Khatu Mela 2024: खाटू मंदिर के शिखर पर 375 साल से सूरजगढ़ का निशान लहराने की असली वजह जानिए
Khatushyamji Temple Surajgarh Nishan: खाटू फाल्गुन लक्खी मेले में बाबा श्याम के लाखों भक्त हजारों निशान चढ़ाते हैं, मगर इन सारे निशान में से सिर्फ सूरजगढ़ का ही निशान खाटूश्यामजी मंदिर के शिखर पर लहराता है।
खाटू मेला 11 मार्च 2024 से शुरू हो रहा है, जो 21 मार्च तक चलेगा। इसी दौरान 150 किलोमीटर दूर से श्याम भक्त सूरजगढ़ का निशान लेकर पहुंचेंगे, जो द्वादशी के दिन दोपहर को बाबा श्याम को अर्पित किया जाएगा।

सूरजगढ़ निशान पदयात्रा
इस साल सूरजगढ़ निशान पदयात्रा 15 मार्च 2024 से शुरू होगी, जो सूरजगढ़ से सुल्ताना, गुढ़ा, उदयपुरवाटी, गुरारा व मंढा होते हुए 18 मार्च को खाटूश्यामजी पहुंचेगी। इससे पहले सूरजगढ़ के बाबा श्याम मंदिर में 11 मार्च 2024 निशान स्थापना होगी।
सूरजगढ़ निशान पदयात्रा का इतिहास
- सूरजगढ़ के श्याम भक्त कपित इंदौरिया बताते हैं कि करीब 376 साल पहले फाल्गुन शुक्ला द्वादसी के मौके पर खाटूश्यामजी मंदिर में बड़ी संख्या में श्याम भक्त निशान लेकर पहुंचे थे। हर किसी में होड़ मच गई कि उनका निशान खाटूश्यामजी मंदिर के मुख्य शिखर पर लहराएगा।
- उस समय श्याम भक्तों की जिद को देखते हुए सर्व सम्मति से निर्णय लिया गया कि जो भी भक्त श्याम मन्दिर खाटूधाम में लगे ताले को बिना चाबी के मोरछड़ी (मोरपंख) से खोल देगा, उसी का निशान सबसे पहले चढ़ाया जाएगा।
- कोई भी श्याम भक्त मोरछड़ी से ताला नहीं खोल पाया तो वहां मौजूद सूरजगढ़ से आए श्याम भक्त मंगलाराम अहीर को मोर पंख से ताला खोल दिया। तब से यह परम्परा चली आ रही है कि सूरजगढ़ का निशान ही खाटूश्यामजी मंदिर के शिखर पर सालभर लहराएगा।
सूरजगढ़ निशान पदयात्रा की खासियत
- 376 साल पहले शुरू हुई सूरजगढ़ निशान पदयात्रा की परम्परा आज भी जारी है। सूरजगढ़ राजस्थान के झुंझुनूं जिले में हरियाणा सीमा पर स्थित है। यहां से खाटूश्यामजी मंदिर करीब 150 किलोमीटर दूर है।
- हर साल खाटूश्यामजी के फाल्गुन लक्खी मेले में सूरजगढ़ वाले श्याम भक्त नाचते-गाते पैदल निशान लेकर पहुंचते हैं। खास बात यह है कि सूरजगढ़ वाला निशान लेकर आने वाले ज्यादातार श्रद्धालु पगड़ी बांधे होते हैं। सिर पर सिगड़ी भी रखे होते हैं, जिसमें ज्योत जलती रहती है।
- सूरजगढ़ में पहले श्याम बाबा का एक ही मंदिर हुआ करता था। लेकिन भक्तों में मनमुटाव के चलते एक मंदिर का और निर्माण करा लिया। तब से दोनों मंदिरों से निशान खाटू ले जाने की परंपरा शुरू हो गई। दोनों ध्वज फहराए जाते हैं।
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