Sagar News: प्रसिद्ध देव श्री खंडेराव का अग्नि मेला शुरू, लोग मनोकामना पूर्ण होने के लिए मांगते हैं मन्नत

संवाद सूत्र- ब्रजेश रजक, सागर

Sagar News: आस्था एवं ईश्वरीय चमत्कार का प्रतीक मध्य प्रदेश के सागर जिले की देवरी तहसील के खंडेराव वार्ड मैं प्रसिद्ध देव खंडेराव अग्नि मेला का चल रहा है। अग्नि मेला की खासियत यह है कि यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने की मन्नत मांगते हैं मन्नत पूरी होने के बाद यहां दहकते हुए अंगारों में से निकलते हैं।

लोग पूरी आस्था से दहकते हुए अंगारों में से नंगे पैर निकलते हैं, यह नजारा देखने के लिए देवरी क्षेत्र के अलावा पूरे देश प्रदेश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का जमावड़ा होता है।

Agni Mela of famous god Shri Khanderao begins, people pray for fulfillment of their wishes

देव खंडेराव के मंदिर में अंदर विराजमान स्वयंभू शिवलिंग पर मंदिर अंदर ठीक 12-00 बजे सूर्य का प्रकाश पुंज पढ़ने के बाद सभी श्रद्धालु मंदिर के सामने खोदे गए 4 फीट चौड़े और 2 फीट गहरे गड्ढे से अग्निकुंड के सामने पूजा अर्चना कर दोनों हाथों में हल्दी लेकर अंगारों में डालते हैं इसमें लकड़ी नारियल आदि डालकर अंगारे तैयार किए जाते हैं और फिर श्रद्धालू जयकारे लगाते हुए अंगारों के ऊपर नंगे पैर चलते हैं अग्नि मेला में लगभग ग्यारह सौ श्रद्धालु अग्निकुंड में से निकलेंने के लिए रजिस्ट्रेशन कराए है।

गौरतलब है कि देवरी में भक्त अलग ही अंदाज में देव खंडेराव महाराज की पूजा अर्चना करते हैं।यहां आस्था का अनूठा प्रयोग किया जाता है देव खंडेराव जी का यह मेला 11 दिन तक चलता है जिसमें से लगभग 1100 श्रद्धालुओं के निकलने का अनुमान है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।10-11 दिन चलने वाले इस विशाल मेले में मल्हार समिति के सदस्यों का यहां लगातार सहयोग रहता है। समिति के सदस्य 1 माह पहले से ही तैयारियों में लग जाते हैं और जब तक मेला लगता है तब तक सेवाएं प्रदान करते हैं।

कहां स्थित है श्रीदेव खंडेराव जी का मंदिर

सागर से दक्षिण में 65 किलोमीटर व नरसिंहपुर से उत्तर में 75 किलोमीटर दूरी पर सागर, नरसिंहपुर मार्ग पर देवरी कलां में स्थित है। यह प्रचीन भव्य व ऐतिहासिक आलोकिक मंदिर है। यहां प्रति वर्ष अगहन शुक्ल में चम्पाछठ से पूर्णिमा तक दिसंबर माह मे मेला लगता है। इस दिव्य मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक यहां षष्ठी से पूर्णिमा तक भक्त गण अपनी मनोकामना पूरी होने पर नंगे पैर आग पर से चलते है।

कैसे हुई मेले की शुरुआत

आज से लगभग 400 वर्ष पहले हुई बताया जाता है कि देवरी के राजा यशवंत राव के बेटे किसी आषाध्य बीमारी के चलते मरने की स्थिति में पहुंचे थे तभी राजा ने चिंतित होकर देव खंडेराव से प्रार्थना करते हुए कहा था कि ये आपका दिया हुआ पुत्र है, जो आज बीमारी से अंतिम हालत में है इसे ठीक करिए तो देव खंडेवराव ने राजा यशवंत राव को सपने में कहा कि आप हल्दी के उल्टे हाथ लगाओ और नाव की आकृति में चौड़े और लंबे गड्ढे में एक मन लकड़ी डालकर उसे जलाकर विधि विधान से पूजा अर्चना कर उसमे से दिन के 12 बजे निकलो तो बेटा ठीक हो जायेगा उसके बाद राजा यशवंत राव ने ऐसा ही किया जिसके बाद उनका बेटा स्वास्थ्य हो गया तभी से यह प्रथा आज भी चली आ रही है।

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