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Navratri Special: राजस्थान में बांसवाड़ा की 18 भुजाओं वाली त्रिपुरा सुंदरी, नवरात्रि में क्या है यहां मान्यता

Rajathan Navratri Special News: देशभर में यूं तो मां दूर्गा के कई शक्तिपीठ है। लेकिन उनसे से एक राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित विश्व विख्यात त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर स्थित है जहां सालों से लाखों श्रद्धालु मां दूर्गा के दर्शन पर पूजा अर्चना करते है।

मां त्रिपुरा सुंदरी के नाम विश्व प्रसिद्ध दुर्गा का यह स्वरूप सियासी नेताओं के लिए भी आस्था का धाम है। फिर चाहे बात राजस्थान के किसी मुख्यमंत्री की हो या फिर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की। जब यह नेता प्रदेश के दौरे पर आते है तो एक बार यहां माथा टेक कर मनोकामनाएं जरूर मांगते है।

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    राजस्थान में बांसवाड़ा की 18 भूजाओं वाली त्रिपुरा सुंदरी,हर मनोकामनाएं होती है पूरी

    आमजन में मां त्रिपुरा सुंदरी को लेकर मान्यता है कि यहां मांगी हर मनोकामनाएं पूरी होती है। यहीं वजह है कि आमजन से लेकर वीआईपी भी मां के दरबार में हाजिरी के लिए दौड़े चले आते है।

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    कौन है मां त्रिपुरा सुंदरी ?

    बांसवाड़ा जिले में सैंकड़ों साल प्राचीन कई मंदिर हैं, जिससे यह धार्मिक आस्था का भी केंद्र बनता जा रहा है। यहीं एक सिद्ध माता त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर है, जो 52 शक्तिपीठों में से एक है।

    बांसवाड़ा जिले से करीब 18 किलोमीटर दूर तलवाड़ा गांव में अरावली पर्वतामाला के बीच माता त्रिपुरा सुंदरी का भव्य मंदिर है। मुख्य मंदिर के द्वार के किवाड़ चांदी के बने हैं। मां भगवती त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति अष्टदश यानी अठारह भुजाओं वाली है। मूर्ति में माता दुर्गा के नौ रूपों की प्रतिकृतियां अंकित हैं। मां सिंह, मयूर और कमल आसन पर विराजमान हैं।

    त्रिपुरा सुंदरी मां क्यों देती है तीन रूपों में दर्शन ?
    मंदिर से जुड़े पुजारी बताते है कि प्रात:कालीन बेला में कुमारिका, मध्यान्ह में यौवना और सायंकालीन वेला में प्रौढ़ रूप में मां के दर्शन होती है। इसी कारण माता को त्रिपुरा सुंदरी कहा जाता है। हालांकि यह भी कहा जाता है कि मंदिर के आस-पास पहले कभी तीन दुर्ग थे। शक्तिपुरी, शिवपुरी और विष्णुपुरी नामक इन तीन पुरियों में स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुरा सुंदरी पड़ा।

    वर्तमान में इस मंदिर के उत्तरी भाग में सम्राट कनिष्क के समय का एक शिवलिंग है। मान्यता है कि यह स्थान कनिष्क के पूर्व-काल से ही प्रतिष्ठित रहा होगा। वहीं कुछ विद्वान देवी मां की शक्तिपीठ का अस्तित्व यहां तीसरी सदी से पूर्व मानते हैं।

    उनका कहना है कि पहले यहां 'गढ़पोली' नामक एक ऐतिहासिक नगर था। 'गढपोली' का अर्थ है-दुर्गापुर। ऐसा माना जाता है कि गुजरात, मालवा और मारवाड़ के शासक त्रिपुरा सुंदरी के उपासक थे।

    एक किवदंती यह भी है कि मां त्रिपुरा सुंदरी गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की इष्ट देवी थी। वो मां की पूजा के बाद ही युद्ध पर निकलते थे। यह भी कहा जाता है कि मालवा नरेश जगदेव परमार ने तो मां के चरणों में अपना शीश ही काट कर अर्पित कर दिया था। उसी समय राजा सिद्धराज की प्रार्थना पर मां ने जगदेव को फिर से जीवित कर दिया।

    पौराणिक कथाओं की माने तो भगवान शिव सती के मृत देह को लेकर तांडव करने लगे थे। तब भगवान विष्णु ने सृष्टि को बचाने के लिए अपना सुदर्शन चक्र चलाया और सती के शरीर को खंड-खंड कर गिरा दिया। उस समय जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे सभी स्थल शक्तिपीठ बन गए।

    ऐसे शक्तिपीठ 52 हैं और उन्हीं में से एक शक्तिपीठ है त्रिपुरा सुंदरी। मां की मूर्ति के पीछे पीठ पर 42 भैरवों और 64 योगिनियों की बहुत ही सुंदर मूर्तियां अंकित हैं। वहीं गृभगृह में देवी के विविध अस्त्र-शस्त्रों से युक्त अठारह भुजाओं वाली श्यामवर्णी आकर्षक मूर्ति है।

    मां त्रिपुरा सुंदरी की आस्था और चमत्कारों के किस्से देशभर में चर्चाओं में रहते है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तो अपनी राजनीति को हर बड़ा कार्य यहीं से शुरू करती है।

    इसकी महत्ता के चलते ही देश के कई बड़े नेता मंदिर में मां के सामने शीश नवाने पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, हरिदेव जोशी, अमित शाह, वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित कई बड़े नेताओं ने त्रिपुरा सुंदरी के दरबार में मत्था टेक चुके है।

    आपकों बता दे कि वैसे तो इस मंदिर में हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का हुजुम जुटा रहता है लेकिन नवरात्र में भक्तों का बड़ी भीड़ उमड़ती है।

    नवरात्र में मंदिर परिसर को आकर्षक रूप से सजाया जाता है और माता की विशिष्ट पूजा-अर्चना की जाती है। यहां दोनों नवरात्र के दिनों में धार्मिक आयोजन होते हैं। गरबा, डांडिया समेत कई प्रकार के नृत्य और दुर्गा पाठ के आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही दीवाली पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।

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