यूपी: एक ठेले पर जिंदगी जीने को मजबूर है 5 सदस्यों का यह परिवार, सरकारी दावों का पता नहीं

बरेली। देश को आजाद हुए 72 साल हो गए हैं, लेकिन बरेली में एक परिवार ऐसा भी है जो ठेले पर रहने को मजबूर है। ना चाहते हुए भी उसे उसकी जिंदगी बंजारों की तरह गुजारनी पड़ रही है। भूख लगने पर कहीं भी चूल्हा बना लिया, बारिश आने पर कहीं शरण ले ली। यह परिवार भीख मांगकर अपना जीवन यापन करता है। आजकल यह परिवार एनएच-24 पर मिनीबाई के पास रह रहा है। सरकार द्वारा किए जाने वाले तमाम वादे कितने सच्चे और झूठे हैं आज इस खबर को पढ़कर आप समझ जाएंगे।

सपनों की सरकार में भी पूरे नहीं हुए सपने

सपनों की सरकार में भी पूरे नहीं हुए सपने

साल 2014 में मोदी सरकार सिर्फ इसलिए सत्ता पर काबिज हो पाई थी क्योंकि इस सरकार ने गरीबों की बात की थी। इस सरकार ने आम आदमी को लेकर काफी सारे सपने दिखाए थें। हमारे देश में आज भी लोगों के पास रहने को एक घर नहीं है इसका मतलब कहीं ना कहीं बदलती सरकारों ने इसपर ध्यान नहीं दिया होगा।

एक ठेले पर रहते हैं पांच सदस्य

एक ठेले पर रहते हैं पांच सदस्य

यह परिवार उत्तराखंड के हरिद्वार से संबंध रखता है। इस परिवार में कुल पांच सदस्य रहते हैं। इन पांचों के लिए उनका घर-बार एक ठेला ही है। यह परिवार भीख मांगकर अपना पालन पोषण करता है। सरकार द्वारा किए जाने वाले तमाम वादे और तमाम सरकारी योजनाए जिनके लिए बनाई जाती है अगर उनतक ही ना पहुंच पाए तो फिर उन योजनाओं का लाभ क्या। दिनभर भीख मांगने के बाद परिवार के सदस्य थक हारकर इसी ठेले पर सो जाते हैं।

योजनाओं की नहीं है ज्ञान

योजनाओं की नहीं है ज्ञान

सड़क किनारे चार ईंटों पर बना चूल्हा इस बात की गवाही दे रहा होता है कि थोड़ी सी बरसात उनके जीवन पर किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं। उनका ठेला किसी बड़े आदमी की कोठी से कम नहीं। इस परिवार को इस बात की जानकारी भी नहीं है कि देश में कोई ऐसी भी योजना है जहां उन्हें अपना घर नसीब हो सकता है या फिर विकलांगता होने पर किसी तरह लाभ भी उठा सकते हैं।

सरकार से है मदद की उम्मीद

सरकार से है मदद की उम्मीद

परिवार के मुखिया राम रतन ने बताया कि वह हरिद्वार के रहने वाले है वह पिछले पांच सालों से बरेली जिले में है। वह एक एक्सीडेंट के चलते चलने में सक्षम नहीं है साथ ही उनकी पत्नी को विकलांगता है। उनका परिवार भीख मांगकर अपना पालन पोषण करता है। उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं है इसलिए वो खुले आकाश के नीचे रहकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। उन्हें सरकार की किसी योजना की जानकारी नहीं है। वहीं राम रतन की पत्नी शीला कहती हैं कि सरकार उन्हें एक छोटा सा घर दिला दे तो उनकी जिंदगी थोड़ी आसान हो सकती है। हालांकि सवाल यही है कि सरकार की योजनाएं आम आदमी तक क्यों नही पहुंच पा रही है कब तक सरकार की आम आदमी तक पहुंच बना पाएगी।

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