कारगिल युद्ध का LIVE: 'तोलोलिंग की पहाड़ी पर सिर्फ मैं जिंदा बचा, PAK मेजर का सिर काटकर गाड़ा तिरंगा'
Kargil war 1999 Story in Hindi: साल 2024 में कारगिल जंग को आज 25 साल हो रहे हैं। इस मौके पर भारतीय सेना के सबसे खतरनाक कोबरा कमांडो दिगेंद्र सिंह ने Hindi.Oneindia.Com से बातचीत में बताई तोलोलिंग पहाड़ी पर तिरंगा फहराने की पूरी कहानी। नायक दिगेंद्र सिंह राजस्थान के सीकर जिले के गांव झालरा के रहने वाले हैं। पढ़ें कारगिल युद्ध 1999 की आंखों देखी, कोबरा कमांडो दिगेंद्र सिंह (Naik Digendra Singh) की जुबानी...।
जम्मू कश्मीर में LOC के पास द्रास सेक्टर में कारगिल युद्ध स्मारक बना है। इसके ठीक सामने तोलोलिंग पहाड़ी है, जिसकी ऊंचाई 15 हजार फीट है। मई 1999 में पाक के फौजियों ने नापाक इरादों से इसी पहाड़ी पर कब्जा जमा लिया था।
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तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त करवाने के लिए भारतीय सेना की 3 यूनिट फेल हो गई थीं। पहाड़ी पर कब्जा जमाए बैठे पाक घुसपैठियों को द्रास सेक्टर और राष्ट्रीय राजमार्ग साफ दिखाई दे रहा था। जब भी भारतीय जवान नीचे से पहाड़ी पर चढ़ाई करते तो वो उनको निशाना बना ले रहे थे।
2 RAJ RIF मिशन तोलोलिंग का जिम्मा
'मिशन तोलोलिंग' में भारतीय सेना की एक यूनिट के 18, दूसरी के 22 और तीसरी यूनिट के 28 जवान शहीद हो चुके थे। तब 'मिशन तोलोलिंग' को मुक्त करवाने की जिम्मेदारी इंडियन आर्मी की सबसे बेहतरीन बटालियन 2 RAJ RIF को सौंपने का फैसला लिया गया।
तब 2 राज रिफ बटालियन 200 किलोमीटर दूर कुपवाड़ा में तैनात थी। उसे तुरंत प्रभाव से द्रास सेक्टर बुलाया गया। 1 जून 1999 को 2 RAJ RIF के जवान द्रास पहुंचे। उसम समय के आर्मी चीफ ने कमांडर कर्नल रविंद्र नाथ से पूछा, क्या उनकी बटालियन में कोई ऐसा फौजी है, जो तोलोलिंग की पहाड़ी पर तिरंगा फहरा सके?
मैं बेस्ट कमांडो दिगेंद्र सिंह उर्फ कोबरा...
तोलोलिंग पर तिरंगा फहराने सकने के सवाल में जवाब में कुछ देर के लिए सन्नाटा था, मगर फौजियों के लाइन में सबसे पीछे बैठे जवान ने हाथ उठाया और बोला-जय हिंद सर, मैं बेस्ट कमांडो दिगेंद्र सिंह उर्फ कोबरा। सेना मेडल सर...। आर्मी चीफ तुरंत बोल पड़े कि 'तुम वो ही कमांडो हो ना? जो हजरतवन में एक गोली से 144 उग्रवादियों को सरेंडर करवाया था। बहुत सुना है तुम्हारे बारे में।'
तोलोलिंग पर चढ़ाई के लिए चुना दुर्गम रास्ता
2 राज रिफ कोबरा कमांडो नायक दिगेंद्र सिंह की कंपनी चार्ली के जवानों ने तोलोलिंग पहाड़ी पर चढ़ाई के लिए आसान की बजाय सबसे दुर्गम रास्ता चुना। क्योंकि आसान रास्ते से जाने पर चोटी पर बैठे पाक घुसपैठियों उन्हें मार गिरा रहे थे। एक जून 1999 को शरीर पर रस्से बांधकर तोलोलिंग की पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की।
दिगेंद्र सिंह लाइन मशीन गन ग्रुप के कमांडर
14 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद तोलोलिंग पहाड़ी पर पहुंचे। वहां का मंजर खौफनाक था। दुश्मन पूरी तैयारी के साथ बैठा था। 13 जून 1999 की सुबह 6 बजे तोलोलिंग पहाड़ी पर चार्ली कंपनी व पाक फौजियों से आमना-सामना हुआ। मैं दिगेंद्र सिंह लाइन मशीन गन ग्रुप के कमांडर था। मेरे पास दुश्मन की सबसे सुरक्षित जगह पर कब्जा करने की जिम्मेदारी थी।
दिंगेंद्र सिंह के बाएं हाथ में गोली लगी
चार्ली कंपनी में मेजर विवेक गुप्ता, सुबेदार भंवरलाल भाकर नागौर, सुमेर सिंह राठौड़ खारा दूधवा चूरू, शेख चिल्ली मेरठ, हवलदार सुल्तान सिंह भिंड मुरैना, नायक सुरेंद्र आदि को कवरिंग फायरिंग कर रहे थे। दुश्मन फौजी भी हमलावर थे। वे भारी गोलाबारी कर रहे थे। एक गोली मेरे (दिगेंद्र सिंह) बाएं हाथ में लगी। फिर भी दुश्मन पर गोली दागता रहा।
13 जून 1999 को तोलोलिंग पहाड़ी पर लहराया तिरंगा
तोलोलिंग पहाड़ी पर 9 कमांडो शहीद हो गए थे। हमारी टीम में सिर्फ मैं अकेला जिंदा बचा। मेरा भी हाथ गंभीर रूप से जख्मी था, मगर हौसले बुलंद थे। मैंने एक-एक करके पाकिस्तान के 12 बंकर धवस्त कर डाले। उनमें करीब 48 पाकिस्तानी फौजी मारे गए। 13 जून 1999 को मेरे सामने पाकिस्तानी मेजर अनवर खान था, जिसका मैंने सिर काट दिया और उसकी कटी हुई मूंडी पर तिंरगा गाड़ दिया।
कारगिल जंग 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुई
कारगिल जंग में भारतीय सेना की यह पहली जीत थी, जो नायक दिगेंद्र सिंह और उनकी टीम की दिलेरी ने दिलाई। फिर 26 जुलाई 1999 ऑपरेशन विजय पूरा हुआ। कारगिल जंग में भारत की जीत हुई। तोलोलिंग पहाड़ी पर अदम्य साहस के लिए दिगेंद्र सिंह को महावीर चक्र प्रदान किया गया।
दिगेंद्र सिंह का जीवन परिचय
नाम-दिगेंद्र सिंह
उपनाम-कोबरा कमांडो
रैंक-नायक
पिता का नाम-शिवदान सिंह
गांव-झालरा, सीकर राजस्थान
यूनिट-2 Rajputana Rifles
भर्ती- 3 सितंबर 1985
अवार्ड-महावीर चक्र 13 जून 1999
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