खींवसर में दांव पर है RLP नेता हनुमान बेनीवाल का करियर?, जानिए क्यों देनी पड़ी 20 साल के संघर्ष की दुहाई
Rajasthan By-Election: राजस्थान में 2024 के उपचुनाव की तपिश के बीच राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने अपने राजनीतिक भविष्य की दिशा साफ कर दी है। खींवसर सीट से अपनी पत्नी कनिका बेनीवाल को चुनावी मैदान में उतारते हुए बेनीवाल ने साफ किया कि इस चुनाव का नतीजा सिर्फ उनकी पार्टी के लिए ही नहीं। बल्कि व्यक्तिगत रूप से उनके लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि इस चुनाव में हार होती है तो यह मेरे 20 साल के राजनीतिक संघर्ष का अंत होगा।
हनुमान बेनीवाल ने कहा कि यदि RLP विधानसभा में अपनी जगह नहीं बनाती है तो उनके वर्षों के संघर्ष की कहानी यहीं समाप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि लोग कहेंगे कि हनुमान ने 20 साल तक लड़ाई लड़ी। लेकिन खींवसर की सीट भी हार गए। बेनीवाल ने मतदाताओं से अपील करते हुए कहा कि RLP की जीत सुनिश्चित करें। ताकि वे राजस्थान की सड़कों पर बजरी माफिया के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रख सकें।

राजनीतिक विरासत और खींवसर का महत्व
हनुमान बेनीवाल के लिए खींवसर सीट का महत्व केवल राजनीतिक नहीं है। बल्कि इसमें उनकी व्यक्तिगत विरासत भी समाहित है। वे एक राजनीतिक परिवार से आते हैं और राजस्थान की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। उनके पिता रामदेव बेनीवाल दो बार विधायक रह चुके हैं। 1977 में कांग्रेस के टिकट पर मुंडावा से विधायक बनने के बाद, 1985 में उन्होंने लोकदल से जीत दर्ज की। 2008 में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद खींवसर सीट का गठन हुआ। जहां से हनुमान बेनीवाल ने भाजपा के बैनर तले अपनी पहली जीत हासिल की थी।
भाजपा से अलगाव और एक स्वतंत्र नेता की पहचान
बेनीवाल का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव और चुनौतियों से भरा रहा है। 2008 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ तीखा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया। जिसके कारण 2013 में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया। इसके बावजूद बेनीवाल ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खींवसर से जीत हासिल की। जिससे उनके लचीलापन और जनता के बीच उनकी लोकप्रियता का संकेत मिलता है।
खींवसर में RLP की अहमियत, भाजपा को रखा किनारे
इस बार के उपचुनाव में बेनीवाल ने RLP को प्राथमिकता दी है। यह संकेत देते हुए कि उनके लिए भाजपा की भूमिका इस चुनाव में केंद्रीय नहीं होगी। उन्होंने अपने बयान में उपचुनाव की इस सीट के महत्व को उभारा। जो RLP के भविष्य और उनके व्यक्तिगत राजनीतिक करियर के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। खींवसर में बेनीवाल की यह लड़ाई न केवल इस क्षेत्र के प्रति उनकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। बल्कि बजरी माफिया के खिलाफ उनके अभियान के प्रति उनकी दृढ़ता को भी दर्शाती है।
राजनीतिक तनाव के बीच राजस्थान में बढ़ी हुई चिंताएं
दिवाली के बाद राजस्थान के शहरों में जहां एक ओर हवा की गुणवत्ता खराब हो रही है। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। खींवसर उपचुनाव का परिणाम न केवल RLP के भविष्य की दिशा को तय करेगा। बल्कि हनुमान बेनीवाल के दो दशकों से चल रहे राजनीतिक सफर का समापन करेगा या इसे चार और वर्षों तक विस्तारित करेगा।
खींवसर के मतदाता करेंगे फैसला
अब यह फैसला मतदाताओं के हाथ में है कि क्या खींवसर की सीट बेनीवाल की बजरी माफिया के खिलाफ लड़ाई के नए अध्याय की शुरुआत करेगी या उनके दो दशकों के संघर्ष का अंत।












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