उत्तर प्रदेश चुनाव : प्रियंका के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई

लखनऊ, 16 नवंबर। उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस अकेले 403 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 2017 में केवल 7 सीट जीतने वाली कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा फैसला है। इस आत्मविश्वास की वजह हैं प्रियंका गांधी। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए उन्होंने अपना शत प्रतिशत झोंक दिया है।

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    सम्पूर्ण सहभागिता के साथ वे पहली बार चुनावी समर में उतरी हैं। पूरे प्रदेश में उनका धुआंधार दौरा जारी है। कांग्रेस की पूरी उम्मीद प्रियंका गांधी पर टिकी है। यह चुनाव प्रियंका गांधी और कांग्रेस के लिए करो या मरो का मुकाबला है। जीते तो पुनर्जीवन जीवन, हारे तो सब कुछ खत्म। क्या प्रियंका गांधी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर एक बड़ा जोखिम उठाया है ?

    “अगर कांग्रेस को जीतना होगा तो अकेले ही जीतेगी”

    “अगर कांग्रेस को जीतना होगा तो अकेले ही जीतेगी”

    प्रियंका गांधी ने रविवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों के पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक की थी। कांग्रेस के अधिकतर नेताओं ने अकेले चुनाव लड़ने की मांग की थी। इससे प्रियंका गांधी के एकला चलो की नीति को ताकत मिली थी। प्रियंका गांधी का मानना है कि 2017 में कांग्रेस ने सपा के साथ चुनावी समझौता किया था। इसके बाद भी सिर्फ 7 सीटें मिलीं थीं। इसलिए अगर कांग्रेस को जीतना होगा तो वह अपने दम पर ही जीतेगी। जब गठबंधन से भी केवल 7 सीट ही मिले तो फिर इसका औचित्य क्या है ? प्रिय़ंका गांधी को वैसे तो सीएम चेहरा घोषित नहीं किया गया है लेकिन इस चुनाव की राजनीतिक धुरी वही हैं। कांग्रेस की सारी राजनीति उनके ईर्द गिर्द ही घूम रही है। उन्होंने योगी आदित्यनाथ की सरकार को घेरने के लिए 2017 के उन्नाव रेप कांड, 2020 के हाथरस गैंगरेप और हाल ही की लखीमपुरी खीरी घटना को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया है। उनका तर्क है कि चूंकि इन घटनाओं पर सिर्फ कांग्रेस ने ही प्रबल विरोध जताया, इसलिए पार्टी के प्रति जनसमर्थन बढ़ा है। उनकी राय में सपा या बसपा नहीं बल्कि सिर्फ कांग्रेस ही जनता की लड़ाई लड़ रही है। प्रियंका गांधी इन मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरी भी हैं।

    क्या अकेले लड़ने की क्षमता है कांग्रेस में ?

    क्या अकेले लड़ने की क्षमता है कांग्रेस में ?

    चुनावी राजनीति हमेशा किसी तय फारमूला पर नहीं चलती। गठबंधन या अकेले चुनाव लड़ने का विकल्प किसी दल की जमीनी हकीकत पर निर्भर करता है। हार और जीत के लिए कई कारण जिम्मेदार होते हैं। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। बल्कि कहें तो बिहार में कांग्रेस की स्थिति उत्तर प्रदेश से बेहतर है। रिश्ते चाहे जैसे भी हों बिहार में कांग्रेस की राजद से निभ रही थी। कन्हैया कुमार साथ क्या आये, कांग्रेस अतिउत्साह में आ गयी। दो सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने अकेले लड़ने का फैसला कर लिया। क्या नेता और क्या कार्यकर्ता, सभी लोगों ने ऐसा समां बांध दिया कि अब बिहार में कांग्रेस, राजद की बराबरी में खड़ा होने वाली है। लेकिन हुआ क्या, कांग्रेस की जमानत भी जब्त हो गयी। राजद की भी हार हुई। इन दोनों की लड़ाई में जदयू ने मैदान मार लिया। इसलिए कांग्रेस अगर उत्तर प्रदेश में जमीनी सच्चाई को समझे बिना अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती है, तो उसे फायदा के बदले नुकसान भी हो सकता है। कांग्रेस की इस कोशिश से आखिरकार भाजपा को फायदा मिल सकता है।

    भविष्य के लिए गुंजाइश

    भविष्य के लिए गुंजाइश

    ममता बनर्जी ने हाल में कहा था कि राज्यों के चुनाव में कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के सहयोग से चुनाव लड़ना चाहिए। भाजपा को हराने के लिए ऐसा करना जरूरी है। अगर कांग्रेस, राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दल के खिलाफ चुनाव लड़ेगी तो यह भाजपा को फायदा पहुंचाने वाली बात होगी। अभी तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जितना भाजपा पर हमलावर है उतना ही सपा और बसपा पर भी। लेकिन दो दिन पहले जब पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की मां का देहांत हुआ था तब प्रियंका गांधी उनसे मिलने के लिए घर गयीं थीं। किसी के निधन पर किसी के घर जाना सामाजिक शिष्टाचार है। प्रियंका गांधी का मायीवती के घर जाना भी एक शिष्टाचार है। लेकिन इस मुलाकात में दोनों नेताओं की जो भाव-भंगिमा दिखी उसके राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। मायावती बहुत अपनेपन के साथ मिलीं। उन्होंने प्रियंका गांधी के कंधे पर हाथ रख कर अपनी भवानाओं को बिना कुछ कहे ही बयां कर दिया। क्या कांग्रेस और बसपा के रिश्ते पर जमीं बर्फ अब पिघलने वाली है ? अगर अभी न सही तो चुनाव के बाद ही सही। क्या दोनों दल भविष्य में पास आने की गुंजाइश को बचाये रखना चाहते हैं ? मायावती की मां के निधन पर योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव ने भी शोक संवेदन प्रगट की। लेकिन प्रियंका गांधी की सांत्वना में एक खास बात थी।

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