मुलायम के परिवार में छिड़ा 'सिविल वार', चाचा-भतीजे में पहले कदम कौन उठाएगा इस पर टिकी सबकी निगाहें
लखनऊ, 4 मई: उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (PSP) के मुखिया शिवपाल सिंह यादव एक बार फिर पांच साल पुराने दौर में पहुंच गए हैं। शिवपाल सिंह बगावत कर रहे हैं, लेकिन अपने राजनीतिक करियर को देखते हुए वह कोई बड़ा जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं और पार्टी से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। शिवपाल सिंह यादव चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव उन्हें पार्टी से निकाल दें ताकि उन्हें शहीद का दर्जा मिले और वे अखिलेश यादव और पार्टी को कटघरे में खड़ा कर सकें। अगर ऐसा होता है तो शिवपाल निस्संदेह अखिलेश यादव पर मानसिक दबाव डाल सकेंगे। अखिलेश शिवपाल के अलावा कुछ और सोच रहे हैं और वह चाहते हैं कि ऐसी शर्तें बनाई जाएं कि शिवपाल खुद पार्टी छोड़ दें और उन्हें बागी घोषित कर उन्हें राजनीतिक फायदा उठाने से रोका जा सके।

चाचा-भतीजे के बीच लंबी चलेगी लड़ाई
समाजवादी पार्टी में चल रहे गृहयुद्ध का नतीजा फिलहाल आने वाला नहीं है और यह लड़ाई लंबे समय तक चलने की संभावना है। क्योंकि यहां न तो शिवपाल हमला करना चाहते हैं और न ही अखिलेश यहां कोई पहल करना चाहते हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि शिवपाल का पार्टी छोड़ना तय है और वह अपनी रणनीति के तहत इस लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहते हैं। शिवपाल सिंह यादव जहां भी जाते हैं और अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से कहते हैं कि वह बहुत जल्द फैसला लेंगे।

नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी न मिलने से बढ़ी नाराजगी
शिवपाल फैसला कब लेंगे यह वह समय नहीं बताता। हो सकता है कि वह भाजपा नेतृत्व या किसी और के फैसले का इंतजार कर रहे हों। यह तो सभी जानते हैं कि यूपी विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी शिवपाल सिंह यादव अखिलेश यादव के खिलाफ नहीं थे। क्योंकि शिवपाल को लगा कि अब अखिलेश से उनका रिश्ता पक्का हो गया है और अखिलेश उन्हें नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बिठाएंगे। नहीं तो पार्टी में उनका रुतबा बढ़ेगा। लेकिन अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल को कोई मौका नहीं दिया।

शिवपाल को खुली छूट नहीं देना चाहते अखिलेश
लेकिन अखिलेश यादव ने जैसे ही विधायकों की बैठक बुलाई तो उन्होंने सबसे पहले शिवपाल सिंह यादव को चौंका दिया और उन्हें बाहरी घोषित कर दिया। अखिलेश यादव को भले ही शिवपाल की तुलना में राजनीति का अनुभव न हो, लेकिन अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि शिवपाल को छूट देने का मतलब अपनी ही जमीन को कमजोर करना है क्योंकि शिवपाल संगठन के नेता रहे हैं और आज भी समाजवादी पार्टी में शिवपाल सिंह यादव के काफी समर्थक हैं और नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के बाद शिवपाल राज्य में मजबूत हो सकते हैं। जिसके बाद अखिलेश ने शिवपाल से दूरी बनानी शुरू कर दी और शिवपाल का सपना धराशायी हो गया और इसका नतीजा अब शिवपाल सिंह की बगावत से देखा जा सकता है।

बीजेपी भी जानती है कि शिवपाल के पास ज्यादा विकल्प नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो शिवपाल सिंह अभी अधर में लटके हुए हैं और उनके पास अभी कोई विकल्प नहीं है। इसलिए वह अब अपने संगठन को मजबूत करने की बात कर रहे हैं। हाल ही में शिवपाल ने अपने संगठन के प्रवक्ताओं को नियुक्त किया है और यह स्पष्ट है कि भाजपा के साथ उनकी पार्टी के सौदे को लेकर कुछ भी अंतिम नहीं है। हाल ही में शिवपाल ने कहा था कि देश में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। यह एक तरह से भाजपा का रुख था और जिसकी शिवपाल वकालत कर रहे हैं। जबकि समाजवादी पार्टी समान नागरिक संहिता के खिलाफ है। बीजेपी भी अच्छी तरह जानती है कि शिवपाल के पास ज्यादा विकल्प नहीं है। इसलिए वह शिवपाल को अपनी शर्तों पर पार्टी में शामिल करना चाहती हैं।

आजम को आगे कर अपना मकसद साध रहे शिवपाल
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव शिवपाल यादव को पार्टी से नहीं निकाल रहे हैं और शिवपाल सिंह यादव पार्टी नहीं छोड़ रहे हैं। शिवपाल यादव पीएसपी के अध्यक्ष हैं लेकिन वह विधानसभा में सपा के विधायक हैं। शिवपाल अखिलेश यादव के सामने ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जिससे अखिलेश यादव उन्हें पार्टी से बाहर कर दें और उनकी विधायकी बरकरार रहे। पार्टी छोड़ने के बाद उपचुनाव होंगे और अगर चुनाव में शिवपाल हार गए तो इससे उनका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा। इसलिए शिवपाल भी सोच-समझकर चल रहे हैं। अब शिवपाल सिंह यादव आजम खान को आगे रखकर बयान दे रहे हैं और इसके जरिए वह अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव पर हमला बोल रहे हैं। शिवपाल सिंह यादव ने पहली बार मुलायम सिंह के खिलाफ बयान दिया है, जिसके बाद माना जा सकता है कि शिवपाल आखिरी लड़ाई के मूड में हैं।












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