दलों के दलदल में फंसा यूपी का दलित, हर किसी की चील-कौवों सी नजर
उत्तर प्रदेश में चुनाव और तमाम मुद्दों से बात हटकर जाति और धर्म पर ना आए ऐसा हो नहीं सकता। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और नेताओं की नजर दलितों की चुनावी भूमिका पर विश्लेषण।
गुजरात के ऊना में कथित गौरक्षकों के हाथों दलितों की पिटाई का मामला भले थम गया हो। भले ही हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे रोहिथ वेमुला की आत्महत्या का मामला सिर्फ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और वहां के छात्र नेताओं की सभा तक सीमित हो।
लेकिन उत्तर प्रदेश के इस विधानसभा चुनाव में बीते सालों में के दौरान दलितों पर हुए अत्याचार, जरूर एक चुनावी मुद्दा होगा। बसपा जैसे राजनीतिक दल इन चुनावों को राजनीतिक बदले के मौके के तौर पर देखें, तो कोई इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

2011 में जारी की गई भारत की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में 23.88 फीसदी की हिस्सेदारी वाला दलित भी अब उसी तुष्टीकरण के जादू टोने का शिकार होने लगा है, जिसका प्रयोग किसी जमाने में या यूं कहें कि आज भी अल्पसंख्यकों (स्पष्ट कहना चाहें तो मुस्लिमों) पर पार्टियां कर रही हैं।
सिर्फ यही है एक ऐसा समुदाय
मौजूदा हालात और विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर कहें तो प्रदेश में दलित ही एक ऐसा समुदाय है जो पूरी तरह से मतदान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है।
शायद यही वजह है कि आज हर दल, दलित को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहा है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि संघ और भाजपा आज इन्हें चुनावी जरूरत के कारण अपनाने की ओर हैं। इसी सिलसिले में संघ की पत्रिका, पांचजन्य के उस विशेषांक को जरूर याद करना होगा, जो शायद पहली बार पूरी तरह से भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर प्रकाशित की गई थी।

जब शाह को पसंद आया लौकी का कोफ्ता
प्रदेश में दलितों के तुष्टीकरण पर अपनी बात आगे बढ़ाने के लिए मुझे कुछ तस्वीरों से गुजरना होगा। पहली तस्वीर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की। जिसमें वो इसी साल मई की 31 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित सेवापुरी विकास खंड के जोगियापुर गांव में दलित परिवार के घर खाना खाने गए थे। यहां शाह का स्वागत बैंड बाजे के साथ हुआ था।
गांव स्थित बिंद बस्ती में गिरिजा प्रसाद बिंद के घर कुल 38 मिनट शाह रुके और दलित के घर खाना खाया। शाह को भोजन में चावल, दाल, कढ़ी, लौकी का कोफ्ता, कटहल और नेनुआ की सब्जी संग आम की चटनी परोसी गई। सारा खाना गिरजा प्रसाद के घर की बहुओं ने तैयार किया था। बेटियों ने परोसा था।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान शाह को लौकी का कोफ्ता और आम की चटनी बेहद पसंद आई थी। रोटी, शाह ने मांगकर खाई थी। इस दौरान यह बात भी सामने आई थी कि आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता इस गांव में आया। शाह के गांव में आने के बाद लोगों को ये उम्मीद थी कि बिजली, पानी और खराब सड़क सरीखी उनकी समस्याएं हल हो जाएंगी, लेकिन वो आज भी जस की तस हैं।
शाह आए, खाया-पीया। वादा किया कि अगर 2017 में भाजपा की सरकार, प्रदेश में आएगी तो गांव के हालात सुधर जाएंगे।

राहुल ने पूछा नहीं कि 'भईया, खाने का इंतजाम कहां से हुआ है?'
अब ये दूसरी तस्वीर। इसमें कांग्रेस उपाध्यक्ष और प्रदेश के ही अमेठी से सांसद राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद के साथ अपनी किसान यात्रा के दौरान मऊ में दलित स्वामीनाथ के घर खाना खा रहे हैं। राहुल के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल @officeofRg से बताया गया था कि स्वामिनाथ का परिवार 60,000 रुपए के कर्ज तले दबा है।
उन्हीं के ट्वीटर हैंडल से यह जानकारी भी दी गई थी कि राहुल को खाने में रोटी चोखा और गुड़ दिया गया था। राहुल जब अपनी यात्रा समेत मऊ से आगे बढ़े तो उसके अगले दिन खबर आई कि स्वामीनाथ ने पड़ोसी से उधार ले कर और सामान इकट्ठा कर खाने पीने का इंतजाम किया था।
मुझे यह नहीं पता कि राहुल को जब इस बात की जानकारी थी कि स्वामीनाथ पर 60,000 रुपए का कर्ज है तो उन्होंने उनसे अपने अंदाज में यह पूछा की नहीं 'भइया, खाने का इंतजाम कहां से हुआ है?'

बसपा के राज में दलितों पर बढ़ गए अत्याचार
अब बात करते हैं, बहुजन समाज पार्टी की। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के नजरिए में इस पार्टी को दलितों का मसीहा माना जाता है। 2007 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उनकी राजनीति का नजरिया बदल चुका था। वो अब तिलक, तराजू और तलवार वाले नारे से हटकर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करने लगी थीं। राजनीतिक भाषा में इसे सोशल इंजनीयरिंग भी कहा गया, जिसका फायदा मायावती को हुआ।
ये मायावती और उनका तिलिस्म ही है कि बाकी मतदाता भले ही बारिश, ठंड और धूप से कतरा कर वोट देने ना जाए लेकिन बसपा का मतदाता, बिना मौसम की परवाह किए वोट देने जाता है। इसलिए यह भी कहा जाता है कि प्रदेश में बसपा के वोट की गिनती 20 फीसदी से शुरू होती है।
मायावती ने अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए बहुत कुछ किया। काशीराम आवास योजना के तहत घर दिया, सरकारी ठेकों में दलितों और महिलाओं को विशेष आरक्षण दिया, फिर भी आंकड़े बयान करते हैं कि इस दौरान दलितों पर अत्याचार कम नहीं हुए।
बात अगर 2001 से 2006 तक के शासन काल की करें तो दलितों पर किए गए अत्याचार के कुल 34,622 मामले दर्ज किए गए थे। ये मामले साल 2007 से 2012 के बीच बढ़कर 41,851 हो गए। वहीं अगर बात 2014 के आंकड़ों की करें तो देश भर में दलितों पर किए गए अत्याचार के कुल 47,064 मामले दर्ज किए गए 8,075 मामले यानी करीब 12.75 फीसदी मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए।

अखिलेश का राज और दलितों के खिलाफ फैसले
बात समाजवादी पार्टी की करें तो इनके शासन काल में यूं तो सबके लिए कानून व्यवस्था की हालत खराब होती है लेकिन दलितों पर इस दौरान अप्रत्याशित रूप से अत्याचार बढ़े हैं। साथ ही दलित कल्याण की इकाइयां, ऐसे फैसले लागू कर रही हैं जिन्हें दलितों के खिलाफ माना जा रहा है।
सपा सरकार में दलितों से जुड़े कई फैसले हुए। जैसे दलितों की जमीन को खरीदने बेचने के नियम बदले गए। राज्य सरकार की नौकरी में प्रमोशन में एससी-एसटी कर्मचारियों के लिए नौकरी में निर्धारित किए गए कोटे को खत्म करने का फैसला। पहले फैसले से जहां दलितों की जमीन पर भूमाफियाओं की निगाह पैनी हुई, वहीं दूसरे फैसले के चलते करीब 2 लाख कर्मचारियों के डिमोशन का खतरा बढ़ गया।

जरूरत इस बात की है
कुल मिलाकर यह देखा जाना चाहिए कि जिस तरह से दलितों के घर नेता खाना खाने जाते हैं। उनकी आर्थिक हालत देख कर फोटो के साथ ट्वीट करते हैं। लेकिन हालात सुधारने की बात कभी नहीं करते। बेहतर हो कि नेता, दलितों को सिर्फ वोट का जरिया ना माने। अगर उनके घर खाना, खाने जाएं तो कम से कम उनके हालात जरूर पूछे।
सिर्फ अपनी सरकार आने पर विकास का दावा ना करें। ताकि इस बार जब कोई स्वामीनाथ या गिरिजा प्रसाद, किसी बड़े नेता को खाना खिलाए, तो उसे इस बात का इत्मीनान हो कि आज अगर नेता जी कूलर की हवा में खाना खा रहे हैं, तो कल हमें सीलिंग फैन ही, नसीब जरूर होगा।
जरूरत है कि दलितों के लिए अब सिर्फ कानून ना बनाया जाए। उनके लिए उन लोगों के हृदय में भी परिवर्तन लाया जाए जो आज भी उनसे दूर रहना चाहते हैं। वो चाहे कोई राजनीतिक व्यक्ति हो- कोई आम आदमी हो या फिर दल।
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