बसपा ने बदली अपनी रणनीति, 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' पर फोकस; सम्मेलनों में लग रहे 'जयश्रीराम'- जय परशुराम' के नारे
लखनऊ, 31 अगस्त: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बसपा की मुखिया मायावती ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए सोशल इंजीनियरिंग की नई परिभाषा गढ़ते हुए दिखाई दे रही हैं। एक तरफ वह पिछड़ों को लुभाने के लिए धुर विरोधी और पूर्व सीएम कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने से भी नहीं चूंकि वहीं दूसरी ओर उनके बेहद खास और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा अयोध्या से लेकर चित्रकूट तक मंदिरों के चक्कर काट रहे हैं। इससे भी रोचक यह है कि बसपा के प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में 'जय श्रीराम' और 'जय परशुराम' के नारे भी लग रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक की माने तो मायावती ने मुसलमानों की बजाए 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' फर फोकस करने का प्लान तैयार किया है जिस पर वह आगे बढ़ रही हैं।

बसपा के प्रबुद्ध वर्ग विचार गोष्ठी सम्मेलन की शुरुआत अयोध्या से हुई थी। यहां के बाद पूरे प्रदेश में इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। अयोध्या में हुए कार्यक्रमों के दौरान मंत्रों के उच्चारण के साथ ही घंटों और शंख ध्वनि, घंटों ओर मजीरों की आवाज सुनाई देने के बाद अब अटकलें ये लगाई जा रही हैं आने वाले चुनाव में यूपी की सियासत में सोशल इंजीनियरिेग का बदलता हुआ स्वरूप दिखायी देगा। यानी जो बसपा पहले मंदिरों और राम से दूरी बनायी फिरती थी वह गर्व के साथ राम का नाम भी ले रही है और कार्यक्रमों में जयश्रीराम के नारे भी लग रहे हैं।
'जयश्रीराम' और 'जय परशुराम' का उद्घोष बसपा की रणनीति में बदलाव का संकेत
अयोध्या में शंखध्वनि, घंटों और मजीरों की ध्वनि के बीच वेदमंत्रों के उच्चारण से शुरू हुए बहुजन समाज पार्टी के 'प्रबुद्ध वर्ग विचार संगोष्ठी' का समापन 'जय भीम-जय भारत' के अलावा 'जयश्रीराम' और 'जय परशुराम' के उद्घोष के साथ हुआ था। ये दो नारे शायद बसपा की रैलियों में पहली बार सुनाई दे रहे थे। ये लोगों को अचंभित कर देने वाला सीन था लेकिन लोग इसको भी एक सियासी चश्में से देख रहे हैं। इसका सियासी संदेश बहुत दूर तलक जाएगा। आने वाले दिनों में बसपा अब अपने आपको सॉफ्ट हिन्दुत्व की तरफ मोड़ना चाहती है।

दोधारी तलवार पर चलने का खतरा मोल ले रही बसपा
बसपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि,
''साफ्ट हिन्दुत्व की राह पर चलने के अपने खतरे भी हैं। आने वाले समय में जय श्रीराम और जयपरशुराम के नारों से बसपा को नुकसान भी हो सकता है। लेकिन पार्टी ने इसी राह पर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है। इससे मुसलमानों का वोट बैंक हाथ से फिसलने का खतरा बना रहेगा। ये दोधारी तलवार की तरह है। हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद ब्राह्मणों के अंदर सरकार के प्रति नाराजगी को देखते हुए पार्टी ने प्रबुद्ध सम्मेलन के जरिए अपने समीकरण साधने का प्रयास किया है लेकिन क्या इसे मुस्लिम समाज पचा पाएगा। यह भी एक बड़ा सवाल है।''
बसपा के सम्मेलनो में लग रहे जयश्रीराम और जय परशुराम के नारे
जयश्रीराम और जय परशुराम के नारे बीएसपी के किसी सम्मेलन में शायद पहली बार लगे हों लेकिन यही नारे अब बीएसपी की राजनीतिक दिशा तय कर रहे हैं। अयोध्या में बसपा के पहले सम्मेलन में रैली और कार्यकर्ताओं का जो रुख था उसने आगे के सम्मेलनों की राह खोल दी। बसपा ने इन संगोष्ठियों की शुरुआत के लिए अयोध्या को ही क्यों चुना। इस कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे सतीश मिश्रा ने जब अपने भाषण का समापन किया था कि चारों तरफ 'जयश्रीराम' और 'जयपरशुराम' के नारे गूंज उठे। इस तरह के सम्मेलन अयोध्या के बाद काशी, मथुरा और अयोध्या में भी किए जाएंगे।

विद्यांत कॉलेज के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मनीष हिन्दवी बसपा की इस बदली रणनीति को लेकर कहते हैं कि,
'' इसको आप दो तरह से समझ सकते हैं। पहला यह कि इसे आप बसपा पर सतीश मिश्रा के बढ़ते प्रभाव के तौर पर देख सकते हैं। सारे नेता बहनजी को छोड़कर चले गए। ये वो बसपा नहीं जो हम और आप देखते थे। सतीश मिश्रा के अलावा कोई और नेता नहीं है। एक तरह से कह लीजीए बसपा पर उनकी छाप पड़ चुकी है। दूसरा यह है कि आप इसे भाजपा का खेल भी कह सकते हैं। भाजपा की लीडरशिप बड़ा खेल करने में माहिर है। भाजपा के नेता हमेशा से यह कहते रहे हें कि हमारा मुख्य विपक्षी दल तो सपा ही है। भाजपा को लगता है कि जो ब्राह्मण पार्टी से नाराज होगा वो बसपा में चला जाएगा। वोटों के बिखराव का फायदा बीजेपी को मिलेगा।''

काशी, मथुरा ओर अयोध्या किसी का पेटेंट नहीं
अयोध्या में हुए कार्यक्रम में शामिल होने से पहले बसपा के राष्ट्रीय महासचिव ने हनुमानगढ़ी और रामलला के दर्शन किए थे। दर्शन के बाद वह कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे थे। कार्यक्रम में उन्होंने सरकार और विहिप पर जमकर निशाना भी साधा था। पार्टी के भीतर इस नए बदलाव को लेकर एक महासचिव ने कहा,
'' काशी, मथुरा और अयोध्या किसी के पेटेंट नहीं हैं। इस करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के केंद्र और तीर्थस्थल नहीं है। इसपर किसी एक पार्टी का अधिकार नहीं हो सकता है। अगर बसपा की रैलियों में जयश्रीराम के नारे लग रहे हैं तो गलत क्या है। क्या राम सिर्फ भाजपा के हैं।''
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