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दीपावली पर आधुनिकता ने ओढ़ी चादर, चाइनीज दीयों में खो गई मुस्कान; त्यौहार में कुंहारों का छलका दर्द

Diwali 2024: मध्य प्रदेश के मैहर जिले में दीपावली के पर्व पर बाजारों में चाइनीज लाइटों की बढ़ती डिमांड ने मिट्टी के दीयों की मांग को प्रभावित किया है। त्योहार की तैयारियों में बाजारों को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जा रहा है, जहां चीनी लाइटें लोगों का ध्यान खींच रही हैं। वन इंडिया हिंदी के रिपोर्टर से कुम्हारों ने अपना दर्द साझा कियाहै।

अमरपाटन क्षेत्र में कुम्हार मोहल्ला, जो कभी मिट्टी के दीए, गुल्लक और मटकों के लिए मशहूर था, अब आधुनिक प्रतिस्पर्धा और घटती बिक्री के चलते कठिन दौर से गुजर रहा है। 32 वर्षीय प्रिया प्रजापति और 35 वर्षीय सोनू प्रजापति, दोनों अनुभवी कुम्हार, इस दिवाली पर भी अपनी आजीविका बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

The pain of the lamp maker potter

इन दोनों कुम्हारों का जीवन इसी परंपरागत काम से चलता है, लेकिन बदलते समय और लागतों के बढ़ते बोझ ने इनकी समस्याओं को कई गुना बढ़ा दिया है। प्रिया प्रजापति, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी इस काम में बिताई है, बताती हैं कि दीए, गुल्लक और करवे अब उनके परिवार की जरूरतों को पूरा करने में नाकाफी हो रहे हैं।

उन्होंने वन इंडिया हिंदी को बताया कि उनको अधिकांश सामान बाहर से खरीदकर लाना पड़ता है, जिस वजह से उनका लाभ बहुत ही कम होता है। "हमारी पूरी दिवाली में मुश्किल से 2 से 4 हजार रुपए की बचत हो पाती है। एक हजार दीए बेचने पर 200-250 रुपए की बचत होती है और कभी-कभी तो एक दिन में एक हजार दीए भी नहीं बिकते,"

गर्मी के मौसम में मटके बेचने का सहारा मिलने पर भी उन्हें बचत की कमी का सामना करना पड़ता है। उनका यह व्यवसाय मौसमी बनकर रह गया है और सालभर का आय स्त्रोत नहीं बन पाता। प्रिया प्रजापति ने बताया कि पहले जब बाजार में प्लास्टिक और मशीन से बने सामान नहीं होते थे, तब मिट्टी के दीए और मटके घर-घर में उपयोग किए जाते थे। पर आज प्लास्टिक और अन्य सजावटी आइटम ने उनकी जगह ले ली है, जिससे उनकी बिक्री पर सीधा असर पड़ा है।

सोनू प्रजापति भी इन्हीं मुश्किलों से जूझ रहे हैं। वह बताते हैं कि पहले लोग मिट्टी के दीए और अन्य उत्पादों को पारंपरिक रूप से खरीदते थे, लेकिन अब इनकी मांग तेजी से घट रही है। इस दिवाली में उनकी बिक्री और भी कम रही है, जिससे उनकी आय पर काफी असर पड़ा है। सोनू प्रजापति कहते हैं, "हम भी सामान बाहर से खरीदकर लाते हैं और इसे बेचते हैं। कभी-कभी टूटा-फूटा सामान भी मिल जाता है, जिससे हमें और भी नुकसान होता है" उनकी आय एक दिन में अधिकतम 300-400 रुपए तक सीमित हो गई है, जो कि उनके परिवार की जरूरतों के लिए काफी नहीं है।

उनके परिवार में कुल 7 सदस्य हैं और इसी व्यवसाय से पूरे परिवार का गुजारा चलता है। उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से भी उन्हें कोई पेंशन या सहायता नहीं मिलती, जिससे वे इस व्यवसाय पर ही निर्भर हैं। सोनू प्रजापति के अनुसार, त्यौहारों के बाद उनके मिट्टी के उत्पादों की मांग खत्म हो जाती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो जाती है

प्रिया प्रजापति और सोनू प्रजापति जैसे कई कुम्हार आज भी पारंपरिक तरीके से अपने उत्पाद तैयार कर रहे हैं, लेकिन बदलते समय और प्रतिस्पर्धा के कारण उनकी आजीविका संकट में है। इस दिवाली, अमरपाटन के इन कुम्हारों के व्यवसाय में अपेक्षित खुशहाली नहीं है, और वे बड़ी मुश्किल से अपना खर्च निकाल रहे हैं।

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