चली गई। एक साल तक मो. अहमद, रुखसार और मुस्तफा ने खाली समय निकाल कर पड़ोसी के यहां बनारसी साड़ी में धागा बुनने का काम कर कर्ज चुकता किया। बड़ी बहन सिद्दीका बानो की शादी पैसे के अभाव में आज तक नहीं हो पाई।

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नहीं आया कोई सहयोग के लिए आगे

छोटे बेटे फैजान ने बताया कि ट्यूशन पढ़ाकर उन्हें 2,000 रुपए मिलते हैं। जो वो अम्मी को परिवार चलाने के लिए दे देते हैं। पैसे की ही वजह से फैजान Mcom. में एडमिशन नहीं ले पाया। इस मामले पर जब संबंधित लेखपाल जयशंकर से पेंशन न मिलने की वजह पर बात की तो उन्होंने बताया कि प्रशासन को लखनऊ कागज भेजा जा चुका है। वारिश रजिस्टर, परिवार रजिस्टर की कॉपी मांगी गई थी जो बनवाकर दे दी गई है। फोन भी किया गया लेकिन उत्तर ये मिला की बाद में बात की जाए।

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