पूर्वांचल की 33 OBC सीटों के लिए मास्टर प्लान बना रही BJP, अखिलेश-राजभर के तलाक से मिली नई संजीवनी

लखनऊ, 25 जुलाई: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण में काफी बदलाव आ चुका है। अब यूपी में नए सियासी समीकरण आकार ले रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले जो ओम प्रकाश राजभर बीजेपी को गाली दिया करते थे वो उनके करीब होते जा रहे हैं। चुनाव के बाद सबसे रोचक बदलाव यह आया है कि अखिलेश और राजभर के गठबंधन के बीच तलाक हो चुका है। इस तलाक का फायदा बीजेपी भी उठाना चाहती है इसलिए अब उसने गैर यादव वोटरों पर फोकस करने की रणनीति पर काम करने की कवायद शुरू कर दी है। चुनाव से पहले बीजेपी पर ओबीसी के खिलाफ होने का माहौल बना था जो बीजेपी सुधारना चाहती है।

गैर यादव ओबीसी सीटों पर फोकस करेगी बीजेपी

गैर यादव ओबीसी सीटों पर फोकस करेगी बीजेपी

पार्टी के सूत्रों एवं रणनीतिकारों की माने तो यूपी में 40% से अधिक ओबीसी मतदाता हैं जो हर चुनाव में बड़ा फैक्टर साबित होते हैं। बीजेपी चूंकि अब यूपी में अपना वोट प्रतिशत 50 फीसदी के करीब लाना चाहती है इसलिए बीजेपी अब यूपी में गैर यादव ओबीसी मतों पर एक बार फिर फोकस करेगी। चुनाव से पहले ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे बड़े नेताओं ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया था। इससे पूर्वांचल में एक बीजेपी के खिलाफ माहौल बना था। बीजेपी आम चुनाव से पहले पूर्वांचल में अपना किला मजबूत करना चाहती है इसलिए उसने अब नए सिरे से इस रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।

राजभर-अखिलेश के तलाक से बीजेपी को मिली नई संजीवनी

राजभर-अखिलेश के तलाक से बीजेपी को मिली नई संजीवनी

दरअसल राजभर-अखिलेश के बीच तलाक होने के बाद अब बीजेपी ने अपनी निगाहें उन एसबीएसपी के वोटरों पर टिका दी हैं जो अपने आपको बीजेपी के निकट मानते हैं। बीजेपी अब ऐसे वोटरों में सेंध लगाने के प्रयास में जुटेगी। ओबीसी मोर्चा के प्रमुख नरेंद्र कश्यप ने कहा कि पिछड़ा वर्ग जानता है कि भाजपा ने उनके लिए क्या किया है। उन्होंने कहा, "चाहे वह ओबीसी आयोग का गठन हो या नरेंद्र मोदी कैबिनेट में ओबीसी पृष्ठभूमि के दो दर्जन से अधिक मंत्रियों को जगह देना हो।"

पूर्वांचल में गैर यादव ओबीसी सीटों में केवल तीन पर बीजेपी का कब्जा

पूर्वांचल में गैर यादव ओबीसी सीटों में केवल तीन पर बीजेपी का कब्जा

दरअसल रिकॉर्ड बताते हैं कि ओबीसी-वर्चस्व वाली 33 सीटों में से, बलिया, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर और अंबेडकरनगर जैसे पूर्वी यूपी के जिलों में, भाजपा 2022 के विधानसभा चुनावों में केवल तीन जीतने में सफल रही थी। यह स्थिति उस समय थी जब सपा और एसबीएसपी एक साथ मिलकर बीजेपी को चुनौती देने के लिए सामने आए थे। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना ​​​​है, इन सीटों में से अधिकांश पर एसबीएसपी की वजह से वहां के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में काम किया था।

SBSP के वोटरों को साधेगी बीजेपी

SBSP के वोटरों को साधेगी बीजेपी

इसके साथ ही जब केशव देव मौर्य के नेतृत्व वाली महान दल ने सपा को अपना समर्थन दिया तो एसपी-एसबीएसपी गठबंधन और मजबूत हो गया। महान दल ने भी करीब एक महीने पहले सपा से नाता तोड़ लिया है। हालांकि यूपी बीजेपी के उपाध्यक्ष और इसके ओबीसी मोर्चा के प्रभारी दयाशंकर सिंह भी मानते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी की एसबीएसपी के समर्थकों के साथ निकटता है। इसलिए एसबीएसपी को वोट देने वाले मतदाता अब बीजेपी की ओर बढ़ सकते हैं इसकी संभावनाएं तलाशी जाएंगी।

तीन मंत्रियों के इस्तीफे से दरक गई थी बीजेपी की जमीन

तीन मंत्रियों के इस्तीफे से दरक गई थी बीजेपी की जमीन

दरअसल गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक ने ही पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी के पक्ष में काम किया था। लेकिन इस साल यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा को तीन पिछड़े वर्ग के मंत्रियों - स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी सहित कई लोगों के इस्तीफे से झटका लगा था। इनकी बगावत का लाभ उठाने में अखिलेश ने कोई कसर नहीं छोड़ी और तीनों नेताओं को सपा में शामिल करा लिया और इनके इस्तेमाल बीजेपी के खिलाफ किया।

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