चौधरी चरण सिंह के परिवार के किले में नहीं लग पाई सेंध, जानिए यहां का सियासी मिजाज
लखनऊ, 31 जनवरी: उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव हो और छपरौली की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। छपरौली का अपना सियासी मिजाज अलग है। 1937 में चौधरी चरण सिंह ने एकबार जो अपना वर्चस्व कायम किया तो वो अब तक कायम है। तब से लेकर अब तक चरण सिंह के परिवार या उनकी तरफ से उतारे हुए प्रत्याशी हो चुनाव जीतते आए हैं। यानी हम कह सकते हैं की छपरौली आरएलडी का अभेद्य किला है। 2017 में मोदी के प्रचंड लहर में आरएलडी कभी विधायक जीता था। यानी इस सीट पर अभी जनता का आशीर्वाद मिलना बाकी है।

विधानसभा चुनाव में क्यों अभेद दुर्ग है छपरौली
दरअसल जब हम बात करते हैं इस सीट के स्मीकारण की जिसकी वजह से इसे आरएलडी का दुर्ग कहा जाता है। इस सीट पर करीब 1.3 लाख मतदाता हैं। जाट मतदाता किसी भी हवा का रुख मोड़ने की छमता रखते हैं। आरएलडी ने इस सीट से विधायक रहे प्रो अजय कुमार को मैदान में उतारा है तो बीजेपी ने चौधरी परिवार के गढ़ में सेंध लगाने के लिए सहेंद्र सिंह रमाला को टिकट दिया है। सहेंद 2017 में आरएलडी से विधायक बने और बाद में पला बदलकर बीजेपी मे चले गए। बीएसपी ने अपने वोट बैंक और मुस्लिम मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए साहिक को उतारा है जबकि कांग्रेस ने युनुस चौधरी को मैदान में उतारा है।
किसान आंदोलन का है प्रभाव
छपरौली में किसान आंदोलन का बड़ा असर है। यहां गन्ना बकाया भुगतान के मुड़ी के साथ ही चरण सिंह नहर परियोजना के पूरे न होने की वजह से किसान नाराज हैं। हरियाणा को जोड़ने वाली यमुना पर पुल यहां की पुरानी मांग है जो अभी तक अधूरी पड़ी है। 2017 में पुल का शिलान्यास तो हुआ लेकिन ये अभी तक पूरा नहीं हुआ। जयंत चौधरी भी पूरे समय तक किसान आंदोलन को अपना समर्थन देते रहे। अबकी बार ये मुद्दा भी काफी असरकारी रहेगा।
क्या कहती है वोटों की गणित
छपरौली विधानसभा की बात करें तो यहां कुल 3,33,078 वोट हैं। इसमें 1.3 लाख जाट मतदाता ही भाग्य विधाता साबित होते हैं। इस सीट पर 25 हजार दलित और 60 हजार मुस्लिम हैं। इसके अलावा 25 हजार कश्यप और 28 हजार गुर्जर ब्राह्मण हैं। पिछले आंकड़े की बात करें तो सहेंदर सिंह रमाला को 65,124 वोट मिले थे। ये अब बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरे नंबर पर बीजेपी के उम्मीदवार सत्येंद्र सिंह रहे जिनको 61, 282 वोट मिले थे। एसपी के मनोज चौधरी को 39,841 और बीएसपी की राजबाला को 30,241 मतों से ही संतोष करना पड़ा था।












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